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Thursday, September 22, 2016

अनमोल खजाना--लघुकथा

आज पूरे डेढ़ महीने बाद वो लौटा था घर, इस बार टूर बहुत लंबा हो गया| निकला तो था सिर्फ १० दिन के लिए लेकिन काम बढ़ता गया और फिर समय आगे बढ़ता गया| घर से हर दूसरे दिन फोन आता कि कब आ रहे हो, वो हर बार बताता कि शायद दो चार दिन और लगेंगे| सबसे ज्यादा दिक्कत तब होती जब उसकी छोटी बच्ची फोन पर पूछती कि पापा कब आओगे| ऐसे में उसका दिल कचोट के रह जाता, काश किसी तरह घर जल्दी पहुँच जाए|
छोटी सी नौकरी, उस पर सेल्स का काम, कंपनी उसे यहाँ से वहां दौड़ाती रहती| उसकी इच्छा नहीं होती थी जाने की लेकिन मज़बूरी में जाना ही पड़ता| बाहर रहने में कितनी दिक्कत होती, ये वही जानता था| कंपनी जितना देती थी उतना खर्च करके वो आराम से रह सकता था, लेकिन फिर बचता क्या? आखिर पत्नी, छोटा भाई और एक बच्ची, सबको एक वही तो रोटी खिलाने वाला था| लेकिन वह चाह कर भी बड़े घर से आयी पत्नी को समझा नहीं पाता था, उसे तो यही लगता था कि वो बाहर खूब मजे करता है|
यथासंभव उसने पत्नी, भाई और बच्ची के लिए कुछ न कुछ खरीद लिया था| भाई तो बहुत खुश हुआ, बेटी भी खूब खेल रही थी लेकिन पत्नी का मुंह उतर गया| उसने इस बार पक्का वादा किया था कि उसके लिए बढ़िया सा गिफ्ट लाएगा, लेकिन पैसे बस उतने ही बचे थे| शाम से रात हो गयी, अनमने ढंग से पत्नी ने खाना खिलाया और फिर बिस्तर पर लेट गयी| उसका मूड देखकर उसकी हिम्मत नहीं थी कि उससे कुछ कहे, अपना तकिया ठीक करके वो लेट गया| लेटे लेटे एक तरफ सो रही बेटी को वो देख रहा था कि वो उठी और उसके सीने पर लेट कर सो गयी| उसकी पिछले डेढ़ महीने की थकान एकदम से गायब हो गयी, एक अनमोल खजाना जैसे मिल गया| उसने भी बेटी को हल्का सा भींचा और उसके सर पर हाथ फेरता हुआ मीठी नींद के आगोश में खो गया| 

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