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Tuesday, July 26, 2016

एहसास--लघुकथा

पूरा दिन कड़ी धूप में बीत गया लेकिन आज फिर काम नहीं मिला रग्घू को| कुछ और भी दिहाड़ी वाले थे उसके साथ और उनके साथ बीड़ी पीते दिन बीत गया उसका| सबकी हालात एक जैसी ही थी, काम मिला तो घर में चूल्हा जला, नहीं तो फांके| झोपडी पर वापस जाते समय उसके पैर उठ ही नहीं रहे थे, क्या मुँह लेकर जाए| सुबह निकलते समय ही उसने देख लिया था कि आटे का डब्बा खाली हो गया है और उसे पता था कि परचून वाला भी अब बिना पैसे के कुछ देने वाला नहीं है|
झोपडी के पास पहुँचते ही उसे दिख गया, बीबी बाहर ही बैठी थी| थके क़दमों और झुके सर से वो नज़दीक पहुँचा तो बीबी ने सब समझ लिया| थोड़े गुस्से और निराशा से उसने रग्घू को देखा और अंदर चली गयी| रग्घू बाहर ही बैठ गया और उसने जेब की आखिरी बीड़ी निकाल कर सुलगा लिया| धुआं निकालते समय दिमाग में बस एक ही ख्याल चल रहा था उसके कि कल कैसे भी उसे काम ढूँढना ही पड़ेगा नहीं तो चूल्हा कैसे जलेगा| झोपडी के अंदर से उसे बर्तनों की आवाज़ आ रही थी लेकिन उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि अंदर जाकर देखे|
अचानक उसे अपने पैरों के पास कुछ महसूस हुआ और उसने नीचे देखा| अक्सर उछलकर उसके ऊपर चढ़ जाने वाला उसका झबरा चुपचाप आकर बैठ गया था, एहसास तो उसे भी हो गया था|

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