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Monday, September 26, 2016

बखानल बिटिया डोमन के--कहानी

सुक्खू चच्चा आज बहुत उदास थे, बात ही कुछ ऐसी थी| उनको तो सपने में भी यकीन नहीं था कि रज्जन ऐसा कह सकता है उनसे| दरवाजे के किनारे पड़ी अपनी झलंगी खटिया पर लेटे हुए वो आसमान देख रहे थे, पता नहीं ऊपर दऊ से शिकायत कर रहे थे या अपना दर्द बाँट रहे थे| वैसे उनके आदत के हिसाब से कोई बड़ी बात भी नहीं थी, बस दुआरे पर हड़बोंग मचा रहे गदेलों को उन्होंने डांट के भगाया ही तो था| अक्सर ही वो ऐसा किया करते थे|
भरे पूरे परिवार में सब ठीक ही था, दो बेटे थे जिसमें एक गांव पर ही रहकर खेती बाड़ी संभालता था, तो दूसरा एक कंपनी में नौकरी करता था| वैसे अब तो वो बब्बा बन गए थे लेकिन पूरा गाँव उनको सुक्खू चच्चा ही कहता था| सुक्खू चच्चा अक्सर दूसरे बेटे को टोका करते थे कि ये कौन सी नौकरी करते हो तुम जिसमें न तो समय से छुट्टी मिलती है और न ही कोई नौकर चाकर मिलते हैं| और फिर शुरू हो जाते अपने नौकरी का बखान करने "अरे नौकरी तो हम लोग करत रहे, अंग्रेजन का समय था तो क्या, कितना इज़्ज़त मिलता था| घोड़ा पर सवार होकर जब हम अपने इलाका में निकलते थे तो लोग सलाम ठोंका करते थे| मजाल थी कि कोई नान्ह जात अपने दरवाजे पर खटिया पर बैठा मिल जाए"| ये कहते समय उनके चेहरे पर आज का माहौल तैर जाता था जहाँ अब नान्ह जात के नए लड़के उनके सामने खटिया पर बैठे रहते थे| हाँ पुराने लोग आज भी उनकी इज़्ज़त करते और खटिया छोड़ के खड़े हो जाते थे|
अब न तो दरवाजे पर घोडा था और न हीं वो पुराना समय जब खेतों में काम करने के लिए मजूर बनिहार जितना चाहे मिल जाते थे| कभी कभी बात करते करते अपने समय में खो जाते और बताने लगते "अरे एक हमार समय था कि बस एक आवाज़ पर आधा चमरौटी के लोग खेत में आ जाते थे| और आज तो कौनों मिलते ही नाहीं हैं, बस जिसको देखो साडी की बुनाई कर रहा है| अरे इ काम तो जुलाहन का था लेकिन अब त इ सब भी इसी में घुस गए हैं"| खेती के बारे में भी उनकी जानकारी और उससे जुडी पुरानी यादें वो जब तब सबसे साझा किया करते थे| खेती करने वाले चच्चा ने तो ऊबकर उनसे बात करना ही बंद कर दिया था, कौन दिन रात की किच किच पाले| हर चीज में सलाह और टोका टाकी उनसे बर्दास्त नहीँ हुई, शुरू शुरू में कई बार झगड़ा हुआ, फिर लोगों की सहानुभूति अपने पिता की तरफ देखकर उनको यही उचित लगा| गाहे बगाहे सुक्खू कह ही देते "अरे, हमार पैदाईस होके हमके समझावला, तन्नी सा ज्ञान का हो गयल, हमहीं के चरावे लगला", और उनकी इस बात का खेतिहर चच्चा कोई जवाब नहीँ देते|
कुल मिलाकर सात नाती पोता थे उनके लेकिन सबसे ज्यादा मानते थे रज्जन को| वैसे उसका नाम तो राजन था लेकिन सुक्खू चच्चा उसको हमेशा रज्जन ही बुलाते थे| पता नहीँ दुलार से या उनको रज्जन बोलने में ही सुविधा होती थी| रज्जन शहर में रहता था और साल में कम से कम एक बार गर्मी की छुट्टी में जरूर गांव आता था| वो दो महीने खूब धमाचौकड़ी के होते थे और दुआर पर कभी कभी, जब सुक्खू चच्चा नहीं रहते थे, तो लड़को बच्चों की भीड़ भी लग जाती थी| उनके रहते तो शायद ही कोई हिम्मत करता आने का, सबको पता था कि डपट के खदेर दिए जायेंगे| सिर्फ बच्चे ही नहीँ, अगल बगल के घर से कोई कुक्कुर भी नहीँ आता था उनके दुआरे| बड़ा सटीक निसाना था सुक्खू चच्चा का, खींच के ऐसा गोजी मारते कि कुक्कुर कांय कांय करते भाग खड़ा होता| हाँ, रात में जरूर कोई कुक्कुर दुआरे झाड़ा फिर के भाग जाता और फिर भिन्सहरा सुक्खू चच्चा उसके कई पुस्त को कोसते हुए उसकी लेड़ी फरसा से उठा कर फ़ेंकते|
रज्जन गाहे बगाहे सुक्खू चच्चा के पास बैठ जाता, उनसे कुछ कुछ पूछा करता| सुक्खू चच्चा खूब हुलस हुलस कर उसको बताते और साथ साथ अपने जमाने के भी कुछ किस्से सुनाते| सुक्खू चच्चा के खाने के समय अक्सर रज्जन ही उनको बुलाकर ले जाता, खाना खिलाता और फिर जब वो आकर खटिया पर लेट जाते तो गांव में निकल जाता| उनके नहाने के लिए इनारा से पानी भी अक्सर वही काढ़ देता, ये अलग बात थी कि सुक्खू चच्चा उसके अलावा किसी भी बच्चे को इनारा के आस पास भी फटकने नहीँ देते| पता नहीं कितने किस्से रज्जन को अब जबानी याद हो गए थे, फलाने के घर का एक बच्चा इनारा में गिर कर मर गया और १०० बरस का प्रेत बना, आदि आदि| हाँ रज्जन पर उनको भरोसा हो गया था कि वो सावधानी से पानी काढ़ सकता है, इसलिए कई बार उसको अपनी बाल्टी पानी काढ़ कर लाने के लिए दे देते| सुक्खू चच्चा ने ही उसको बताया था कि गर्मी में लेजुर को छाया में रख दिया करे और पानी काढ़ने से पहले उसे पानी से भिगो दिया करे| नहीँ तो शुरू शुरू में तो कई बार उसका हाथ गरम लेजुर से जल गया था|
दिन में अगर रज्जन सुक्खू चच्चा के साथ बैठा रहता तो दुआरे से गुजरने वाला हर व्यक्ति को सुक्खू चच्चा को पलग्गी करते देखता| कुछ लोग तो साइकिल से उतर कर सुक्खू चच्चा के पास आते और हाल चाल पूछते| रज्जन को बड़ा अच्छा लगता कि लोग आज भी चच्चा की कितनी इज़्ज़त करते हैं| लेकिन अगर कोई नई उम्र का लड़का साइकिल के हैंडिल पर रेडियो टांगे गाना सुनता हुआ सामने से गुजर जाता तो सुक्खू चच्चा एक बार जरूर कहते "देखा ससुर के नाती को, नई सौखीनि, खलीथी में गाजर"| बहुत दिनों तक रज्जन समझ नहीँ पाता था उनके ये मुहावरे, लेकिन धीरे धीरे समझने लगा| कई बार तो वो सुक्खू चच्चा से ही पूछ लेता उनके मतलब और वो उसे बहुत मन से समझाते|
सुक्खू चच्चा का रोज का कार्यक्रम एक निश्चित ढर्रे पर ही रहता, भिन्सहरे ही उठ कर लोटा लेकर दिशा मैदान को निकल जाते| लौट कर आने पर दुआरे की नीम के पेड़ से दतुअन तोड़ते और बाल्टी से पानी काढकर इनारा के पास बैठ जाते| दतुअन करके एक लोटा पानी पीते और एक बार सब गोरु के नांद पर जाकर देखते| अगर किसी के नांद में पानी या कोअर नहीँ होता तो या तो खुद ही डाल देते या आवाज़ लगाते| सारे गोरु उनको पहचानते थे और उनके आते ही मुंह उठाकर एक बार अपना सर जरूर सहलवा लेते| नाश्ते के नाम पर अमूमन तो कुछ नहीँ लेते थे, हाँ अगर घर में कुछ स्पेशल बना हो तो खा लेते थे| थोड़ी देर पूजा करना और प्रसाद के रूप में चीनी या गुड़ का छोटा टुकड़ा, जो बच्चों के लिए अमृत जैसा होता था, सबको थोड़ा थोड़ा देना| दोपहर में नहा कर जल्दी खाना खाना और फिर थोड़ी देर सो लेना| नहाना तो शायद ही कभी छूटा हो, चाहे कितनी भी ठण्ड हो, दो ही लोटा सही लेकिन नहाते जरूर| सोकर उठाते तो एक चक्कर सभी खेतों का लगा लेते और कुछ खाने लायक मिल गया तो खेत से लेते आते|
रज्जन अक्सर देर तक सोता रहता और सुक्खू चच्चा उसको कई बार जगाते| कभी प्यार से तो कभी गुस्से से, उसको समझाते कि देर तक सोना अलायों की निशानी है| अक्सर उसको बताते भी कि सूरज निकलने से पहले उठ के दुआर बुहार देना बहुत जरुरी होता है| अगर सूरज निकलने के बाद झाड़ू लगाया तो लक्ष्मी रूठ जाती हैं| लेकिन सुबह जल्दी उठना रज्जन के लिए सबसे मुश्किल काम होता| कई बार जगाने के बाद वो उठ ही जाता और फिर वो भी लोटा लेकर खेतों की ओर निकल जाता| शहर में तो बाथरूम था लेकिन गांव में तो दिशा मैदान के लिए खेत में ही जाना होता| फिर नीम का कड़वा दतुअन बडी मुश्किल से करता और घर में खाने के लिए घुस जाता| बस खाने के लिए ही घर में जाता, बाकी समय या तो सुक्खू चच्चा के साथ या अपने हमउम्र बच्चों के साथ|
खाने पीने के बारे में भी सुक्खू चच्चा उससे बराबर पूछते रहते, कि उसने क्या खाया और कितना खाया| और फिर बीच बीच में अपने जमाने की बात छेड़ देते कि उनके समय में क्या क्या बनता था| उसमें से कई चीज का तो रज्जन ने नाम भी नहीँ सुना होता, कभी वो पूछ लेता, कभी नहीं| सुक्खू चच्चा हर बात पूरी तफ्सील से बताते कि फलाने के तिलक में क्या क्या बना था, ढेकाने के बरात में क्या खातिरदारी हुई थी| और ये सब बताते समय उनके चेहरे की चमक देखने लायक होती, लगता जैसे वो उन दिनों को फिर से जी रहे हैं| रज्जन तो अपनी याद में पहले तो तीन दिन वाली बरात में गया था, लेकिन अब तो दूसरे दिन ही सबेरे लोग वापस आ जाते| शुरू शुरू में जब सुक्खू चच्चा बताते कि उनके जमाने में तो बारात का मतलब कम से कम एक हफ्ता, तो उसे अचरज होता| लेकिन जब वो बैलगाड़ी और घोड़े हाथी वाली बारात की कहानी सुनता तो उसे यकीन हो जाता|
पूरे गांव के हर घर की रिश्तेदारी के बारे में सुक्खू चच्चा उसको बताते, कैसे रग्घू के ननिहाल गए तो कैसे रामू के ससुरारी| उसको बहुत मजा आता सुनने में और वो भी उन घटनाओं की कल्पना में डूब जाता| गांव में किसी के भी घर अगर कोई बुजुर्ग रिश्तेदार आता तो सुक्खू चच्चा से मिलने जरूर आता| फिर सुक्खू चच्चा उसको बताते कि इसके गांव वो लोग कैसे गए थे| कुल मिलाकर सुक्खू चच्चा एक जीता जागता ग्रन्थ थे और रज्जन उसका पाठक| लेकिन उनको अपने दुआरे किसी का भी उधम मचाना फूटी आंख नहीँ सुहाता था| बड़े बच्चों को तो ये पता था इसलिए वो नहीँ आते थे, लेकिन छोटे बच्चे अक्सर उनसे झाड़ खाकर भागते| रज्जन के साथ वाले बच्चे ये बात जानते थे इसलिए वो रज्जन के साथ खेलने कभी उसके दुआर पर नहीँ आते थे| शुरू में तो रज्जन को न तो पता था और न ही उसने कभी इसपर ध्यान दिया| लेकिन धीरे धीरे उसे लगने लगा कि वो तो सबके दरवाजे पर जाकर खेलता है लेकिन उसके दरवाजे पर कोई नहीँ आता| फिर उसने ध्यान देना शुरू किया कि अगर गलती से भी कुछ बच्चे उसके दरवाजे पर खेलने लगें तो सुक्खू चच्चा उनको डांट कर भगा देते हैं| उसने कई बार सोचा कि सुक्खू चच्चा को इस बारे में कुछ कहे लेकिन फिर समझ नहीं पाता कि कैसे कहे| उसे आश्चर्य भी होता कि उससे इतना लाड़ जताने वाले सुक्खू चच्चा आखिर दूसरे बच्चों से इतना खफा कैसे हो जाते हैं, लेकिन उसे अपने सवालों का कोई जवाब नहीँ सूझता|
रज्जन ने कई बार अपने दोस्तों से कहा भी कि उसके दरवाजे पर चल कर खेलें, लेकिन सबने मना कर दिया| सबको ये बात मालूम थी कि अगर वो वहां खेलने गए तो सुक्खू चच्चा उनको खदेड़ देंगे| अलबत्ता रज्जन को लगा कि अगर वो उनके साथ खेल रहा होगा तो शायद सुक्खू चच्चा उनको भला बुरा नहीँ कहें| उसने अपने दोस्तों से बात की और उनको तैयार किया कि वो उसके दरवाजे पर आकर खेलें| उसके दोस्तों को डर तो था, लेकिन रज्जन के समझाने पर मान गए और अगले दिन उसके दरवाजे पर आकर खेलने के लिए तैयार हो गए| रज्जन ने एक बार सोचा कि वो चच्चा से कह दे कि उसके दोस्त कल खेलने आने वाले हैं, लेकिन वो कह नहीं पाया|
अगले दिन दोपहर बाद रज्जन के दोस्तों की टोली डरते डरते उसके दरवाजे पर इकठ्ठा हुई| संयोग से उस समय सुक्खू चच्चा खेत की तरफ गए हुए थे और फिर सबका खेल शुरू हुआ तो वो सब भूल ही गए कि वो कहाँ खेल रहे हैं| तकरीबन एक घंटा गुजरा होगा कि चच्चा खेत से लौटे और दुआर पर होती धमाचौकड़ी को देखकर एकदम से उबल पड़े| जैसे ही उन्होंने बच्चों को डपट के भगाना शुरू किया, रज्जन को तो सांप सूंघ गया| लेकिन भागते बच्चों की निगाह जैसे उससे कह रही थी कि देखो हमने कहा था ना कि यही होगा| अबतक रज्जन को भी इसका एहसास हो चुका था और वो भाग कर चच्चा के सामने गया और चिल्लाकर बोला "आखिर क्यों आप बच्चों को भगा देते हैं दरवाजे से, मैं भी तो जाता हूँ सबके दरवाजे पर खेलने, वहां तो कोई कुछ नहीँ कहता"|
सुक्खू चच्चा का चेहरा एकदम से फक्क पड़ गया, उनको सपने में भी इसकी उम्मीद नहीँ थी, खासकर रज्जन से| उन्होंने एकबार भागते लड़कों को देखा, फिर रज्जन को और भरे मन से इतना ही कहा "बखानल बिटिया डोमन के", और वहां से जाकर अपनी झोलंगी खटिया पर निढाल हो गए|  

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