अपने कमरे में जाकर उसने दरवाज़ा बंद किया और जल्दी से बैग खोलने लगा| कई घंटे बीत गए थे और सिगरेट की तलब बहुत जोर से लगी थी| बड़ी मुश्किल से निकल पाया था माँ बाबूजी के पास से, ऐसा लग रहा था कि जैसे पिछले तीन महीने का सारा प्यार आज ही उड़ेल देना चाहते थे वो| हॉस्टल में रहते हुए उसे अब काफी समय हो गया था और बीच बीच में वो अपने गांव आ जाता था|
सिगरेट निकाल कर उसने जलाई और पहला कश लेते ही जैसे सुकून मिल गया| दुबारा कश लेने ही जा रहा था कि उसके कानों में माँ की आवाज़ पड़ी "कितना दुबला हो गया है न बाबू, ठीक से खाना भी नहीं मिलता है शहर में"|
"तो खिला दो उसे जी भर के, फिर तो शायद तीन चार महीने बाद ही आएगा| लेकिन आजकल कुछ ज्यादा ही पैसे मांगने लगा है, कहाँ से लाएं इतने पैसे", पिता का मद्धिम स्वर सुनाई दिया|
"अब शहर की पढ़ाई में तो पैसे खर्च होंगे ही ना, मेरे बाकी बचे जेवर भी बेच दो, खेती में तो कुछ होता नहीं| लेकिन उसकी पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए", माँ ने जैसे उसकी जरूरतों पर मुहर लगा दिया|
"ठीक है, कुछ ऐसा ही करते हैं, लेकिन उसे पता नहीं चले| चलो अब सो जाओ, सुबह इंतज़ाम कर देंगे"|
सिगरेट उसके हाथ में जलती हुई कब उसकी उँगलियों को जला बैठी, उसे पता ही नहीं चला| उस जलन ने उसे वर्तमान में लौटा दिया और उसने सिगरेट के पैकेट को निकाल कर फेंक दिया| अब उसका सुकून कुछ और बढ़ गया था|
सिगरेट निकाल कर उसने जलाई और पहला कश लेते ही जैसे सुकून मिल गया| दुबारा कश लेने ही जा रहा था कि उसके कानों में माँ की आवाज़ पड़ी "कितना दुबला हो गया है न बाबू, ठीक से खाना भी नहीं मिलता है शहर में"|
"तो खिला दो उसे जी भर के, फिर तो शायद तीन चार महीने बाद ही आएगा| लेकिन आजकल कुछ ज्यादा ही पैसे मांगने लगा है, कहाँ से लाएं इतने पैसे", पिता का मद्धिम स्वर सुनाई दिया|
"अब शहर की पढ़ाई में तो पैसे खर्च होंगे ही ना, मेरे बाकी बचे जेवर भी बेच दो, खेती में तो कुछ होता नहीं| लेकिन उसकी पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए", माँ ने जैसे उसकी जरूरतों पर मुहर लगा दिया|
"ठीक है, कुछ ऐसा ही करते हैं, लेकिन उसे पता नहीं चले| चलो अब सो जाओ, सुबह इंतज़ाम कर देंगे"|
सिगरेट उसके हाथ में जलती हुई कब उसकी उँगलियों को जला बैठी, उसे पता ही नहीं चला| उस जलन ने उसे वर्तमान में लौटा दिया और उसने सिगरेट के पैकेट को निकाल कर फेंक दिया| अब उसका सुकून कुछ और बढ़ गया था|
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