जैसे ही वो भिखारी उनके दरवाज़े पर पहुंचा और आवाज़ लगायी "भगवान के नाम पर कुछ दे दो बाबा", पंडितजी ने डपट कर कहा "यहाँ क्यों आये माँगने, वहीँ से ले लिया करो"|
भिखारी ऐसी झिड़कियों का आदी था, कुछ देर सोच में पड़ा रहा फिर बोल "हम तो मांग के खाने वाले हैं, जहाँ मिल जाए, ले लेते हैं"|
"फिर भी, सोचते नहीं हो कि कहाँ माँगना है और कहाँ नहीं", कहते हुए पंडितजी की नज़र किनारे वाले घर की ओर चली गयी|
भिखारी ने भी गर्दन उस तरफ किया, किनारे वाला घर अहमद भाई का था जिनके यहाँ से उसने अभी कुछ खाने के लिया था| मोहल्ले में सिर्फ वही अलग धर्म के थे, इसलिए पंडितजी उनसे दूर दूर ही रहते थे|
"ठीक है बाबू, तुम्ही दे दिया करो तो नहीं जायेंगे उनके घर मांगने", कहता हुआ भिखारी बैठ गया|
मज़हब ने एक और बंटवारा कर दिया था|
भिखारी ऐसी झिड़कियों का आदी था, कुछ देर सोच में पड़ा रहा फिर बोल "हम तो मांग के खाने वाले हैं, जहाँ मिल जाए, ले लेते हैं"|
"फिर भी, सोचते नहीं हो कि कहाँ माँगना है और कहाँ नहीं", कहते हुए पंडितजी की नज़र किनारे वाले घर की ओर चली गयी|
भिखारी ने भी गर्दन उस तरफ किया, किनारे वाला घर अहमद भाई का था जिनके यहाँ से उसने अभी कुछ खाने के लिया था| मोहल्ले में सिर्फ वही अलग धर्म के थे, इसलिए पंडितजी उनसे दूर दूर ही रहते थे|
"ठीक है बाबू, तुम्ही दे दिया करो तो नहीं जायेंगे उनके घर मांगने", कहता हुआ भिखारी बैठ गया|
मज़हब ने एक और बंटवारा कर दिया था|
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