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Thursday, September 29, 2016

सौदा--लघुकथा

नयी नयी आयी बहू कुछ सोच नहीं पा रही थी, वैसे उसे शक़ तो हो गया था| खटका तो तब ही था जब उसके जैसी ख़राब सूरत की और इतने गरीब घर की लड़की के लिए इतने बड़े घर से रिश्ता आया था| उसकी माँ ने उसकी कितनी बलैया ली थी कि क्या किस्मत पायी है उसने और साथ ही साथ तमाम हिदायत भी कि कोई नाखुश ना रहे ससुराल में|
कल रात में भी सुमित अचानक बिस्तर से गायब हो गया| पहले भी कई बार ये हो चुका था लेकिन वो इंतज़ार करते करते सो जाती थी| अगले दिन सुमित कोई न कोई बहाना बना देता और ज्यादा पूछने पर नाराज़ हो जाता| काफी देर तक इंतज़ार करने के बाद भी जब वो नहीं आया तो उसने बाहर देखने का फैसला किया| लेकिन उसने जब सुमित को बड़ी बहू के कमरे से निकलते देखा तो वो स्तब्ध हो चुपके से वापस आ गयी थी|
पूरी रात इसी कशमकस में गुजरी कि वो क्या करे| लेकिन सुबह होते होते उसने स्थिति का सामना करने का फैसला कर लिया था| जैसे ही सुमित बाथरूम से निकला, उसने सीधा सवाल किया "कल रात में आप कहाँ गए थे"|
सुमित इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, उसने अचकचा कर कहा "ऐसे ही बाहर निकला था, तुमको पहले भी कहा है कि ज्यादा पूछा मत करो"|
"मैंने देख लिया था कि आप कहाँ गए थे, और आज मैं बता देती हूँ कि आज के बाद ये सब नहीं चलेगा इस घर में", भावावेश में उसकी आवाज़ काफी तेज हो गयी|
सुमित घबराया लेकिन उसने भी काफी तल्ख़ लहज़े में जवाब दिया "ऐसी शक्ल सूरत और परिवार की होकर यहाँ ऊँची आवाज़ में बात करोगी? तुमको समझ नहीं आता कि तुम्हें क्यों इस घर की बहू बनाया गया है| आगे से चुप चाप पड़ी रहो और जैसे चल रहा है, चलने दो"|
"दो बात तुम भी सुन लो, अगर तुम सोचते हो कि मैं चुप रहूंगी तो तुम गलत हो| और दूसरी बात, अगर मैं इस घर से बाहर निकली तो ये बात घर के अंदर नहीं रह पायेगी"|
वो कमरे से बाहर निकल गयी, सुमित वहीँ बिस्तर पर धम्म से बैठ गया|






अंतहीन पीड़ा का सफर-- कहानी

ट्रेन के उस जनरल डिब्बे में अब सब कुछ सामान्य हो चुका था, लोगों ने उसे एक बेहद दुखी और पीड़ित समझ कर मुंह मोड़ लिया. हर यात्री वहां की स्थिति के हिसाब से अब अपने आप को ढाल चुका था और अपनी मंजिल की तरफ झटके खाता हुआ बढ़ रहा था. दुखी तो हर कोई था लेकिन किससे कहे, इसलिए लोग खामोश ही थे. जब सबको अपनी मंजिल पर पहुँचने की जल्दी हो और परिस्थितियां विपरीत हों तो लोग आस पास की घटनाओं से अपने आप को अलग रखना बेहतर समझते हैं या यह उनकी मज़बूरी भी हो सकती है.

कुछ महीने पहले ही वो उस महानगर की बजबजाती गलियों में अपनी जगह बनाने आया था. गाँव में भी गन्दगी थी, बदहाली थी लेकिन कम से कम सांस लेने में घुटन महसूस नहीं होती थी. लेकिन जब गाँव में खाने के लाले पड़ने लगे तो उसे लगा कि इस जगह से कहीं और जाना पड़ेगा. उसके साथ के अधिकतर साथी पहले ही इस महानगर की ओर रुख कर चुके थे, उन्हें एहसास था कि जिन्दा रहने के लिए ताज़ी हवा से ज्यादा भरा पेट जरुरी है. पिता के रहते उसने कभी सोचा भी नहीं था, जीवन अभाव में ही सही लेकिन कट रहा था. लेकिन पिता का साया जब से सर से हटा था, बहन की शादी की जिम्मेदारी उसे शिद्दत से महसूस हो रही थी. माँ कुछ कहती तो नहीं थी, वह शायद चाहती भी नहीं थी कि वह गाँव छोड़े. लेकिन उसकी बेबस निगाहें बहुत कुछ कह जाती थीं. फिर उसके सामने भी इस महानगर की ओर देखने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था.

महानगर में आने के बाद एक महीना तो उसे अपना ठिकाना पक्का करने में ही लग गया. गाँव के वे लोग जो उसके चाचा या ताऊ लगते थे, उन्होंने बस एक बार पूछा और फिर इस तरह से मुंह मोड़ लिया मानो वह उनके यहाँ ही रहने के लिए आया हो. गनीमत थी कि उसका एक दोस्त था जिसने न सिर्फ उसे अपने खोली में रहने की जगह दी, बल्कि अपने सेठ के यहाँ उसे नौकरी भी दिलवाई. उसका दोस्त अकेले ही रहता था और उसके रहने से उसका खोली का किराया शेयर होने लगा. अब दोनों को थोड़ा सुकून मिल गया था, साथ भी मिला और थोड़े पैसों की बचत भी. आखिरकार वह पैसों के लिए ही तो अपना गाँव छोड़कर इस महानगर में आया था.

पिछले कुछ महीनों में हाड़तोड़ मेहनत करके उसने कुछ पैसा बचा लिया और एक बार गांव जाने का सोचा. उसने अपने दोस्त से भी पूछा कि क्या वह भी गाँव चलना चाहेगा लेकिन उसने मना कर दिया. दरअसल इस महानगर में रहने वाले उस जैसे लोग अपने गाँव या तो शादी ब्याह में जाते थे या किसी मरनी करनी में. कभी कभार त्यौहार में भी जाना होता था लेकिन त्यौहार के समय टिकट का हाल बेहद खराब रहता था. उसकी बात अलग थी, वह पहली बार वह अपने गाँव और परिवार से दूर था इसलिए घर की याद भी आ रही थी. और साथ ही साथ उसके मन में यह इच्छा भी थी कि माँ को वह दिखा सके कि अब वह सचमुच बड़ा हो गया है और परिवार को चला सकने में समर्थ हो गया है. इस महानगर से वैसे तो कई ट्रेन उसके गाँव की तरफ जाती थीं लेकिन जाने के लिए कन्फर्म सीट मिलना सबके लिए सपने के समान था. महीनों पहले से बुकिंग कराने पर भी वेटिंग का ही टिकट मिलता. और अगर किसी के पास पैसा हो तो कुछ दिन पहले भी उसको कन्फर्म सीट मिल जाती. टिकट का ये खेल उसकी समझ से बाहर था लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकता था. खैर सफर लंबा था और उसके पास ट्रेन के जनरल डिब्बे के अलावा और कोई जरिया नहीं था गाँव जाने का. स्टेशन पर डिब्बे के सामने लगी कतार को देखकर उसका कालेज मुंह को आ गया. आते समय तो स्थिति फिर भी ठीक थी, गाँव का ही एक व्यक्ति साथ था और उसके पास कोई कीमती सामान भी नहीं था. अभी वो अपने झोले को अपने सीने से लगाए सोच ही रहा था कि इस डिब्बे में वह घुस भी पायेगा या नहीं, तभी  एक कुली ने उसको टोका "सीट चाहिए क्या जाने के लिए". पहले तो वह हिचकिचाया लेकिन फिर उसे महसूस हो गया कि बिना कुली के मदद के वह डिब्बे में घुस भी नहीं पायेगा. फिर कुछ रुपये खर्च करके थोड़ी देर बाद वो ट्रेन के उस जनरल डिब्बे में, जिसमें पैर रखने की भी जगह नहीं थी, ठूंस दिया गया.

ट्रेन चली और कुछ ही देर में डब्बा लोगों के शोरगुल और बदबू से भर गया. महानगर में कुछ माह बिता लेने के चलते उसकी आदत हो गई थी इसलिए उसे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई लेकिन बाथरूम के लिए जाना लगभग असंभव था. लोग पूरे रास्ते भरे हुए थे और उधर जाने के लिए शायद उनके सर पर होकर ही जाना पड़ता. उसने बाथरूम जाने का ख्याल ही छोड़ दिया और अपने झोले को अपने से सटाये हुए एक सीट पर आधा बैठे हुए सफर तंय करता रहा. झोले में रखे हुए कुछ नए कपडे और कुछ और घरेलू सामान उसके लिए बेशकीमती थे, दरअसल वो सब उसने माँ और बहन के लिए ख़रीदे थे.

रात होने लगी थी और डिब्बे की धूमल बत्ती में ज्यादा साफ़ नहीं दिख रहा था. उसने एक बार फिर अपने अंदर की जेब में रखे हुए पैसे टटोले और पीछे की तरफ पीठ टिका कर लेटने का उपक्रम करने लगा. खाने के लिए कुछ था झोले में जो उसने खा तो लिया लेकिन पानी डर के मारे नहीं पिया कि कहीं पेशाब न लग जाए. अभी बमुश्किल उसकी आंख झपकी ही थी कि उसे डब्बे में कोलाहल सुनाई दिया. ध्यान से सामने देखने पर दो कांस्टेबल नज़र आये जो लोगों को अपने डंडे से कोंचते हुए गालियां बक रहे थे. फिर उसकी आँखों के सामने उसने उनको लोगों के पैसे भी छीनते देखा तो उसकी आत्मा कांप गयी. जल्दी से उसने एक बार फिर अपनी अंदर की जेब टटोली और हिम्मत जुटाकर बैठ गया.

खैर उसके पास तो टिकट था इसलिए उसे अंदर से थोड़ी हिम्मत भी थी लेकिन जैसे जैसे वो हवलदार उसके नजदीक आ रहे थे, उसकी हिम्मत जवाब देती जा रही थी. उसने जेब से टिकट निकाल कर हाथ में पकड़ लिया और झोले को अपने पीठ से लगाकर बैठ गया. हर बार उन हवलदारों का उठता डंडा जैसे उसके ऊपर ही पड़ने वाला हो, उसे ऐसा ही लग रहा था. उसकी रूह कांप जा रही थी ये सब देखकर. सामने वाली सीट पर बैठे युवक की जेब को जब हवलदार ने टटोला तो उसे लगा कि आज बच पाना मुश्किल ही है. उसने घबराकर आंख बंद कर ली और जितने भी देवी देवता याद आ सकते थे, सबको याद करना शुरू कर दिया.

चंद छण बाद उसने आंख खोली तो सामने हवलदार डंडा लेकर खड़ा था. पहले भी जिंदगी में उसे पुलिस वालों से बेहद डर लगता था लेकिन आज तो जैसे उसे लगा कि साक्षात् यमदूत ही सामने खड़ा हो. कांपते हाथों से उसने टिकट को आगे बढ़ाया और घुटी जबान से इतना ही बोल पाया "साहब टिकट है हमारे पास".

"साले जनरल ट्रेन का टिकट लेकर सुपरफास्ट में बैठा है, तेरा तो चालान बनाना पड़ेगा", टिकट को उसकी तरफ फेंक कर हवलदार गुर्राया.

"साहब, टिकट तो यही दिया था खिड़की पर", उसने फिर से थूक निगलते हुए किसी तरह कहा.

"मतलब हम झूठ बोल रहे हैं, तुम लोगों से ठीक से बात क्या कर ली, दिमाग ख़राब हो गया. अगले स्टेशन पर उतर जाना हमारे साथ, कुछ दिन हवालात में बिताएगा तो सब समझ आ जायेगा" हवलदार ने डंडा उसके पैर पर मारा.

उसे कुछ समझ नहीं आया कि क्या करे, घबरा कर उसने दोनों हाथ जोड़ दिए और गिड़गिड़ाने लगा.

"ठीक है, निकाल 500 और आगे से ध्यान रखना, नहीं तो मार मार के भूसा बना देंगे".

500 रुपये, उसने तो कुल 4000 रूपये बमुश्किल जमा किये थे पिछले कुछ महीने में. अभी उसका दिमाग ये सब सोच ही रहा था कि एक बार और डंडा पड़ा उसके पैर पर, इस बार डंडा ज्यादा तेज था.

"चल उठ, तू हवालात में ही मानेगा अब" कहते हुए हवलदार ने उसका हाथ पकड़ा तो उसकी आत्मा कांप गयी. एक बार उसने हवलदार के चेहरे को देखा लेकिन हिम्मत जवाब दे गयी. कांपते हाथों से उसने अंदर की जेब में हाथ डाला और पैसे निकाल कर 500 हवलदार को पकड़ा दिए. तब तक दूसरे हवलदार की नज़र उसके झोले पर पड़ी और उसने झोला उठा लिया.

"क्या छुपा रखा है इसमें, कहीं कुछ चोरी का सामान तो नहीं है" सुनते ही उसे लगा जैसे उसने कुछ चुरा कर ही रखा हो झोले में. डरते डरते बस इतना ही बोल पाया "माँ और बहन के लिए कुछ कपडे हैं साहब, चोरी का कुछ नहीं है".

झोले को उलट कर देखने के बाद हवलदार आगे बढ़ गया, उसने वापस सब कुछ झोले में रखा और सिमटकर सीट पर बैठ गया. लगभग एक घंटे तक उन हवलदारों का ये तांडव चलता रहा, जिसके पास पैसे नहीं थे, उनका सामान लूट लिया और पिटाई अलग की. ट्रेन चले लगभग ६ घंटे हो चुके थे और अब उसकी भूख प्यास सब मिट गयी थी. पूरा डिब्बा उन हवलदारों को कोस रहा था और जिन लोगों को चोट लगी थी उनकी कराह भी सुनाई पड़ थी. लेकिन उसे लगा कि अब शायद कोई नहीं आएगा, यही सोचकर उसने झोले को पीठ पर लगाया और आंख बंद कर लिया.

सुबह तड़के ही उसकी नींद खुली और उसने देखा कि झोला उसके कंधे से गायब है. झटके से वो उठा और चारो तरफ देखने लगा, कुछ लोग ऊंघ रहे थे और कुछ जाग भी रहे थे. उसने एकदम से चिल्लाना शुरू किया "अरे मेरा झोला किसी ने चुरा लिया" और ऊपर नीचे ढूंढने लगा. तब तक किसी और की आवाज़ आयी "मेरी जेब किसी ने काट ली, सब पैसा चला गया", और वो जोर जोर से चिल्लाने लगा.

यह सुनते ही उसका हाथ भी अपने अंदर वाली जेब पर गया और उसे लगा जैसे वो खाली हो. अब उसने दुबारा तिबारा देखा, जेब खाली ही थी, किसी ने सामने से काट कर सारे पैसे निकाल लिए थे. उसे लगा जैसे चक्कर आ गया हो और वो वहीं गिर जायेगा और उसकी कस कर रुलाई फूट गयी. कितनी मेहनत से और पसीना बहाकर उसने ये पैसे बचाये थे घर के लिए, कितनी रातों को वो सिर्फ पानी पीकर सो गया था. उसके दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया और वो वहीं सीट के पास लुढ़क गया. किसी को उसकी हालात देखने या समझने की चिंता नहीं थी, अधिकांश लोग अपनी अपनी पीड़ा से परेशान थे. समय गुजरने लगा, ट्रेन अपनी गति से भागी जा रही थी.   

Wednesday, September 28, 2016

अभिनय--लघुकथा

अचानक वो कमरे में घुसा तो रीमा ने झट से उसका फोन रख दिया, लेकिन उसके चेहरे ने उसका राज खोल दिया| अभी वो कुछ बोलता उसके पहले ही रीमा ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा "अरे एक परिचित का नंबर ढूँढ रही थी तुम्हारे फोन में"|
"देखो रीमा, मुझे भी पता है कि तुम क्या ढूँढ रही थी| इतने साल हो गए हमारी शादी को, अब भी भरोसा नहीं हुआ तुमको", उसका लहज़ा कुछ ऐसा था कि रीमा को उसकी नाराज़गी का एहसास हो जाए|
"अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं| तुम गलत सोच रहे हो", रीमा के शब्द उसका साथ नहीं दे रहे थे|
"और तुम भी तो नौकरी करती हो, मैंने तो कभी चेक नहीं किया तुम्हारा नंबर", उसने एक और बार रीमा को घूरते हुए कहा|
"सॉरी, मुझे नहीं करना चाहिए था ऐसा| पता नहीं क्यों कभी कभी डर जाती हूँ, तुम हो ही इतने हैंडसम", रीमा ने उसका हाथ पकड़ लिया|  
"ये बात तो मुझसे शादी के पहले सोचनी चाहिए थी ना", उसने हँसते हुए एक धौल रीमा की पीठ पर लगा दी|
"मैं चाय बना कर लाती हूँ", कह कर रीमा किचेन में घुस गयी| उसने अपना फोन उठाया और मैसेज कर दिया "डार्लिंग ध्यान रखा करो, शाम को गलती से भी कोई मैसेज मत भेजना, आज बाल बाल बचा हूँ"|
रीमा चाय लेकर आयी, उसने भेज हुआ मैसेज डिलीट करके फोन वापस रख दिया था|  

Monday, September 26, 2016

बखानल बिटिया डोमन के--कहानी

सुक्खू चच्चा आज बहुत उदास थे, बात ही कुछ ऐसी थी| उनको तो सपने में भी यकीन नहीं था कि रज्जन ऐसा कह सकता है उनसे| दरवाजे के किनारे पड़ी अपनी झलंगी खटिया पर लेटे हुए वो आसमान देख रहे थे, पता नहीं ऊपर दऊ से शिकायत कर रहे थे या अपना दर्द बाँट रहे थे| वैसे उनके आदत के हिसाब से कोई बड़ी बात भी नहीं थी, बस दुआरे पर हड़बोंग मचा रहे गदेलों को उन्होंने डांट के भगाया ही तो था| अक्सर ही वो ऐसा किया करते थे|
भरे पूरे परिवार में सब ठीक ही था, दो बेटे थे जिसमें एक गांव पर ही रहकर खेती बाड़ी संभालता था, तो दूसरा एक कंपनी में नौकरी करता था| वैसे अब तो वो बब्बा बन गए थे लेकिन पूरा गाँव उनको सुक्खू चच्चा ही कहता था| सुक्खू चच्चा अक्सर दूसरे बेटे को टोका करते थे कि ये कौन सी नौकरी करते हो तुम जिसमें न तो समय से छुट्टी मिलती है और न ही कोई नौकर चाकर मिलते हैं| और फिर शुरू हो जाते अपने नौकरी का बखान करने "अरे नौकरी तो हम लोग करत रहे, अंग्रेजन का समय था तो क्या, कितना इज़्ज़त मिलता था| घोड़ा पर सवार होकर जब हम अपने इलाका में निकलते थे तो लोग सलाम ठोंका करते थे| मजाल थी कि कोई नान्ह जात अपने दरवाजे पर खटिया पर बैठा मिल जाए"| ये कहते समय उनके चेहरे पर आज का माहौल तैर जाता था जहाँ अब नान्ह जात के नए लड़के उनके सामने खटिया पर बैठे रहते थे| हाँ पुराने लोग आज भी उनकी इज़्ज़त करते और खटिया छोड़ के खड़े हो जाते थे|
अब न तो दरवाजे पर घोडा था और न हीं वो पुराना समय जब खेतों में काम करने के लिए मजूर बनिहार जितना चाहे मिल जाते थे| कभी कभी बात करते करते अपने समय में खो जाते और बताने लगते "अरे एक हमार समय था कि बस एक आवाज़ पर आधा चमरौटी के लोग खेत में आ जाते थे| और आज तो कौनों मिलते ही नाहीं हैं, बस जिसको देखो साडी की बुनाई कर रहा है| अरे इ काम तो जुलाहन का था लेकिन अब त इ सब भी इसी में घुस गए हैं"| खेती के बारे में भी उनकी जानकारी और उससे जुडी पुरानी यादें वो जब तब सबसे साझा किया करते थे| खेती करने वाले चच्चा ने तो ऊबकर उनसे बात करना ही बंद कर दिया था, कौन दिन रात की किच किच पाले| हर चीज में सलाह और टोका टाकी उनसे बर्दास्त नहीँ हुई, शुरू शुरू में कई बार झगड़ा हुआ, फिर लोगों की सहानुभूति अपने पिता की तरफ देखकर उनको यही उचित लगा| गाहे बगाहे सुक्खू कह ही देते "अरे, हमार पैदाईस होके हमके समझावला, तन्नी सा ज्ञान का हो गयल, हमहीं के चरावे लगला", और उनकी इस बात का खेतिहर चच्चा कोई जवाब नहीँ देते|
कुल मिलाकर सात नाती पोता थे उनके लेकिन सबसे ज्यादा मानते थे रज्जन को| वैसे उसका नाम तो राजन था लेकिन सुक्खू चच्चा उसको हमेशा रज्जन ही बुलाते थे| पता नहीँ दुलार से या उनको रज्जन बोलने में ही सुविधा होती थी| रज्जन शहर में रहता था और साल में कम से कम एक बार गर्मी की छुट्टी में जरूर गांव आता था| वो दो महीने खूब धमाचौकड़ी के होते थे और दुआर पर कभी कभी, जब सुक्खू चच्चा नहीं रहते थे, तो लड़को बच्चों की भीड़ भी लग जाती थी| उनके रहते तो शायद ही कोई हिम्मत करता आने का, सबको पता था कि डपट के खदेर दिए जायेंगे| सिर्फ बच्चे ही नहीँ, अगल बगल के घर से कोई कुक्कुर भी नहीँ आता था उनके दुआरे| बड़ा सटीक निसाना था सुक्खू चच्चा का, खींच के ऐसा गोजी मारते कि कुक्कुर कांय कांय करते भाग खड़ा होता| हाँ, रात में जरूर कोई कुक्कुर दुआरे झाड़ा फिर के भाग जाता और फिर भिन्सहरा सुक्खू चच्चा उसके कई पुस्त को कोसते हुए उसकी लेड़ी फरसा से उठा कर फ़ेंकते|
रज्जन गाहे बगाहे सुक्खू चच्चा के पास बैठ जाता, उनसे कुछ कुछ पूछा करता| सुक्खू चच्चा खूब हुलस हुलस कर उसको बताते और साथ साथ अपने जमाने के भी कुछ किस्से सुनाते| सुक्खू चच्चा के खाने के समय अक्सर रज्जन ही उनको बुलाकर ले जाता, खाना खिलाता और फिर जब वो आकर खटिया पर लेट जाते तो गांव में निकल जाता| उनके नहाने के लिए इनारा से पानी भी अक्सर वही काढ़ देता, ये अलग बात थी कि सुक्खू चच्चा उसके अलावा किसी भी बच्चे को इनारा के आस पास भी फटकने नहीँ देते| पता नहीं कितने किस्से रज्जन को अब जबानी याद हो गए थे, फलाने के घर का एक बच्चा इनारा में गिर कर मर गया और १०० बरस का प्रेत बना, आदि आदि| हाँ रज्जन पर उनको भरोसा हो गया था कि वो सावधानी से पानी काढ़ सकता है, इसलिए कई बार उसको अपनी बाल्टी पानी काढ़ कर लाने के लिए दे देते| सुक्खू चच्चा ने ही उसको बताया था कि गर्मी में लेजुर को छाया में रख दिया करे और पानी काढ़ने से पहले उसे पानी से भिगो दिया करे| नहीँ तो शुरू शुरू में तो कई बार उसका हाथ गरम लेजुर से जल गया था|
दिन में अगर रज्जन सुक्खू चच्चा के साथ बैठा रहता तो दुआरे से गुजरने वाला हर व्यक्ति को सुक्खू चच्चा को पलग्गी करते देखता| कुछ लोग तो साइकिल से उतर कर सुक्खू चच्चा के पास आते और हाल चाल पूछते| रज्जन को बड़ा अच्छा लगता कि लोग आज भी चच्चा की कितनी इज़्ज़त करते हैं| लेकिन अगर कोई नई उम्र का लड़का साइकिल के हैंडिल पर रेडियो टांगे गाना सुनता हुआ सामने से गुजर जाता तो सुक्खू चच्चा एक बार जरूर कहते "देखा ससुर के नाती को, नई सौखीनि, खलीथी में गाजर"| बहुत दिनों तक रज्जन समझ नहीँ पाता था उनके ये मुहावरे, लेकिन धीरे धीरे समझने लगा| कई बार तो वो सुक्खू चच्चा से ही पूछ लेता उनके मतलब और वो उसे बहुत मन से समझाते|
सुक्खू चच्चा का रोज का कार्यक्रम एक निश्चित ढर्रे पर ही रहता, भिन्सहरे ही उठ कर लोटा लेकर दिशा मैदान को निकल जाते| लौट कर आने पर दुआरे की नीम के पेड़ से दतुअन तोड़ते और बाल्टी से पानी काढकर इनारा के पास बैठ जाते| दतुअन करके एक लोटा पानी पीते और एक बार सब गोरु के नांद पर जाकर देखते| अगर किसी के नांद में पानी या कोअर नहीँ होता तो या तो खुद ही डाल देते या आवाज़ लगाते| सारे गोरु उनको पहचानते थे और उनके आते ही मुंह उठाकर एक बार अपना सर जरूर सहलवा लेते| नाश्ते के नाम पर अमूमन तो कुछ नहीँ लेते थे, हाँ अगर घर में कुछ स्पेशल बना हो तो खा लेते थे| थोड़ी देर पूजा करना और प्रसाद के रूप में चीनी या गुड़ का छोटा टुकड़ा, जो बच्चों के लिए अमृत जैसा होता था, सबको थोड़ा थोड़ा देना| दोपहर में नहा कर जल्दी खाना खाना और फिर थोड़ी देर सो लेना| नहाना तो शायद ही कभी छूटा हो, चाहे कितनी भी ठण्ड हो, दो ही लोटा सही लेकिन नहाते जरूर| सोकर उठाते तो एक चक्कर सभी खेतों का लगा लेते और कुछ खाने लायक मिल गया तो खेत से लेते आते|
रज्जन अक्सर देर तक सोता रहता और सुक्खू चच्चा उसको कई बार जगाते| कभी प्यार से तो कभी गुस्से से, उसको समझाते कि देर तक सोना अलायों की निशानी है| अक्सर उसको बताते भी कि सूरज निकलने से पहले उठ के दुआर बुहार देना बहुत जरुरी होता है| अगर सूरज निकलने के बाद झाड़ू लगाया तो लक्ष्मी रूठ जाती हैं| लेकिन सुबह जल्दी उठना रज्जन के लिए सबसे मुश्किल काम होता| कई बार जगाने के बाद वो उठ ही जाता और फिर वो भी लोटा लेकर खेतों की ओर निकल जाता| शहर में तो बाथरूम था लेकिन गांव में तो दिशा मैदान के लिए खेत में ही जाना होता| फिर नीम का कड़वा दतुअन बडी मुश्किल से करता और घर में खाने के लिए घुस जाता| बस खाने के लिए ही घर में जाता, बाकी समय या तो सुक्खू चच्चा के साथ या अपने हमउम्र बच्चों के साथ|
खाने पीने के बारे में भी सुक्खू चच्चा उससे बराबर पूछते रहते, कि उसने क्या खाया और कितना खाया| और फिर बीच बीच में अपने जमाने की बात छेड़ देते कि उनके समय में क्या क्या बनता था| उसमें से कई चीज का तो रज्जन ने नाम भी नहीँ सुना होता, कभी वो पूछ लेता, कभी नहीं| सुक्खू चच्चा हर बात पूरी तफ्सील से बताते कि फलाने के तिलक में क्या क्या बना था, ढेकाने के बरात में क्या खातिरदारी हुई थी| और ये सब बताते समय उनके चेहरे की चमक देखने लायक होती, लगता जैसे वो उन दिनों को फिर से जी रहे हैं| रज्जन तो अपनी याद में पहले तो तीन दिन वाली बरात में गया था, लेकिन अब तो दूसरे दिन ही सबेरे लोग वापस आ जाते| शुरू शुरू में जब सुक्खू चच्चा बताते कि उनके जमाने में तो बारात का मतलब कम से कम एक हफ्ता, तो उसे अचरज होता| लेकिन जब वो बैलगाड़ी और घोड़े हाथी वाली बारात की कहानी सुनता तो उसे यकीन हो जाता|
पूरे गांव के हर घर की रिश्तेदारी के बारे में सुक्खू चच्चा उसको बताते, कैसे रग्घू के ननिहाल गए तो कैसे रामू के ससुरारी| उसको बहुत मजा आता सुनने में और वो भी उन घटनाओं की कल्पना में डूब जाता| गांव में किसी के भी घर अगर कोई बुजुर्ग रिश्तेदार आता तो सुक्खू चच्चा से मिलने जरूर आता| फिर सुक्खू चच्चा उसको बताते कि इसके गांव वो लोग कैसे गए थे| कुल मिलाकर सुक्खू चच्चा एक जीता जागता ग्रन्थ थे और रज्जन उसका पाठक| लेकिन उनको अपने दुआरे किसी का भी उधम मचाना फूटी आंख नहीँ सुहाता था| बड़े बच्चों को तो ये पता था इसलिए वो नहीँ आते थे, लेकिन छोटे बच्चे अक्सर उनसे झाड़ खाकर भागते| रज्जन के साथ वाले बच्चे ये बात जानते थे इसलिए वो रज्जन के साथ खेलने कभी उसके दुआर पर नहीँ आते थे| शुरू में तो रज्जन को न तो पता था और न ही उसने कभी इसपर ध्यान दिया| लेकिन धीरे धीरे उसे लगने लगा कि वो तो सबके दरवाजे पर जाकर खेलता है लेकिन उसके दरवाजे पर कोई नहीँ आता| फिर उसने ध्यान देना शुरू किया कि अगर गलती से भी कुछ बच्चे उसके दरवाजे पर खेलने लगें तो सुक्खू चच्चा उनको डांट कर भगा देते हैं| उसने कई बार सोचा कि सुक्खू चच्चा को इस बारे में कुछ कहे लेकिन फिर समझ नहीं पाता कि कैसे कहे| उसे आश्चर्य भी होता कि उससे इतना लाड़ जताने वाले सुक्खू चच्चा आखिर दूसरे बच्चों से इतना खफा कैसे हो जाते हैं, लेकिन उसे अपने सवालों का कोई जवाब नहीँ सूझता|
रज्जन ने कई बार अपने दोस्तों से कहा भी कि उसके दरवाजे पर चल कर खेलें, लेकिन सबने मना कर दिया| सबको ये बात मालूम थी कि अगर वो वहां खेलने गए तो सुक्खू चच्चा उनको खदेड़ देंगे| अलबत्ता रज्जन को लगा कि अगर वो उनके साथ खेल रहा होगा तो शायद सुक्खू चच्चा उनको भला बुरा नहीँ कहें| उसने अपने दोस्तों से बात की और उनको तैयार किया कि वो उसके दरवाजे पर आकर खेलें| उसके दोस्तों को डर तो था, लेकिन रज्जन के समझाने पर मान गए और अगले दिन उसके दरवाजे पर आकर खेलने के लिए तैयार हो गए| रज्जन ने एक बार सोचा कि वो चच्चा से कह दे कि उसके दोस्त कल खेलने आने वाले हैं, लेकिन वो कह नहीं पाया|
अगले दिन दोपहर बाद रज्जन के दोस्तों की टोली डरते डरते उसके दरवाजे पर इकठ्ठा हुई| संयोग से उस समय सुक्खू चच्चा खेत की तरफ गए हुए थे और फिर सबका खेल शुरू हुआ तो वो सब भूल ही गए कि वो कहाँ खेल रहे हैं| तकरीबन एक घंटा गुजरा होगा कि चच्चा खेत से लौटे और दुआर पर होती धमाचौकड़ी को देखकर एकदम से उबल पड़े| जैसे ही उन्होंने बच्चों को डपट के भगाना शुरू किया, रज्जन को तो सांप सूंघ गया| लेकिन भागते बच्चों की निगाह जैसे उससे कह रही थी कि देखो हमने कहा था ना कि यही होगा| अबतक रज्जन को भी इसका एहसास हो चुका था और वो भाग कर चच्चा के सामने गया और चिल्लाकर बोला "आखिर क्यों आप बच्चों को भगा देते हैं दरवाजे से, मैं भी तो जाता हूँ सबके दरवाजे पर खेलने, वहां तो कोई कुछ नहीँ कहता"|
सुक्खू चच्चा का चेहरा एकदम से फक्क पड़ गया, उनको सपने में भी इसकी उम्मीद नहीँ थी, खासकर रज्जन से| उन्होंने एकबार भागते लड़कों को देखा, फिर रज्जन को और भरे मन से इतना ही कहा "बखानल बिटिया डोमन के", और वहां से जाकर अपनी झोलंगी खटिया पर निढाल हो गए|  

Thursday, September 22, 2016

अनमोल खजाना--लघुकथा

आज पूरे डेढ़ महीने बाद वो लौटा था घर, इस बार टूर बहुत लंबा हो गया| निकला तो था सिर्फ १० दिन के लिए लेकिन काम बढ़ता गया और फिर समय आगे बढ़ता गया| घर से हर दूसरे दिन फोन आता कि कब आ रहे हो, वो हर बार बताता कि शायद दो चार दिन और लगेंगे| सबसे ज्यादा दिक्कत तब होती जब उसकी छोटी बच्ची फोन पर पूछती कि पापा कब आओगे| ऐसे में उसका दिल कचोट के रह जाता, काश किसी तरह घर जल्दी पहुँच जाए|
छोटी सी नौकरी, उस पर सेल्स का काम, कंपनी उसे यहाँ से वहां दौड़ाती रहती| उसकी इच्छा नहीं होती थी जाने की लेकिन मज़बूरी में जाना ही पड़ता| बाहर रहने में कितनी दिक्कत होती, ये वही जानता था| कंपनी जितना देती थी उतना खर्च करके वो आराम से रह सकता था, लेकिन फिर बचता क्या? आखिर पत्नी, छोटा भाई और एक बच्ची, सबको एक वही तो रोटी खिलाने वाला था| लेकिन वह चाह कर भी बड़े घर से आयी पत्नी को समझा नहीं पाता था, उसे तो यही लगता था कि वो बाहर खूब मजे करता है|
यथासंभव उसने पत्नी, भाई और बच्ची के लिए कुछ न कुछ खरीद लिया था| भाई तो बहुत खुश हुआ, बेटी भी खूब खेल रही थी लेकिन पत्नी का मुंह उतर गया| उसने इस बार पक्का वादा किया था कि उसके लिए बढ़िया सा गिफ्ट लाएगा, लेकिन पैसे बस उतने ही बचे थे| शाम से रात हो गयी, अनमने ढंग से पत्नी ने खाना खिलाया और फिर बिस्तर पर लेट गयी| उसका मूड देखकर उसकी हिम्मत नहीं थी कि उससे कुछ कहे, अपना तकिया ठीक करके वो लेट गया| लेटे लेटे एक तरफ सो रही बेटी को वो देख रहा था कि वो उठी और उसके सीने पर लेट कर सो गयी| उसकी पिछले डेढ़ महीने की थकान एकदम से गायब हो गयी, एक अनमोल खजाना जैसे मिल गया| उसने भी बेटी को हल्का सा भींचा और उसके सर पर हाथ फेरता हुआ मीठी नींद के आगोश में खो गया| 

असली श्रद्धा--लघुकथा

पिछले एक हफ्ते से सामने वाले मुन्नू के घर में खूब गहमा गहमी थी, रग्घू को पता था कि शहर में रहने वाले उसके दोनों भाई भी परिवार सहित आ गए हैं| अक्सर शांत रहने वाले घर में रौशनी खूब जगमगा रही थी| कभी कभी वो चला जाता था वहां और मुन्नू से होने वाले भोज के बारे में सुनता और वापस आ जाता| लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाबू कभी भी मुन्नू के घर जाने का नाम नहीं लेते थे|
आज तो भोज का दिन था और सुबह से ही हलवाई तमाम तरह के पकवान बनाने में व्यस्त थे| रग्घू ने एक बार दरवाजे पर पड़ी खटिया पर लेटे बाबू को कहा कि वो जाकर मुन्नू के घर बैठ जाएँ, शायद उनकी कुछ मदद ही हो जाए, लेकिन बाबू टस से मस नहीं हुए| गाय को चारा देकर जब वो आया तो बाबू को वहीँ बैठे देखकर उसे थोड़ा गुस्सा आ गया|
उसने उनके पास जाकर झुंझलाते हुए कहा "पूरे गाँव में कहीं भी कुछ होता है तो आप मना करने के बाद भी पूरा पूरा दिन वहां लगे रहते हैं| और आज सामने है तो जाने का नाम ही नहीं लेते, आखिर बात क्या है", उसे लगा कि शायद मुन्नू से कभी कुछ कहासुनी हो गयी होगी|
"अरे बोला ना कि नहीं जाऊंगा वहां, तो तू समझता क्यों नहीं है", बाबू ने करवट बदल लिया|
"लेकिन बात क्या है, क्या मुन्नू से कुछ खट पट हो गयी आपकी| ठीक है अगर आप नहीं ही जाना चाहते हैं तो मैं चला जाता हूँ, आपका भी खाना लेते आऊंगा", रग्घू घर में जाते हुए कहा|
"मेरे लिए मत लाना खाना वहां से, मैं नहीं खा पाउँगा| तुम वजह जानना चाहते हो ना, तो बताता हूँ| अपने पिताजी के श्राद्ध के लिए ही ये सारा ताम झाम कर रहे हैं वो लोग, पर मुझे आज भी उनका खाट पर पड़े पड़े चिल्लाना याद आता है| उसके भाई तो शहर से कभी आये नहीं देखने और न उनको लेकर ही गए, लेकिन मुन्नू भी तो उनको हमेशा जानवरों की तरह ही रखता था| कितनी बार ही मैंने उनका कपडा बदला, उनको पानी पिलाया और दवा वगैरह दी| और जब मैंने मुन्नू से उनका ध्यान रखने के लिए कहा तो मेरे ऊपर ही भड़क गया कि अपने काम से काम रखें और उसके घर के मसले में दखल ना दें| मुझसे आज उनके मौत के उत्सव का भोज नहीं खाया जायेगा", बाबू ने अपनी आंख गमछे से पोंछ ली|
रग्घू ने आकर उनके कंधे पर हाथ रखा और उनको आस्वस्त करते हुए बोला "कोई बात नहीं, आप का खाना घर ही बनवा देता हूँ| लेकिन आपको अगर कभी भी लगे कि मैं आपका ध्यान रखने में कोई भी लापरवाही कर रहा हूँ तो मुझे कस के डांट देना"|
रग्घू घर में बाबू के खाने के लिए बोलने चला गया, बाबू ने एक बार आसमान की और देखा और मुन्नू के पिताजी से छमा मांग ली|

शहादत-- लघुकथा

"जल्दी खोलो टेलीविजन, कुछ बड़ा हादसा हुआ है, शायद अपने कुछ जवानों के मारे जाने की खबर है", उसने बैठक में घुसते हुए कहा| उसके सेक्रेटरी ने जल्दी से टी वी खोला और उस समय फ़्लैश हो रही ब्रेकिंग न्यूज़ में बस कैम्प पर हुए हमले की ही खबर आ रही थी| उसने जल्दी जल्दी कई चैनल बदले, सब जगह बस यही खबर चल रही थी| 
वहां बैठे सभी लोगों के चेहरे पर जैसे दर्द बरस रहा था, धीरे धीरे हमले में हताहत जवानों के नाम भी आने लगे थे| जैसे जैसे नाम आते जा रहे थे, सबकी ऑंखें भीग रही थीं| अब उन जवानों के बारे में भी खबर आने लगी थी कि कौन किस जिले या गाँव का है और कौन किस जाति या संप्रदाय का|
लगभग एक घंटे बीत गए, अब सभी हताहत जवानों के नाम पूरे हो चुके थे| हर व्यक्ति गुस्से और दुःख से एकदम भरा हुआ था और उन आततायियों को कोस रहा था जिन्होंने ये कायराना हमला किया था| इतने वो सोफे से उठा और रिमोट पटककर बाहर निकल गया, सेक्रेटरी भी पीछे पीछे बाहर आया| अभी सेक्रेटरी उससे कुछ कहता कि उसकी आवाज़ सुनाई दी "इतने जवानों में कोई भी अपने जिले का नहीं है| काश होता तो थोड़े से प्रयास और झूठी हमदर्दी से कितने वोट पक्के हो गए होते आने वाले चुनाव में"|

Tuesday, September 13, 2016

भागीदारी--लघुकथा

"देखिये बाबूजी, मैं फिर से कह रहा हूँ कि राजनीति में नहीं उतरूँगा| आखिर इतने बड़े कॉलेज में दाखिला इसके लिए तो नहीं लिया है मैंने, मैं भी कहीं बाहर जॉब करना चाहता हूँ", कॉलेज के लिए निकलते समय टोक दिए जाने से वो विचलित हो गया|
"आखिर क्यों बाहर जाना चाहता है, अपने देश में क्या कमी है", बाबूजी ने बिस्तर पर लेटे लेटे ही बोला|
"कमी, अरे कमी छोड़िये, कोई एक अच्छाई तो बताईये इस देश में| हर जगह बस भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और गुंडागर्दी", उसने पलट के बोला|
"वो तो ठीक है, लेकिन कभी इसकी वजह भी टटोलने की कोशिश की है तुमने", बाबूजी ने समझाया|
"वजह तो ये आज के नेता और नौकरशाह ही हैं, आप भी तो राजनीति में थे, क्या मिला आपको", उसने उसी तरह तैश में बोला|
"हाँ, मैं भी राजनीति में था और मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी| बस अपने लिए कभी कुछ नहीं किया क्योंकि मेरे लिए समाज सबसे पहले था| और अगर आज के नेता ऐसे हैं तो क्या इसमें तुम्हारा दोष नहीं है, क्यों नहीं तुम उनसे अलग होने की आकांक्षा रखते और जो चीजें तुम्हें तकलीफ दे रही हैं, उसके इलाज़ में भागीदारी करते", भावावेश में बाबूजी हांफने लगे|
उसके कदम रुक गए, उसने आगे बढ़कर बाबूजी को सहारा दिया और पानी का गिलास पकड़ा दिया|
"इस सहारे की मुझसे ज्यादा इस समाज को जरुरत है" बोलते हुए बाबूजी वापस लेट गए| उनकी बंद आँखों में अपने अधूरे सपने आज भी तैर रहे थे| 

Monday, September 12, 2016

इंसानी फितरत--लघुकथा

"क्या बात है, बहुत उदास हो, ये तो हमारे उदास होने का समय है", मुन्नू ने पुचकारते हुए भोली से पूछा|
"अरे तुम्हारे और हमारे में बहुत फ़र्क़ है, कम से कम तुम तो सबके लिए बराबर तो हो", भोली ने अनमने ढंग से जवाब दिया|
"हाँ, सही कहा, हम सबके लिए बराबर हैं, सब उतने ही बेरहमी से हमें काटते हैं| लेकिन तुम तो अधिकांश जगह पूजी जाती हो, फिर क्यों उदासी", मुन्नू ने थोड़े अचरज से कहा|
"पूज्यनीय, बस तभी तक, जब तक दूध है| उसके बाद तो हम तुमसे भी बुरी हालात में हो जाते हैं", भोली की आँखों में खौफ उतर आया|
"अच्छा तो क्या तुम भी, मुझे तो लगा सिर्फ हम ही कटते हैं", मुन्नू को आश्चर्य हो रहा था|
"तुम क्या जानो उस दर्द को जब हम उन्हीं घरों से खदेड़ दिए जाते हैं, जिनको हमने अपने दूध से सींचा होता है", भोली के आँखों से बूंदें छलक आयीं|
"वो दर्द तो हम भी झेलते हैं, कुछ घरों में तो हमारे दूध से भी बच्चे पलते हैं| वैसे इंसान तो अपने माँ बाप को भी ऐसी हालत में दूर फेंक देता है", मुन्नू ने एक आह भरी|
"एक और दंश हम झेलते हैं, हमारे चक्कर में कुछ लोग बेमौत भी मारे जाते हैं| लेकिन हमारी दशा वैसे ही रहती है, कम से कम तुम तो ऐसा दंश नहीं झेलते", भोली ने गहरी सांस लेते हुए कहा|
"हाँ, ये तो है, हम तो हर मज़हब के लोगों को एक समान स्वीकार्य हैं| कभी हमारे लिए जान नहीं जाती, बस हमारी जान जाती है" मुन्नू ने हामी में सर हिलाया|
"खैर, तुम तो अपने मालिक द्वारा उपयोगी समझ के बेचे जाते हो लेकिन हम तो बेकार समझ के| इसका दर्द बेहद सालता है" भोली अब एकदम उदास हो गयी थी|
"सही कहा, ये इंसानी फितरत है, बस अपना फायदा देखता है", मुन्नू ने दिलासा देते हुए कहा|
इतने में उसके रस्सी को पकड़कर मालिक खींचता हुआ चल पड़ा, भोली ने सर हिला कर उसे अलविदा कहा और फिर से उदास हो गयी|    

विसर्जन-- कहानी

"गणपति बप्पा मोरिया" की आवाज़ अबीर गुलाल और कानफाड़ू संगीत के बरसात के बीच गूंज रही थी, सड़क को निकलने वाले जुलुस ने पूरी तरह से जाम कर दिया था। किसी तरह बचते बचाते वो निकल रही थी कि एक गेंदे का फूल आकर छाती पर लगा और नज़र अनायास उस ट्रक की ओर चली गयी। भक्तों की भीड़ में दिख ही गया लखना, अपने साथियों के साथ बज रहे संगीत पर झूम रहा था, या नशे में, समझना मुश्किल था। घृणा से एक जलती निगाह उसने उसकी ओर फेंकी और जल्दी जल्दी आगे बढ़ने लगी। पता नहीं मेडिकल स्टोर भी खुला होगा या नहीं इसी चिंता में वो परेशान थी कि ये लखना भी मिल गया।
पूरी रात में बिना रुके बजने वाले संगीत ने उसके पिता के मर्ज को बढ़ा दिया था। घर पर दवा ख़त्म हो गयी थी और अब किसी तरह दवा लाकर उनको दे सके तो राहत मिले इसीलिए इस माहौल में भी वो घर से निकल पड़ी। पिछले कुछ सालों से उसके घर से सटे हुए प्लाट में ही सभी धार्मिक कार्यक्रम होने लगे थे। दरअसल वो प्लाट जिसका था वो विदेश में रहता था और उसने इन्वेस्टमेंट के हिसाब से उसे खरीद लिया था। लेकिन जब कई सालों तक उसने प्लाट पर कुछ नहीं बनवाया तो कुछ लोगों को वहां कुछ और सूझ गया और रातों रात वहां एक छोटा सा शिवलिंग निकल गया। फिर एक छोटा सा मंदिर और एक पीपल का पेड़ भी वहां खड़ा हो गया और धर्म की दुकान सज गयी| सालों तक शांत रहने वाला उसका इलाका अब ऐसे तत्वों से गुलज़ार रहने लगा जो दिन में तो धर्म के झंडाबरदार दीखते लेकिन शाम होते ही उनका धर्म बदल जाता| फिर गांजा, शराब और अन्य सभी नशे का सामान वहां इकट्ठा होते और देर रात तक यही दौर चलता रहता| शुरू में उसके पिता ने ऐतराज किया लेकिन उन लोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया और बाद में धमकी देना आरम्भ हो गया| अब वो जगह एक तरह से उसके मालिक के हाथ निकल गयी और एक मुकदमा अपनी मौत मरने के लिए कचहरी में दाखिल हो गया था।
अब चाहे गणेश पूजा हो, दुर्गा पूजा हो या कुछ और, सारे पंडाल वहीं बनते थे। और लखना और उसकी टीम के लोग चंदा मांगने तो ऐसे आते थे जैसे कि उसने ही कुछ उधार लिया हो पूजा कमिटी से। एक बार तो जब उसके पिता ने मना किया तो इसी लखना ने एक आंख दबाते हुए कहा था कि जाने दो, अपने होने वाले रिश्तेदार से चंदा नहीं लेते हैं। और फिर उसने पिता को साफ़ शब्दों में बोल दिया था कि बिना किसी हुज्जत इनको चंदा दे दिया करें। पंडाल बनने में कई दिन लगते थे और लखना किसी न किसी बहाने उसके घर आ ही जाता था और फिर उसकी गन्दी नज़र। पता नहीं कितनी बार उसने पंडाल में प्रार्थना की होगी कि इस लखना की ऑंखें न रहें लेकिन उस जैसे की प्रार्थना तो मानव भी नहीं सुनते तो कोई और क्या सुने! अक्सर शाम को निकलते समय लखना नशे में धुत्त उसी पंडाल के आस पास मिल जाता और फिर वो कई मौत मरती हुई जाती आती।
मोहल्ले में बहुत से लोग समझते भी थे लेकिन एक तो धर्म की बात और दूसरे उन लफंगों के मुह कौन लगे, आखिर अधिकांश लोग लड़कियों के बाप थे। ऐसे में उनको बर्दास्त कर लेने के सिवा कोई चारा नहीं सूझता था। पिता से तो वो भूल कर भी कुछ नहीं कहती थी, उनका ब्लड प्रेसर वैसे ही हाई रहता था, अगर कुछ हो गया तो। इसी तरह सभी त्यौहार बीत रहे थे, रात रात भर बजते बेहद तेज संगीत और शोर उसके पिता को और बीमार बना देते थे। कई बार उसने सोचा कि पुलिस के पास जाए लेकिन पुलिस के बारे में उसने जो सुन रखा था, उसके चलते हिम्मत नहीं जुटा पायी| एकाध बार तो उसने शाम को पुलिस वालों को भी वहां धुआं उड़ाते देखा था| खुद लड़ने की हिम्मत वो जुटाना चाहती थी लेकिन कर नहीं पाती थी|
इन्हीं ख्यालों में डूबी हुई वो लगभग भागते हुए दुकान पहुंची जो भाग्य से खुली हुई थी। पिता की दवा लेकर जैसे ही वो मुड़ने को हुई, उसकी नज़र शेल्फ में रखे डिस्पोसेबल सिरिंज पर पड़ी। अक्सर उसे वो सिरिंज दिखती थी लेकिन कुछ सूझता नहीं था| आज मन में एक विचार कौंधा और उसकी ऑंखें चमक उठीं| उसने कांपते हाथों से एक सिरिंज उठाया और उसे लेकर जल्दी जल्दी वापस चल दी। जैसे जैसे वो आगे बढ़ रही थी, सिरिंज होने के बाद भी डर से उसका बदन काँप रहा था| फिर भी आज पहली बार वो उस जुलूस का हिस्सा बनना चाहती थी| जैसे ही उसकी नज़र उस ट्रक पर पड़ी जिसमें लखना सवार था, एक बार फिर उसका बदन सिहर उठा| लेकिन अंदर से हिम्मत जुटाते हुए उसने लखना को देखा और एक फीकी मुस्कान उसके चहरे पर आ गयी| लखना को जैसे लगा कि उसको उतर आने का इशारा मिला हो और वो नाचते हुए ट्रक से उतर गया। दोनों मुट्ठी में गुलाल लेकर झूमते हुए वो जैसे ही उसकी तरफ बढ़ा, उसने भी अपनी मुट्ठी मजबूत कर ली।
नशे में झूमता हुआ लखना उसके पास पहुंचा और उसने दोनों हाथों में लिया गुलाल उसकी ओर उड़ा दिया। अभी वो सोच ही रही थी कि अपने मुट्ठी में लिया सिरिंज वो उसकी आँखों में चुभो दे, तब तक लखना के साथियों ने भी उसको घेर लिया| चारो तरफ बज रहे शोर और उड़ते हुए गुलाल में उसकी मुट्ठी खुल ही नहीं पायी और उस भीड़ में वो फंस गयी। फिर अगले कुछ मिनट में तमाम हाथ उसके गाल और अन्य अंगों पर रेंग रहे थे| उसके मुट्ठी से सिरिंज पता नहीं कब छूट के गिर गयी और बस दवा की थैली उसके हाथ में बची थी|
ट्रक आगे बढ़ गया और वो सदमे के हालात में खड़ी थी| फिर हिम्मत जुटाकर वो जल्दी जल्दी घर की तरफ भागी, पिता को दवा देनी थी। चारो तरफ गणपति बप्पा की जय जयकार हो रही थी, लोग नाच गा रहे थे और लखना एक बार फिर जय जयकार करता हुआ ट्रक पर सवार हो गया| उसके कानों में गूंजता हुआ जयकारा उसके ह्रदय को बेध रहा था और उसके मुह से निकल गया "अगले बरस तू मत ही आ"। 

Saturday, September 10, 2016

विसर्जन--लघुकथा

"गणपति बप्पा मोरिया" की आवाज़ अबीर गुलाल और कानफाड़ू संगीत के बरसात के बीच गूंज रही थी, सड़क को निकलने वाले जुलुस ने पूरी तरह से जाम कर दिया था। किसी तरह बचते बचाते वो निकल रही थी कि एक गेंदे का फूल आकर छाती पर लगा और नज़र अनायास उस ट्रक की ओर चली गयी। भक्तों की भीड़ में दिख ही गया लखना, बज रहे संगीत पर झूम रहा था, या नशे में, समझना मुश्किल था। घृणा से एक जलती निगाह उसने उसकी ओर फेंकी और जल्दी जल्दी आगे बढ़ने लगी। पता नहीं मेडिकल स्टोर भी खुला होगा या नहीं इसी चिंता में वो परेशान थी कि लखना भी मिल गया।
पूरी रात में बिना रुके बजने वाले संगीत ने उसके पिता के मर्ज को बढ़ा दिया था। अब किसी तरह दवा लाकर उनको दे सके तो राहत मिले इसीलिए इस माहौल में भी वो घर से निकल पड़ी। पिछले कुछ सालों से उसके घर से सटे हुए प्लाट में ही सभी धार्मिक कार्यक्रम होने लगे थे। दरअसल वो प्लाट जिसका था वो विदेश में रहता था और उसने इन्वेस्टमेंट के हिसाब से उसे खरीद लिया था। लेकिन जब कई सालों तक उसने प्लाट पर कुछ नहीं बनवाया तो कुछ लोगों को वहां कुछ और सूझ गया और रातों रात वहां एक छोटा सा शिवलिंग निकल गया। अब वो जगह एक तरह से उसके मालिक के हाथ निकल गयी और एक मुकदमा अपनी मौत मरने के लिए कचहरी में दाखिल हो गया था।
अब चाहे गणेश पूजा हो, दुर्गा पूजा हो या कुछ और, सारे पंडाल वहीं बनते थे। और लखना और उसकी टीम के लोग चंदा मांगने तो ऐसे आते थे जैसे कि उसने ही कुछ उधार लिया हो पूजा कमिटी से। एक बार तो जब उसके पिता ने ऐतराज किया तो इसी लखना ने एक आंख दबाते हुए कहा थे कि जाने दो, अपने होने वाले रिश्तेदार से चंदा नहीं लेते हैं। और फिर उसने पिता को साफ़ शब्दों में बोल दिया था कि बिना हुज्जत इनको चंदा दे दिया करें। पंडाल बनने में कई दिन लगते थे और लखना किसी न किसी बहाने उसके घर आ ही जाता था और फिर उसकी गन्दी नज़र। पता नहीं कितनी बार उसने पंडाल में प्रार्थना की होगी कि इस लखना की ऑंखें न रहें लेकिन उस जैसे की प्रार्थना तो मानव भी नहीं सुनते तो कोई और क्या सुने! अक्सर शाम को निकलते समय लखना नशे में धुत्त उसी पंडाल के आस पास मिल जाता और फिर वो कई मौत मरती हुई जाती आती।
मोहल्ले में बहुत से लोग समझते भी थे लेकिन एक तो धर्म की बात और दूसरे उन लफंगों के मुह कौन लगे, आखिर सब लड़कियों के बाप थे। अब ऐसे में उनको बर्दास्त कर लेने के सिवा कोई चारा भी नहीं था। पिता से तो भूल कर भी कुछ नहीं कहती थी, उनका ब्लड प्रेसर वैसे ही हाई रहता था, अगर कुछ हो गया तो। इसी तरह सभी त्यौहार बीत रहे थे, रात रात भर बजते बेहद तेज संगीत और शोर उसके पिता को और बीमार बना देते थे।
लगभग भागते हुए वो दुकान पहुंची और भाग्य से खुली हुई थी। पिता की दवा लेकर जैसे ही वो मुड़ने को हुई, उसकी नज़र शेल्फ में रखे डिस्पोसेबल सिरिंज पर पड़ी। उसने एक सिरिंज भी लिया और जल्दी जल्दी वापस चल दी। आज पहली बार वो उस जुलूस का हिस्सा बनना चाहती थी और जैसे ही उसकी नज़र उस ट्रक पर पड़ी जिसमें लखना सवार था, उसने लखना को उतर आने का इशारा किया। लखना उतरा और दोनों मुट्ठी में गुलाल लेकर उसकी तरफ बढ़ा, उसने भी अपनी मुट्ठी मजबूत कर ली। नशे में झूमता हुआ लखना उसके पास पहुंचा और उसने दोनों हाथों में लिया गुलाल उसकी ओर उड़ा दिया। चारो तरफ बज रहे शोर और उड़ते हुए गुलाल में भी उसका निशाना सही बैठा और लखना अपनी आंख पर हाथ रखकर भागा। वो भी जल्दी जल्दी घर की तरफ भागी, पिता को जल्दी से दवा देनी थी। चारो तरफ गणपति बप्पा की जय जयकार हो रही थी, लोग नाच गा रहे थे और लखना अपनी आँखों से बहते खून को रोकने की कोशिश करता हुआ गिरा पड़ा था। आज पहली बार उसे गूंजता हुआ जयकारा बेहद अच्छा लग रहा था और उसने भी ऊँची आवाज़ में कहा "अगली बरस तू जल्दी आ"। 

Tuesday, September 6, 2016

बराबरी--लघुकथा

"मैं संजू से शादी कर रही हूँ और हम लोग चेन्नई शिफ्ट कर रहे हैं", घर में घुसते ही उसने माँ से कह दिया| बैग को टेबल पर रखकर उसने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और पीने लगी, माँ उसे देखे जा रही थी|
"लेकिन चेन्नई शिफ्ट करने की क्या जरुरत है, मुझे तो कोई ऐतराज नहीं है तुम लोगों की शादी से", माँ ने पूछा|
"दर असल उसको एक बढ़िया जॉब मिल गयी है चेन्नई में और मैंने भी अपने ट्रांसफर की अर्जी लगा दी है", उसने सोफे पर बैठते हुए कहा|
"तो अब तुम उसके हिसाब से चलोगी, ख़त्म हो गयी सब बराबरी की बातें", माँ के लहजे में व्यंग ज्यादा था|
"बराबरी आज भी है माँ, अभी उसको एक बढ़िया जॉब मिली है और मेरा भी ट्रांसफर हो सकता है तो फिर क्यों नहीं जाऊँ", उसने माँ को समझाते हुए कहा|
"मैंने अपने उसूलों से समझौता नहीं किया और अकेले तुम्हारी परवरिश की मैंने| और तुम मुझे ही समझा रही हो कि बराबरी क्या होती है", माँ की आवाज़ में निराशा साफ़ झलक रही थी|
"माँ, तुम मान क्यों नहीं लेती कि तुम्हारा फैसला गलत था| आखिर पापा को इतनी बढ़िया जॉब मिली थी तो तुम्हें अपना ट्रांसफर करा लेने में क्या दिक्कत थी| कल को अगर मुझे कोई बढ़िया जॉब मिलती है और संजू का ट्रांसफर हो सकता है तो वो जरूर आएगा मेरे साथ| बराबरी का अर्थ एक दूसरे को समझना भी तो होता है, न कि अपना ईगो ऊपर रखना"|
उसने अपना बैग उठाया और कमरे में चली गयी, पापा की कमी आज भी उसको खलती थी|