पूरा गाँव पार कर गए पंडित लेकिन दुक्खू
नहीं दिखा और वह जल्दी जल्दी कदम
बढ़ाते गाँव से बाहर निकल गए. आज बहुत जरुरी काम से बाहर जा
रहे थे और ऐसे में दुक्खू दिखाई न दे,
यही मनाते जा रहे
थे| और जब पंडित
को लगा कि लगता है दुक्खू आज गाँव के बाहर चला गया है तो उन्होने राहत की सांस ली|
दरअसल पंडित पूरे नियम कानून वाले थे, बिना नहाए धोए अन्न
ग्रहण नहीं करते थे और सारी गणना करके ही घर से निकलते थे| कब किस दिशा में जाना है, कब नहीं,
सब देख समझ ही किसी यात्रा की तैयारी
करते थे| और ख़ुदा न खास्ता निकलते
समय अगर किसी ने छींक दिया या निकलते
ही सामने कोई ऐसा व्यक्ति पड़ गया जिसमें कोई शारीरिक विकृति हो तो वह यात्रा थोड़ी देर के
लिए स्थगित कर देते थे|
और दुक्खू तो बचपन से ही एकनेत्री था और जब भी वो पंडित के सामने पड़ जाता तो पंडित उसे जरूर बुरा
भला बोलते थे|
शुरुवात में तो दुक्खू को इन सब बातों
से बहुत तकलीफ होती थी, आखिर इसमें उसका क्या दोष था। लेकिन समय शायद इंसान के हर
तकलीफ का या तो इलाज़ ढूँढ देता है या उसको सहने की आदत पैदा कर देता है. धीरे धीरे
दुक्खू को भी इसमें मज़ा आने लगा,
वैसे भी समाज ने उसके अंदर के आत्मसम्मान को बचने ही कहाँ दिया था| माँ बाप बचपन में ही परलोक सिधार गए थे और वह अकेला ही रहता था. रहने
के लिए बदरी का दालान था जहां एक किनारे वह अपनी केथरी पर थक कर सो जाता. जाड़े में
बदरी के ही घर से एक पुरानी रज़ाई भी मिल जाती. और गाँव में जिसके यहाँ भी
काम मिल जाये, कर लेता और पेट भर लेता था| पैदाइशी एक विकृति
तो थी ही उसपर से आबनुषी रंग, ऐसे में कभी न तो शादी के बारे में उसने सोचा और न ही गाँव में किसी और ने| हाँ गाहे बगाहे लोग
छेड़ जरूर देते थे उसको मेहरारू को लेकर, खासकर अगर किसी और गाँव की कोई काली कलूटी औरत दिख जाती तो. वैसे
तो गाँव में सबके घर के हर काम के लिए उससे अच्छा कोई और व्यक्ति किसी को मिलता
नहीं था लेकिन कोई भी उसका मज़ाक उड़ाने से शायद ही कभी चूकता था। न जाने कितने नाम
उसके रक्खे हुए थे, कोई कनवा कहता तो कोई सूरदास भी कह देता लेकिन दुक्खू तो उसके
ऊपर सबसे ज्यादा सूट करता था.
समय के साथ उसे ये अच्छी तरह से पता चल गया था
कि अगर पंडित कहीं बाहर जा रहे
हों तो उस समय अगर वो उनके सामने पड़ जाए
तो पंडित अपनी यात्रा थोड़ी देर के लिए जरूर
स्थगित कर देते हैं| अब चूंकि खुद तो वह किसी को या पंडित को ही सामने से कुछ कह
नहीं पाता था तो इस काम को करने में उसे बेहद मजा आता था.
और जब भी कभी उसे मौका
मिलता, वो जरूर उनके सामने
पड़ता और उनकी गालिओं को प्रसाद की तरह ग्रहण करता|
एक और बात थी कि गाँव की हर लड़की या
औरत उसकी या तो बहन थी या चाची या दादी. और दुक्खू हर घर में बेधड़क चला जाता था, कभी उसको यह महसूस
भी नहीं होता था कि घर में लड़कियां या औरतें हैं और उनको खराब लग सकता है. और गाँव
में भी कभी किसी ने इस बारे में कोई अलग राय नहीं रखी.
पंडित जो सुबह निकले तो दिन
भर काम में व्यस्त रहे,
बगल के गाँव में एक पूजा थी और उसके बाद एक नामकरण संस्कार भी था| घर लौटते समय शाम ढल गयी थी, गाँव में जब घुसे तो लोगों के दरवाजों पर लालटेन जल गयी थी| पंडित घर तक चले आये लेकिन दुक्खू
फिर भी नहीं दिखा तो कुछ
अजीब लगा उनको| पिछले कई सालों में शायद ही कोई दिन बीतता हो जब दुक्खू उन्हें नहीं दिखा हो और उन्होंने उसे भला बुरा न कहा हो| घर में मुंह हाथ धोते
समय उन्होंने पण्डिताइन से
ऐसे ही पूछ लिया "अरे आज दुक्खुआ
दिखा था क्या, मुझे नहीं दिखा ?"
पण्डिताइन ने उनको अचरज से देखा, ये आज क्या पूछ रहे हैं पंडितजी| कहाँ दुक्खुआ के नाम
से ही भड़क जाते थे और आज उसके बारे में पूछ रहे हैं| अपने अचरज को दबाते हुए उन्होंने
कहा "ना, हमको भी नहीं दिखा आज, लगता है गाँव से बाहर
चला गया है"|
"हूँ" कहकर पंडित ने सर हिलाया और खटिया पर बैठ गए| पण्डिताइन ने
भोजन परोस दिया और भोजन करके वो सोने
चले गए| दिन भर की थकान से नींद जल्दी आ गयी और कुछ ही देर में
उनके खर्राटे गूंजने लगे|
सुबह दिशा मैदान के बाद पंडित ने स्नान
किया और गाँव में निकले|
कुछ लोगों के यहाँ बैठकर हालचाल लिया और
फिर भोजन के लिए वापस घर की ओर चल पड़े|
रास्ते भर दुक्खू का ख्याल उनके
मन में रह रह कर आता रहा और वो थोड़ा बेचैन होने लगे| आखिर रहा नहीं गया तो बदरी के घर पर रुके और उससे पूछ ही लिया "अरे बदरी,
कल से ही दुक्खुआ नहीं दिख रहा,
कहीं बाहर चला
गया है क्या?
"नहीं पंडितजी,
उसकी तबियत खराब है| आज हमारे खेत में कुछ काम था उसका लेकिन जब आया नहीं
तो मैंने पता लगाया. शायद मौसम का असर हो
गया है, बुखार चढ़ गया है उसको", बदरी ने पंडित को
बैठने के लिए कहा लेकिन पंडित ताल गए.
"अच्छा,
कुछ दवा दारू दिलाया
की नहीं उसको", पंडित चिंतित हो गए|
"हां,
दिला दिया है, कल तक शायद ठीक हो
जायेगा", बदरी ने
कहा तो पंडित की जान में जान आई|
घर पहुँच कर खाना खाने बैठे तो उनके
मुंह से निकल गया "आजकल मौसम गड़बड़ चल
रहा है पण्डिताइन, देखो तो दुक्खुआ की तबियत भी खराब हो गयी, इसीलिए कल से नहीं
दिखा"|
पण्डिताइन एक बार फिर अचरज से उनको देखे
जा रही थीं| उनको दुक्खू और
पंडितजी का ये रिश्ता समझ में नहीं आ
रहा था|
उधर पंडिताइन के अचरज से अनभिज्ञ पंडित खाना खाते समय भी दुक्खू के ठीक होने के बारे में ही
सोच रहे थे, आखिर नफरत का ही सही,
एक रिश्ता तो था ही उससे|
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