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Thursday, January 29, 2015

ज़ज्बा--

" मेरे पिता मरे नहीं हैं , शहीद हुए हैं | मुझे गर्व है उनपर और उनकी बेटी होने पर "| आँखों से आंसुओं की बारिश हो रही थी लेकिन चेहरे पर वही दृढ़ता थी | याद आ रही थी कुछ ही दिनों पहले की बात जब पिता छुट्टी पर घर आये हुए थे और मैंने उनसे पूछा था " आपको इस दुनियां में सबसे ज्यादा कौन प्रिय है " और उनका जवाब था " अपनी माँ , भारत माँ "| फिर मेरे उतरे चेहरे को देखकर बोले " अरे तुम तो मेरी जान हो बेटे , लेकिन माँ तो सबसे प्यारी होती है , है ना " और मेरे चेहरे पर पर मुस्कराहट आ गयी |
जिस दिन वापस जाना था , मुझसे कहने लगे कि मैं तो भारत माँ की हिफाज़त के लिए जा रहा हूँ , तुम अपनी माँ की हिफाज़त करना | एक दिन फोन पर मुझसे कहने लगे कि अब ये शरीर अगर माँ के काम आ जाये तो दुखी मत होना | उन्हें इसका पूर्वाभाष हो गया था , शायद माँ की रक्षा करने वाले हर बहादुर सिपाही को इसका आभाष रहता है |
गोलिओं की आवाज आ रही थी , सेना अपने वीर जवान को आखिरी सलामी दे रही थी और मेरा भारत माँ की रक्षा करने का ज़ज्बा और मजबूत हो रहा था |

वजूद--

" आप का नाम क्या है ", बगल में आई नयी पड़ोसन ने पूछा |
वो सोच में पड़ गयी , क्या बताये | शादी के बाद जब से इस घर में आई है तब से तो किसी ने उसके नाम से नहीं पुकारा | शुरू में बहू , फिर मुन्ने की माँ और अब मिसेस शर्मा , यही सुनती आई है वो | शायद तीस साल बहुत होते हैं किसी को खुद का वजूद भूलने के लिए |
वो अपना वजूद ढूँढ रही थी , पड़ोसन चली गयी थी |

Wednesday, January 28, 2015

घर वापसी--

दद्दा बहुत परेशान थे , इस उम्र में आकर अब ये सब करना पड़ेगा| लेकिन बेटा तो सुनने को तैयार ही नहीं था , उसको तो बस एक ही धुन सवार थी और किसी भी तरह से इस कार्यक्रम को सफल बनाना था उसको| राजनीति में धीरे धीरे उसकी पकड़ मजबूत हो रही थी और ये कार्यक्रम तो , उसे यक़ीन था , जैसे उसकी किस्मत का दरवाजा ही खोल देगा|
जिन लोगों की कभी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि दरवाजे पर भी आएं , बैठना तो दूर की बात थी , वो लोग अब यहाँ आएंगे और उनको बैठाना पड़ेगा| एक तो वैसे ही विधर्मी लोग ऊपर से उनका सत्कार करना , बड़ी उथल पुथल मची हुई थी दद्दा के के मन में| कितनी बार समझाया बेटे को लेकिन उसने तो सुन के भी अनसुना कर दिया|
दरअसल राजनीती में एक नयी हवा चली हुई थी इस समय , कभी दूसरे धर्मों में चले गए लोगों की पुराने धर्म में वापसी की| और बेटा इस मौके को हाँथ से जाने नहीं देना चाहता था| अपने गांव और अगल बगल के गांव में ऐसी बस्तियाँ थीं जिसमे तमाम ऐसे लोग रहते थे| वो कई हफ़्तों से इन बस्तियों के चक्कर लगा रहा था, उन्हें हर तरीके से समझा रहा था| आग्रह, धमकी और साथ ही साथ धन का प्रलोभन भी सबको दे रहा था| काफी जद्दोजहद के बाद उनमे से कुछ लोग तैयार हो गए और बाक़ी भी शायद देखना चाहते थे कि क्या होता है इन लोगों के साथ| बेटे को तो अब सिर्फ इंतज़ार था कार्यक्रम के सफलता पूर्वक संपन्न होने का|
" अरे बाबू , बहुत बढियां मौका हाँथ लगा है इस बार , अगर ढंग से निपट गया तो समझो अपना तो सिक्का जम जायेगा "| और भी न जाने क्या क्या बोले जा रहा था वो लेकिन दद्दा तो जैसे संज्ञाशून्य हो गए थे|
मंच बन के तैयार था और बाहर से आने वालों का सिलसिला शुरू हो गया था| पार्टी के जिला प्रमुख को इसकी अध्यक्षता करनी थी और प्रेस वाले भी आने लगे| मंच के सामने वाली कुर्सियों में लोग बैठने लगे और बेटा सबका ध्यान रख रहा था| मुख्य अतिथि के आने तक भीड़ काफी इकट्ठी हो गयी| थोड़ी देर के भाषण के बाद उन्होंने एक कोने में बैठे हुए लोगों को बुलाया और बगल में बने हुए यज्ञस्थल पर ले गए| कुछ देर के हवन के बाद उनको एक एक करके कुछ पिलाया जाने लगा और मंच पर से घोषणा होने लगी " इन लोगों की घर वापसी हो गयी है और आगे भी हम लोग इसी तरह से भटके हुए लोगों की घर वापसी करते रहेंगे "| तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा क्षेत्र गूंज रहा था और फिर उन लोगों को मंच पर लाया गया|
जल पान बँटने लगा और बेटा उन सभी लोगों को अपने हाँथ से जलपान करा रहा था| दद्दा एक किनारे खड़े होकर ये सब देख रहे थे और सोच रहे थे कि कल सारे दरवाजे की सफाई करवानी पड़ेगी| पत्रकारों ने मुख्य अतिथि और उन लोगों से कुछ सवाल किये और अपनी गाड़ी में सवार होकर निकल गए| उनके पीछे पीछे मुख्य अतिथि भी बेटे को तमाम बधाईयां देते हुए निकले और बाक़ी गाड़ियों का काफिला भी चल पड़ा|
धूल छंट गयी थी और बेटा अपने कार्यक्रम की सफलता पर काफी प्रसन्न था| " देखा बाबू , जिला प्रमुख कितने खुश थे , अब अपना हाँथ कोई नहीं पकड़ सकता "| वो एक कुर्सी पर बैठ गया और भविष्य की कल्पनाओं में खो गया|
" लेकिन क्या ये लोग अब से अपने ही साथ उठेंगे बैठेंगे बेटा ", दद्दू अभी भी उलझन में थे| वो तंय नहीं कर पा रहे थे कि जो लोग कल तक किसी और मज़हब के थे वो आज से अपने धर्म के कैसे हो गए , क्या इतना आसान होता है ये सब| बेटा शायद थकान से सो गया था और उसने जवाब नहीं दिया|
भीड़ छंट जाने के बाद वापसी किये लोग किनारे खड़े थे| अब कोई उन्हें पूछने वाला नहीं बचा था , उनके कदम उन्हें अपने पुराने घर की ओर ले चले| लेकिन अब उनकी अपनी बस्ती में ही उन्हें अलग निगाहों से देखा जा रहा था|
अगले दिन दद्दू सारे दरवाजे की सफाई करवा रहे थे, बेटा जिला प्रमुख के घर बैठा हुआ भविष्य की योजनाओं पर बात कर रहा था| और उस बस्ती में घर वापसी किये लोग समझ नहीं पा रहे थे कि घर वापसी हुई है या अपने ही घर से निकाल दिये गए हैं|


Tuesday, January 27, 2015

दांव पेंच--

" क्या हुआ सलीम साहब , चेहरा इतना उतरा हुआ क्यूँ है ? कहीं फिर इस बार टिकट का मसला तो नहीं फंस गया "|
" नहीं , कुछ नहीं , बस यूँ ही तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है "| टाल तो दिया उन्होंने लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खाए जा रहा था | पिछली बार भी यही हुआ था , आखिरी समय तक आश्वासन मिलता रहा था कि सीट आपकी पक्की है , इस बार भी उम्मीद नहीं दिख रही |
अगले दिन उन्होंने अख़बारों में खबर छपवा दी " सलीम साहब ने अपनी पार्टी का टिकट ठुकराया "| शाम तक उनको दूसरी पार्टी ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया |

Monday, January 26, 2015

सलामी--

" साहब रुको, एक मिनट , आपका कुछ गिर गया है ", पीछे से आवाज आ रही थी लेकिन उसने पलट कर भी नहीं देखा | ये सब कुछ मांगने के बहाने हैं या कभी कभी बेवकूफ भी बना देते हैं लोग , सोचते हुए वो आगे वाली बस में चढ़ गया | 
बस चल पड़ी और कंडक्टर को टिकट के पैसे देने के लिए जब उसने हाँथ कोट की जेब में डाला तो उसे जेब हलकी लगी | पर्स तो था लेकिन वो पैकेट नहीं था जिसमे उसने अपना पासपोर्ट , लाइसेंस और कुछ जरुरी कागज़ात रखा हुआ था | उसने तुरंत बस रुकवाई और उतर के पीछे भागा |
घबराया हुआ बस स्टैंड पहुँच कर उसने इधर उधर देखना शुरू किया था कि किसी ने उसे आवाज दी | बगल की दुकान वाला उसे बुला रहा था | उसने उसके चेहरे का मिलान किया और फिर वो पैकेट उसे पकड़ा दिया |
" बहुत बहुत धन्यवाद आपका , मैं शर्मिंदा हूँ कि उस समय आपकी बात पर ध्यान नहीं दिया मैंने , कुछ ले लीजिये आप "| जैसे ही उसने जेब में हाँथ डाला , दुकानदार बोला " धन्यवाद और पैसा आप मुझे मत दो , वो तो एक रिक्शा वाला था जो आपके पीछे दौड़ रहा था ये देने के लिए | मुझे दे गया था कि जिसका है वो यहाँ जरूर यहाँ आएगा तो लौटा देना और बोल देना कि सारे लोग बेईमान नहीं होते "| 
दूर कहीं गाना बज रहा था " सारे जहाँ से अच्छा , हिन्दोस्तां हमारा " और उसके हाँथ अपने आप उस अन्जान रिक्शे वाले को सलामी के लिए उठ गए |

सोच--

" सुने हैं भईया , कौनो बड़का महाराजा आवा है अपने देश में ", हरखू पूछ रहा था |
" अरे हमको तो नाहीं पता , तोके कइसे पता चलल भाई "|
" केहू हमरा के बतावत रहा कि सब सड़क पर से थूक साफ़ भयल हौ , एही से हम सोचलीं "|

Friday, January 23, 2015

दान--

ठण्ड भयानक पड़ने लगी थी और विभिन्न समाजसेवी संस्थाएं रोज लोगों से अपील कर रही थीं कि सड़क के किनारे रह रहे लोगों को गर्म वस्त्र दान करें | सड़क पर तमाम न्यूज़ चैनल की गाड़ियां घूम रही थीं और इन कार्यक्रमों को दिखा रही थीं |
उस मोहल्ले के आखीर में भी एक भिखारी सड़क पर पड़ा हुआ था | कुछ लोगों ने उसे ऊनी कम्बल इत्यादि दान किये और ये भी उन चैनल्स ने कैमरों में कैद किया लेकिन उसकी हल्की बुदबुदाहट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया |
सुबह वो भिखारी मरा पड़ा था | लोग खाने के लिए देना भूल गए थे |

Thursday, January 22, 2015

माँ

वो यादें अभी भी हैं ताज़ा
जब लड़खड़ाने पर लेती थी सँभाल,
गिरने नहीं देती थी तुम,
आज भी लड़खड़ाने पर याद आती हो,
माँ , क्योंकि तुम ही हमेशा लेती थी सँभाल,
चलना और दौड़ना भी सीख लिया मैंने,
लेकिन पहला कदम सिखाया था जिसने,
माँ , वो तो तुम ही थी,
आज मैं भी बन गयी हूँ माँ,
लेकिन अब भी उतना ही आती हो याद,
माँ , जब भी मैं लड़खड़ा जाती हूँ ,
क्यूंकि तुम ही सकती हो हमें सँभाल !! 

डाँट--

माँ ने कस के डाँट लगायी राजू को |
बेटी ने टोक दिया " क्या माँ , अब बड़ा हो गया है राजू , उसे इस तरह मत डाँटा करो "|
माँ सोचने लगी , उसे लग रहा था कि बात सही ही है |
राजू ने तुरंत जवाब दिया " माँ के डाँट में भी प्यार होता है , ये मैं कैसे भूल सकता हूँ "|

Wednesday, January 21, 2015

मुक्ति--

फिर आधी रात को उनकी आँख खुल गयी , पसीने से तरबतर वो बिस्तर से उठे और गटागट एक लोटा पानी हलक में उड़ेल दिया | ये सपना उन्हें पिछले कई सालों से परेशान कर रहा था | अक्सर वो देखते कि एक हाँथ उनकी ओर बढ़ रहा है और जैसे ही वह उनके गर्दन के पास पहुँचता , घबराहट में उनकी नींद खुल जाती |
अब वो जिंदगी के आखिरी पड़ाव में थे और अब खाली समय था उनके पास | रिटायरमेंट के बाद वो और पत्नी ही रहते थे घर में , बच्चे अपने अपने जगह व्यस्त थे | पत्नी भी परेशान रहती थी उनकी इस हालत से और कई बार पूछती थी कि क्यों इस तरह उठ जाते हैं वो | लेकिन जो राज़ उन्होंने पिछले कई सालों से अपने सीने में दफ़न कर रखा था , उसे बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे |
उनके निगाहों के सामने वो सालों पुराना दृश्य घूमने लगा | काफी लम्बे सफर से लौट रहे थे और रात भी ज्यादा हो गयी थी | हल्के नशे की हालत में उनकी कार किसी से टकराई और फिर उनकी नज़र सड़क के किनारे एक घायल पड़े युवक पर पड़ी | उन्होंने अपनी कार रोकी और उतर कर उसकी ओर बढे | उसका चेहरा और शरीर खून से सना हुआ था और उसने उनकी ओर अपना हाँथ बढ़ाया | उसकी ऑंखें जिंदगी बचाने के लिए याचना कर रही थीं लेकिन फिर उनके दिमाग में पुलिस , कोर्ट कचहरी इत्यादि घूमने लगे और वो वापस मुड़ गए | कार में बैठते समय एक बार फिर देखा तो उसके हाँथ उन्ही की ओर बढे हुए थे |
पर आज उन्होंने फैसला कर लिया , कि वो पत्नी को इस सपने की वज़ह बता देंगे , शायद उन्हें मुक्ति मिल जाए |

मुक्ति--

फिर आधी रात को उनकी आँख खुल गयी , पसीने से तरबतर वो बिस्तर से उठे और गटागट एक लोटा पानी हलक में उड़ेल दिया | ये सपना उन्हें पिछले कई सालों से परेशान कर रहा था | अक्सर वो देखते कि एक पंजा उनकी ओर बढ़ रहा है और जैसे ही वह उनके गर्दन के पास पहुँचता , घबराहट में उनकी नींद खुल जाती |
अब वो जिंदगी के आखिरी पड़ाव में पहुंच गए थे और अब काफी समय था उनके पास | रिटायरमेंट के बाद वो और पत्नी ही रहते थे घर में , बच्चे अपने अपने जगह व्यस्त थे | पत्नी भी परेशान रहती थी उनकी इस हालत से और कई बार पूछती थी कि क्यों इस तरह उठ जाते हैं वो | लेकिन कैसे बताते वो उसको , ये राज़ पिछले ४० सालों से अपने सीने में दफ़न कर रखा था उन्होंने |
अपने स्नातक के आखिरी साल में थे वो और उनका प्रेम परवान चढ़ रहा था | साथ जीने मरने के वादे कर लिए थे दोनों ने और एक रात मर्यादा की सीमा भी लाँघ गए | फिर फाइनल परीक्षाएं शुरू हुई और अगले दो महीनों तक वो ज्यादा मिल नहीं पाये थे | परीक्षा के बाद घर जाने की तैयारी हो गयी और वो ये कहने गए थे कि लौट के आने के बाद नौकरी और फिर शादी | लेकिन जैसे ही उसने बताया कि वो माँ बनने वाली है और जल्दी ही उन्हें शादी करनी पड़ेगी तो वो चिंतित हो गए |
गाँव पहुँचने पर पता चला कि दादाजी अपनी आखिरी सांस गिन रहे हैं और उनकी अंतिम इच्छा उसकी शादी देखने की थी | फिर पिताजी ने आनन फानन में शादी की तारीख पक्की की और जब तक वो कुछ कहते , शादी के फेरे हो गए | चाह कर भी कुछ नहीं कह सके किसी से और छ महीने बाद उन्हें खबर मिली कि उसने आत्महत्या कर लिया |
आज उन्होंने फैसला कर लिया था कि वो पत्नी को सब कुछ सच सच बता देंगे और शायद इस सपने से मुक्ति पा जायेंगे | पत्नी के संभावित प्रतिक्रिया के बारे में सोचते सोचते उनकी आँख लग गयी |

Tuesday, January 20, 2015

इंसानियत--

" उतारो कपड़े इसके , देखो किस तरफ का है " , भीड़ चिल्ला रही थी और वो थर थर काँप रहा था | शहर में अचानक दंगा भड़क उठा था और वो भाग रहा था कि किसी तरह अपने घर पहुँच जाए | लेकिन जैसे ही एक मोहल्ले में घुसा , सामने से आ रही भीड़ ने उसे घेर लिया |
अभी वो कपड़ा उतारने ही जा रहा था कि पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज आई और भीड़ भाग खड़ी हुई | अब वो पुलिस की जीप में बैठा सोच रहा था कि आज वो तो नंगा होने से बच गया , लेकिन इंसानियत नंगी हो गयी |

कसूर--

चिता की लपटें धीरे धीरे ठंडी पड़ने लगीं , लोग जाने लगे थे| लेकिन हेमंत के मन में अभी भी अंधड़ चल रहा था , बेटी की यादों का अंधड़| कहाँ गलती हो गयी उनसे , क्या गलत चाहा था उन्होंने| एक बाप के लिए कितना मुश्किल होता है अपने बच्चे की चिता को आग देना, धम्म से बैठ गए वो घाट की सीढ़ियों पर| चचेरे भाई ने कंधे पर हाँथ रखा और कहा " हौसला रखो , नियति को शायद यही मंजूर था "| उन्होंने अपने हांथों को भाई के हाँथ पर रख दिया और फिर चिता की ओर देखने लगे| अँधेरा होने लगा था और ठण्ड भी बढ़ गयी थी, घाट पर चारो ओर जलती चिताएं मन को किसी और ही दुनियां में ले जा रही थीं| यही आखिरी सत्य है, पढ़ा था कभी , आज दिख भी रहा था उसे| बगल में एक चिता किसी बुजुर्ग की जल रही थी और उसके घर वालों के चेहरे पर ग़म का कोई निशान नहीं था| एक और चिता थी जिसके पास एक छोटा बच्चा था , सर मुंडाए हुए| शायद ये उसके पिता की चिता थी , लेकिन उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है| हाँ ,उस बच्चे के साथ के लोग काफी दुखी थे और सब सर झुकाये बैठे थे| हेमंत के मन में ये सवाल घूमने लगा कि मौत भी क्या होती है , कहीं लोग खुश दिख रहे हैं तो कहीं लोग ग़मज़दा| घाट पर सांड़ अपनी रौ में इधर उधर घूम रहे थे और मृत्यु के साये में जीवन भी अपने हिसाब से चल रहा था| क्या इसी दिन के लिए माँ बाप बच्चों को पैदा करते हैं , हेमंत को अपने सवाल का उत्तर नहीं मिल रहा था|
बेटी के पैदा होने पर हेमंत बहुत खुश था , पूरे ऑफिस को पार्टी दी थी| घर नाते रिश्तेदारों से भरा हुआ था , लोग आपस में कह भी रहे थे कि बेटी के जन्म पर इतनी ख़ुशी मनाने वाले बहुत कम मिलते हैं| उनकी पत्नी भी टोक देतीं , "अरे इतनी भी क्या ख़ुशी मनाना , नज़र लग जाएगी बिटिया को "| लेकिन हेमंत को कुछ भी नहीं सूझता था अपने बेटी के आगे, रात रात भर बेटी के बारे में ही बात करता रहता था पत्नी से| अगले कई सालों कि योजना भी बन गयीं थी उसके जन्म के कुछ दिन के अंदर ही|
हेमंत की सारी दुनिया बेटी के इर्द गिर्द ही घूमने लगी| दिन में भी फोन करके उसके बारे में पूछता रहता और ऑफिस से आते ही उसके साथ खेलने में लग जाता| सारे दिन की थकान जैसे उड़नछू हो जाती और जब रात में बेटी उसके सीने पर फ़ैल कर सोती तो उसको लगता जैसे सारा जहाँ उसके पास सिमट गया है| पत्नी की शिकायत रहती कि अब वो उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता लेकिन हेमंत इसे हंस कर टाल देता| दूसरे बच्चे के बारे में वो सोचता ही नहीं था और माँ के ये कहने पर कि एक बेटा भी हो जाता तो ठीक रहता , उसने कभी ध्यान नहीं दिया| शायद उसे ये लगने लगा था कि एक और बच्चा हो गया तो वो बेटी को इतना समय नहीं दे पायेगा| धीरे धीरे बेटी बड़ी होने लगी , उसका नाम उसी ने रखा था " स्निग्धा ", घर पर उसे प्यार से रानी बुलाता| अब बेटी भी घर पर उसका इंतज़ार करती कि कब पापा आएं और वो उनके साथ खेले| समय पंख लगाकर उड़ता गया , रानी ने स्कूल के बाद कालेज में कदम रखा और वो दिन भी आ गया जब उसका एडमिशन यूनिवर्सिटी में भी हो गया| रानी भी हेमंत की तरह प्रखर थी , हमेशा कक्षा में उच्च स्थान पाती और अन्य चीजों में भी उसकी सक्रिय भागेदारी रहती| वाद विवाद प्रतियोगिता हो या कविता पाठ , हर जगह वो आगे रहती और हेमंत का सर गर्व से ऊँचा हो जाता|
स्निग्धा यूनिवर्सिटी के आखिरी वर्ष में थी जब उसको इस नौकरी का ऑफर मिला था| कंपनी का ऑफिस दूसरे प्रदेश में एक छोटे से कस्बे में था और जगह नक्सलवाद से प्रभावित थी| उसकी पत्नी ने तो साफ़ इंकार कर दिया था इस नौकरी के लिए , इतनी दूर और वो भी खतरनाक इलाके में| लेकिन स्निग्धा अपना मन बना चुकी थी | पहले तो उसने माँ को समझाने की कोशिश की लेकिन जब वो नहीं मानी तो हेमंत के पास आकर चुपचाप बैठ गयी| हेमंत भी इस नौकरी से खुश नहीं था , कमोबेश यही डर उसके मन में भी बैठा हुआ था| लेकिन बेटी को उदास देख कर उससे रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा " क्या हुआ रानी , क्यों उदास हो "| रानी ने सर उठाया और उसकी ओर देखते हुए बोली " क्या आपको भी लगता है कि मेरा निर्णय उचित नहीं है| क्या डर सिर्फ ऐसी जगहों पर ही है , क्या यहाँ क़त्ल और लूटपाट नहीं होती| और इस डर की वजह से क्या मैं अपना भविष्य नहीं बनाऊँ "| हेमंत के पास कोई जवाब नहीं था , वो बेटी को बस देखता रहा| फिर उसने ये कहते हुए कि अब तुम समझदार हो गयी हो और अपना भला बुरा खुद समझ सकती हो , सहमति दे दी|
वो दिन भी आ गया जब बेटी को जाना था| हेमंत और पत्नी दोनों बेटी को पहुँचाने गए और एक हफ्ते वहां रुक कर उसकी गृहस्थी जमा दी| वापस आते समय हेमंत अपने जज़्बातों पर काबू पाने का पूरा प्रयास करता रहा लेकिन आंसू बह ही निकले| पत्नी और रानी भी रो पड़ीं और ये देखकर हेमंत ने अपने आप को संभाला| इस तरह रोकर विदा किया तो ज्यादा तकलीफ होगी , ये सोचते हुए वो मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाने का असफल प्रयत्न करता रहा| बस जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गयी , तब तक स्निग्धा अपना हाँथ हिलाती रही और फिर भारी क़दमों से वापस लौट गयी|
हर दिन हेमंत फोन करता , वो एक एक चीज तफ्सील से पूछता| स्निग्धा उसी उत्साह से छोटी से छोटी बात उसे बताती , वो बातें भी जो वो अपने माँ से नहीं बता पाती थी| अब अपने ऑफिस की समस्याएं और घटनाएँ हेमंत के लिए गौण हो गयी थीं , उसे तो सिर्फ बेटी के ऑफिस की बातें और समस्याएं ही दिखती थीं अब| हर महीने दो तीन दिन के लिए वो बेटी के घर चला जाता और फिर वे दोनों दुनिया जहान की बातें करते| स्निग्धा के ऑफिस की अधिकांश समस्याएं वो हल कर देता और फिर वो दुगुने उत्साह से अपने काम में लग जाती|
इधर कुछ दिनों से स्निग्धा हेमंत के फोन का जवाब उतने उत्साह से नहीं दे रही थी| पहले तो हेमंत को लगा की शायद काम की अधिकता और तनाव होगा लेकिन धीरे धीरे उसे ये लगने लगा कि स्निग्धा उससे कुछ छुपा रही है| शनिवार को हेमंत निकल पड़ा बेटी से मिलने| पहले तो वो टालती रही लेकिन आखिरकार उसने बताना प्रारम्भ कर दिया| " नक्सलियों की आड़ में माफिया यहाँ की सभी कंपनियों से पैसा वसूल करने में लगे हैं और जब उसने इस बात को मीडिया में ले जाने की धमकी दी तो उसकी खुद की कंपनी के बॉस उसपर नाराज़ हो गए| उनके हिसाब से जैसा चल रहा है उसे चलने देना चाहिए और बिना वजह किसी पचड़े में फंसने से बेहतर है थोड़ा पैसा दे कर अपने को बचा के चलें "| 
" क्या ये सही है पापा , आपने ही तो सिखाया था कि हमेशा अपने दिल की सुनो और जो खुद को सही लगे वही करो| यहाँ के माफिया न सिर्फ लोगों से पैसा वसूल रहे हैं बल्कि नक्सलिओं के खिलाफ एक ऐसा दुष्प्रचार भी कर रहे हैं जिनमे वो शामिल नहीं हैं| अब आप ही बताईये कि क्या मैं इसे ऐसे ही चलने दूँ "|
हेमंत भी निरुत्तर हो गया , बेटी की बातों में सच्चाई थी लेकिन उसे इस तरह परेशान नहीं देख सकता था| फिर ये भी ख्याल आया कि कहीं उसे कोई खतरा तो नहीं होगा लेकिन फिर उसने उस ख्याल को मन से झटक दिया| 
"स्निग्धा , सवाल ये नहीं है कि सही क्या है और गलत क्या , सवाल ये है कि क्या हम उससे सीधे सीधे प्रभावित हो रहे हैं| पैसा तुम्हारी कंपनी को देना है और वो दे रही है , फिर तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है इससे", हेमंत ने उसे समझाने की कोशिश की| बेटी उससे सहमत नहीं थी लेकिन उसने अपना सर हिला दिया और दूसरी ओर देखने लगी|
वापस आने के बाद हेमंत परेशान हो गया लेकिन पत्नी के सामने वो बिलकुल सामान्य रहता ताकि उसे कोई चिंता नहीं हो| वो ये भी सोच रहा था कि वो बेटी को जॉब छोड़ने के लिए कह दे पर उसका खुद का मन इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था| उसे लगता था कि शायद कुछ दिन बाद स्निग्धा अपने आप को उस परिस्थिति में ढाल लेगी और सब कुछ सामान्य हो जायेगा| वो रोज फोन करता और उसे बेटी की बातों में सब कुछ सामान्य लगता|
इसी बीच एक दिन हेमंत ने समाचारों में उस कस्बे के बारे में कुछ देखा , शायद कोई मुठभेड़ हुई थी पुलिस और नक्सलियों में| शाम को उसकी बात हुई बेटी से तो उसने कुछ खास नहीं बताया , बस इतना कहा कि मैं ठीक हूँ पापा , आप चिंता मत कीजिये| लेकिन अब हेमंत का मन थोड़ा परेशान हो रहा था , उसने सोच लिया कि अगले शनिवार को पत्नी के साथ स्निग्धा के यहाँ जायेगा|
शुक्रवार की रात उसके मोबाइल फोन की घंटी बजी, फोन बेटी के एरिया से ही था लेकिन वहां के पुलिस थाने से| घबराया हुआ हेमंत पूछ रहा था कि क्या हुआ लेकिन वहां से यही बताया गया कि आप तुरंत आ जाइए , आपकी बेटी दुर्घटना में घायल हो गयी है| अफरा तफरी में वे दोनों निकल पड़े और सुबह हॉस्पिटल पहुंचे| हेमंत का तो दिल जैसे बैठ ही गया था और पत्नी ने बाहर से ही रोना शुरू कर दिया| फिर वहां खड़े एक कांस्टेबल ने उनको पोस्टमार्टम घर पहुँचाया जहाँ स्निग्धा के मृत शरीर पर सर रखकर हेमंत बहुत देर तक रोता रहा| पुलिस इंस्पेक्टर ने बताया कि ऑफिस से घर जाते समय किसी गाड़ी ने आपकी बेटी को टक्कर मार दिया , हम लोग छानबीन कर रहे हैं| और भी बहुत कुछ बता रहा था वो लेकिन हेमंत कुछ सुन नहीं पा रहा था, उसका दिमाग जैसे संज्ञाशून्य हो गया था| दिल पर पत्थर रखकर एम्बुलेंस में बेटी की लाश लेकर वो उसके घर पहुंचा और वहां से उसकी चीजों को समेटने लगा| इसी बीच लोगों की बातचीत भी कानों में पड़ रही थी कि क्या जरुरत थी माफिया से पंगा लेने की और अब उसके समझ में बात आने लगी| पत्नी तो जैसे पागल सी हो गयी थी , रह रह कर बेटी का नाम लेकर चिल्लाती और निढाल हो जाती|
बेटी की जलती चिता को देखते हुए हेमंत के दिमाग में ये सब घूम रहा था| आज तक तो उसने पत्नी को सारी बातें नहीं बतायीं थीं लेकिन अब उसने उसे हर बात बताने का फैसला कर लिया था| साथ ही साथ उसने बेटी के एरिया में ही अपना ट्रांसफर करवाने का दृढ निश्चय कर लिया| अब उसे बेटी के शुरू किये गए अधूरे कार्य को पूरा करना था और इसमें उसे अब किसी भी बात की परवाह नहीं थी| अपनी बेटी को इससे उचित श्रद्धांजलि और कुछ नहीं दे सकता था वो, एक बार और उसने चिता की ओर देखा और फिर आसमान की ओर सर उठा लिया| कहीं दूर तारों के बीच उसे अपनी बेटी का मुस्कुराता संतुष्ट चेहरा नज़र आने लगा| 

























Monday, January 19, 2015

टिकट--लघुकथा

" क्या हुआ सलीम साहब , चेहरा इतना उतरा हुआ क्यूँ है ? कहीं फिर इस बार टिकट का मसला गड़बड़ तो नहीं हो गया "|
" नहीं , कुछ नहीं , बस यूँ ही तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है "| टाल तो दिया उन्होंने लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खाए जा रहा था | पिछली बार भी यही हुआ था , आखिरी समय तक आश्वासन मिलता रहा था कि सीट आपकी पक्की है , फिर जाने क्यूँ उनका पत्ता फिर कट गया |
बैठक में कुर्सी पर औंधे लेटे लेटे पिछला २५ साल उनकी निगाहों से गुज़र गया | इसी जगह से उन्होंने छात्र जीवन की राजनीति शुरू की थी और पहली बार यहीं से उन्होंने विधान सभा का चुनाव लड़ा था | पार्टी में उनकी इज़्ज़त थी और उसकी वजह थी उनकी स्वच्छ छवि | किसी भी प्रकार के विवाद से दूर थे और आज तक किसी भी घोटाले में उनका नाम नहीं उछला था | इसी राजनीति की वज़ह से उन्होंने शादी करने का ख्याल भी मन से निकाल दिया था और वो पूरी तरह से यहाँ की जनता के हो कर रह गए थे |
लेकिन पिछले १० साल में राजनीति में तमाम परिवर्तन देखने को मिल रहे थे | राजनीति सेवा के बदले कमाने का जरिया बन गयी थी | लेकिन उन्होंने अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया और इस बदलते दौर में भी अपने को अक्षुण्ण रखा | अब राजनीति पर जात , बिरादरी और मज़हब हावी होने लगा था और वो तो अपनी पार्टी में कुछ गिने चुने लोगों में से थे जो किसी और मज़हब के थे | उनके इलाक़े के नौजवान राजनीतिज्ञ अब इतना तो समझ ही गए थे कि इनके रहते वो अपने मंसूबों को नहीं पा सकते | फिर क्या था , उन्होंने पार्टी प्रमुख के कान भरना शुरू कर दिया | कभी सलीम साहब का जो गुण हुआ करता था वो अब अवगुण में बदल गया | लेकिन फिर भी उनको उम्मीद थी कि पार्टी प्रमुख इस बार उनकी सीट जरूर सुरक्षित रखेंगे | पिछली बार ही उनको समझाया गया था कि इस बार आप आराम कर लीजिये , अगली बार आपका टिकट पक्का है | आखिर इतने सालों तक सेवा की थी उन्होंने पार्टी और क्षेत्र की जनता की , तो उसका प्रतिफल तो मिलना ही चाहिए |
आज सलीम सोचने पर मजबूर हो गए कि उन्होंने अपने आप को इस राजनीति के हिसाब से नहीं बदला या राजनीति ने ही अपने मूल्यों को बदल लिया | यही सोचते सोचते उनकी आँख लग गयी | अचानक फोन की घंटी से उनकी आँख खुल गयी , फोन पर विपक्षी दल के पार्टी प्रमुख थे | उन्होंने खुला न्योता दिया उनको अपने दल में आने का और टिकट का भरोसा भी | सलीम सोच में पड़ गए , क्या करूँ , क्या उस दल में चला जाऊँ जिसके खिलाफ वो सारी जिंदगी चुनाव लड़ते रहे या अपने दल में ही रह कर अगले चुनाव का इंतज़ार करूँ ?
आखिर में उन्होंने फोन लगाया अपने सबसे घनिष्ठ मित्र और राजनीतिक विश्लेषक राजीव को | राजीव ने सब सुना और उनसे पूछा " तुमने राजनीति क्यों शुरू की थी , क्या तुम्हे पद का लालच था , या पैसे का | जहाँ तक मुझे पता है तुमने ये जनता की सेवा के लिए शुरू किया था और तुम उसमे कामयाब भी थे | पिछले चुनाव में तुमको टिकट नहीं मिलने का नुकसान सबसे ज्यादा क्षेत्र की जनता का हुआ और अगर इस बार तुम विपक्षी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हो तो ये न सिर्फ तुम्हारे अपने सिद्धांतों से समझौता होगा , बल्कि जनता भी तुम पर विश्वास नहीं कर पायेगी | इसलिए कोई भी कदम बहुत सोच समझ कर उठाना "|
अगले दिन अख़बारों में सुर्खियां थीं " सलीम साहब ने अपने क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परचा दाखिल किया "|

Sunday, January 18, 2015

विकलांगता--

" देखो तो , आज माँ के लिए मैं क्या लाया हूँ "|
" क्या जरुरत थी माताजी को इतनी बढ़िया साड़ी लाने की !" , पत्नी की आवाज में आश्चर्य झलक रहा था |
" माँ की आँखें नहीं हैं लेकिन मेरी तो हैं ना "|

Saturday, January 17, 2015

नज़र--

शहनाईयां बज रहीं थीं , चंद घंटों में शादी होने वाली थी | लेकिन सबके दिलों में एक बात चुभ रही थी , इतनी जहीन लड़की और शादी एक नेत्रहीन लड़के से | लड़का बहुत अच्छा गायक था लेकिन सिर्फ वो ही तो काफी नहीं होता जीवन साथी बनाने के लिए , ये सवाल सबके जेहन में उठ रहा था |
आखिरकार उसकी बचपन की दोस्त ने , जो आज ही बाहर से आई थी, पूछ ही लिया |
जवाब मिला " अपनी अपनी नज़र है "|

सृष्टि--

ब्रह्मा नारद से " हे नारद , वो पृथ्वी पर एक बालक हाथ में झाड़ू लेकर क्या कर रहा है ?
नारद " प्रभु , वो सड़क से अन्न के दाने बीन रहा है "|
" लेकिन उसे सड़क पर से दाने बीनने की क्या आवश्यकता पड़ गयी ?"
" प्रभु , पेट भरने के लिए धरती वासियों को बहुत कुछ करना पड़ता है "|
" वो तो ठीक है लेकिन हमने तो पृथ्वीवासियों को भरपूर अन्न दिया है , फिर इस बालक को सड़क से क्यों बीनना पड़ रहा है "|
" प्रभु , दिया तो है आपने लेकिन वो अन्न जमाखोरों के गोदाम में पड़ा रहता है और इस बालक जैसे अनेक गरीब मनुष्यों को नहीं उपलब्ध होता वो "|
ब्रह्माजी सोच में पड़ गए , क्या उन्होंने ऐसे ही इंसानों की सृष्टि की थी !

Thursday, January 15, 2015

आसमाँ--

" मिल गया चैन तुमको , हो गयी तसल्ली " , उसके पिता खुद को संभाल नहीं पा रहे थे  | " कितनी बार मना किया था कि उसे वहां मत भेजो , अब खो दिया न उसको "| बेटी की असमय मौत ने उनको तोड़ दिया था |
टूट तो मैं भी गयी थी लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बेटी को उसकी मर्ज़ी की जगह नौकरी करने की वकालत करके मैंने कौन सा गुनाह कर दिया था | उसकी कही बात जेहन में घूम रही थी " जाना तो एक दिन सब को है माँ , तो क्यों न निडर होके अपने तरीके से जिया जाए | अपना आसमाँ खुद ढूंढा जाए "| बेहद मुश्किल था अब लेकिन मुझे सम्भालना था , खुद को भी और परिवार को भी | शायद बेटी की आत्मा के आसमाँ के लिए | 

Tuesday, January 13, 2015

मज़हब--

" आप बस एक बार कह दो कि ये उन लोगों ने किया है , बाक़ी तो हम देख लेंगे " , मोहल्ले के तथाकथित धर्म गुरु काफी आवेश में थे | मौका अच्छा था और तमाम लोग इंतज़ार में थे इसका फायदा उठाने के लिए |
चच्चा सर झुकाये बैठे थे , चेहरा आँसुओं से तराबोर था | उनकी तो दुनिया ही मानो उजड़ गयी थी , जवान बेटे को खो चुके थे | लेकिन धीरे से सर उठा कर बोले " क़ातिल का कोई मज़हब नहीं होता "|  

Monday, January 12, 2015

युवा --

" देश का युवा आज रास्ता भटक गया है | उसे सही मार्ग दिखाना होगा और उसे अपनी ऊर्जा सही तरीके से इस्तेमाल करना सिखाना होगा "| प्रोफेसर साहब क्लास में बोल रहे थे और सभी छात्र उसे अपने सन्दर्भ में देख रहे थे |
लेकिन वहीँ बैठी उनकी एक छात्रा समझ नहीं पा रही थी कि आज का युवा मार्ग भटक गया है या ये बुज़ुर्ग | वो तो पूरी मेहनत और ईमानदारी से अपने प्रोजेक्ट को पूरा करने का प्रयास कर रही थी लेकिन प्रोफेसर साहब को उसके द्वारा किया गया कोई भी काम पसंद नहीं आता था |
लेकिन प्रोफेसर के कहे वाक्य कि " शाम को घर आ जाना , प्रोजेक्ट की डिटेल्स समझा दूंगा ", ने उसे सही रास्ता दिखा दिया |

Sunday, January 11, 2015

जन्मदिन--

" बहुत बहुत बधाई जन्मदिन की, आज तो पार्टी बनती है " , ऑफिस पहुँचते ही सहकर्मियों ने घेर लिया शर्माजी को | एक बारगी तो वो सोच ही नहीं पाये कि कैसे प्रतिक्रिया दें इस पर , उनसठवां जन्मदिन था उनका | अगले साल सेवानिवृत्त हो जायेंगे और घर में बेरोज़गार पुत्र एवम शादी के योग्य पुत्री |
चेहरे पे फीकी मुस्कान लाते हुए सबका आभार व्यक्त करने लगे और आवाज लगायी " सबके लिए नाश्ते का इंतज़ाम आज मेरी तरफ से कर देना भोला " | सब प्रसन्न थे पर उनके मन में यही चल रहा था कि ऐसा जन्मदिन किसी का न हो |

Monday, January 5, 2015

प्रश्नचिन्ह--

" कुछ नहीं हुआ है मुझे , चले जाइए आप लोग यहाँ से " , वो पागलों की तरह चीख रही थी | चेहरे से खून बह कर गर्दन पर आकर सूख गया था | अक्सर उसके घर से रोने और चिल्लाने की आवाजें आती रहतीं थीं और बगल के फ्लैट में रहते हुए उसे अनसुना करना बहुत कठिन हो गया था | उस दिन फिर जब आवाजें बर्दास्त के बाहर हो गयीं तो आखिर उसने फैसला कर लिया देखने का | दरवाजा जरा सा धक्का देते ही खुल गया और अंदर का दृश्य झकझोर देने वाला था | वो उसको बुरी तरह पीट रहा था और आखिर खुद गिर पड़ा | जैसे ही किसी के आने का आभास हुआ , वो अपने को सँभालते हुए पलटी और चिल्लाने लगी |
अगले दोपहर उसको देखा तो रहा नहीं गया | उसके कंधे पर हाँथ रखकर जानना चाहा कि क्यों बर्दास्त करती है वो ये मारपीट | पहले तो अपनी सूनी आँखों से आसमान में देखती रही फिर धीरे से बोली " कम पढ़ी लिखी हूँ न , अपने घर में तो सिर्फ मार पीट ही होती है , बाहर निकली तो लोग शायद नोंच के खा जाएंगे " | एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह छोड़कर वो वापस चली गयी |     

Sunday, January 4, 2015

हमीदा--

गांव में तनाव का माहौल था , लोग सशंकित थे किसी अनहोनी की आशंका से | हमीदा की गाय रात से गायब थी , तरह तरह की बाते हो रहीं थीं चारो तरफ | हमीदा खुद बहुत परेशान थी कि कहाँ चली गयी वो | जिंदगी में वो एक ही सहारा थी और अब वो भी नहीं मिल रही थी |
गांव में एक किनारे हमीदा का झोपड़ा था | पति शादी के दो साल बाद ही गुजर गया और कोई औलाद भी नहीं थी | अब अकेले की जिंदगी काटने के लिए उसने मायके से एक बछिया को लाकर पालना शुरू कर दिया | जैसे जैसे वो बड़ी होती गयी , हमीदा और व्यस्त होती चली गयी उसके साथ | पुरे गांव में उसका आना जाना था , सब लोगों के साथ उसका रिश्ता था , कोई चाचा , कोई ताऊ , कोई भैया तो कोई मौसी | उसे कभी महसूस ही नहीं हुआ था कि वो किसी और धर्म की है | अपने त्यौहार वो उतने मन से नहीं मनाती थी जितने गांव वालों के त्यौहार | धीरे धीरे बछिया बड़ी होकर एक दुधारू गाय बन गयी और वो उसका दूध लोगों के घर देने लगी | जो भी मिल जाता , उसके गुज़ारे के लिए काफी था | गाय के लिए चारा किसी के भी खेत से ले लेती और बदले में उसके यहाँ दूध पहुंचा देती |
फिर उसकी गाय ने एक बछिया को जन्म दिया | अब दो जनों के चारे की जरुरत पड़ने लगी जो कठिन था तो उसने सोचा कि क्यों न इस बछिया को किसी को दे दिया जाए | उसने अपने पड़ोसी जीतू को वो बछिया देने का फैसला कर लिया | गांव के साहूकार को जब पता चला कि जीतू को बछिया मिल गयी है तो उसके सीने पर सांप लोट गया | उस बछिया को वो लेने के बारे में सोच चुका था क्योंकि उसकी गाय बूढी हो गयी थी और दूध की जरुरत उसके बड़े परिवार को थी | अब वो किसी भी तरीके से उसे पाने की तरकीब सोचने लगा | सबसे पहले उसके गुर्गे जीतू के पास ये सन्देश लेकर गए कि वो बछिया साहूकार के यहाँ पहुंचा दे लेकिन उसने इंकार कर दिया | जब हमीदा को पता चला कि उसकी बछिया के चलते जीतू को धमकी मिल रही है तो उसने खुद साहूकार से बात करने का सोचा और उसके घर चली गयी | उसने गुज़ारिश करते हुए कहा कि इस बार तो जीतू को दी दिया है , अगली बछिया वो उसी को देगी |
गांव में अब तनाव का माहौल बनने लगा था | दुर्भाग्य से अगली बार हमीदा के गाय ने बछड़ा दे दिया | अब दिक्कत काफी बढ़ गयी थी , साहूकार इसे इज़्ज़त की बात बना चुका था और जीतू उसे बछिया देने को तैयार नहीं था | गांव का सौहार्दपूर्ण माहौल अब विषैला हो चला था |
अचानक लोगों में ये बात फैलने लगी कि हमीदा का धर्म अलग है | जिस बात को आजतक किसी ने सोचा भी नहीं था वो उनके जेहन में घर करने लगी | पता नहीं कौन ये ख़बरें फैला रहा था लेकिन अब लोग हमीदा से दूध लेने में आनाकानी करने लगे | किसी ने ये भी खबर उड़ा दी थी कि हमीदा के धर्म में तो लोग गाय का मांस खाते हैं और एक दिन इसकी गाय भी कटने के लिए चली जायेगी |
अब हमीदा बहुत परेशान रहने लगी थी , उसकी गाय के लिए उसे चारा जुटाना भी मुश्किल हो रहा था | दूध भी बहुत घरों में नहीं दे पा रही थी और कई लोग उससे मुंह चुराने लगे थे | साहूकार के लोगों का आतंक अलग था , कोई उनसे उलझने को तैयार नहीं था | लेकिन अभी भी कुछ लोगों को हमीदा से हमदर्दी थी , उसको वो लोग गलत नहीं समझते थे लेकिन सबके सामने चुप रहते थे |
फिर एक सुबह हमीदा की आँख खुली तो उसे अपनी गाय के रम्भाने की आवाज नहीं सुनाई दी | उसने बाहर निकालकर देखा तो उसके दरवाजे से गाय नदारद थी | वो पागलों की तरह उसे पुरे गांव में ढूढ़ने लगी , लेकिन उसका कहीं भी पता नहीं था | साहूकार के गुर्गों ने खबर उड़ा दी कि हमीदा ने गाय को कटने के लिए बेंच दिया |
पुरे दिन तरह तरह की अफवाहें उड़ती रहीं , कभी सुनने में आता कि गाय मिल गयी , कभी कोई कहता कि फलां बूचड़खाने में बेंच दी गयी | दिन बीता , रात आई , हमीदा के मुंह में पानी भी नहीं गया था | अगली सुबह लोगों ने देखा , हमीदा इस दुनिया को अलविदा कह गयी थी | घरवाले की जुदाई तो सह गयी लेकिन शायद अपनी गाय से जुदाई सह नहीं पायी |

Saturday, January 3, 2015

लक्ष्य-

फिर चाय पीने की तलब जोर मार रही थी , मौसम भी वैसा ही था | कमरे से बाहर निकलते ही सर्द हवा के झोंके ने एकबारगी तो हिला ही दिया लेकिन कदम खुद ब खुद उस नुक्कड़ वाली दुकान की और बढ़ चले |
यही जगह थी जहाँ कभी जमावड़ा लगता था दोस्तों का , हर कोई अपने ख्वाब संजोये था | सबको कुछ न कुछ बन के दिखाना था , किसी को माँ बाप के लिए तो किसी को खुद के लिए | लेकिन वो तो सिर्फ उसके लिए कुछ बनना चाहता था जिसने ये शर्त रखी थी कि जब तक तुम किसी अच्छी नौकरी में नहीं लग जाते , मेरे बारे में सोचना भी मत | और वो अपनों को छोड़ कर , मन में ये ठान कर आ गया कि तभी वापस जायेगा जब कुछ बन जायेगा |
जिस दिन उसने राज्य सेवा की मुख्य परीक्षा पास की , उसी दिन अपने शहर गया था ये खबर देने | लेकिन शर्त रखने वाला ही नहीं था वहां | अब उसे कोई लक्ष्य नहीं दिख रहा था , बुझे क़दमों से वो वापस आ गया और इंटरव्यू देने की इच्छा नहीं रही | फिर उसने तंय कर लिया कि औरों को उनकी मंजिल तक पहुँचाने का कार्य ही अब उसका लक्ष्य रहेगा |
चाय का ग्लास सामने रखा था और उसकी निगाहें अपने कोचिंग सेंटर के बोर्ड को देख रहीं थीं |

नव जीवन--

"बाबू, बाबू" , बाबा के मुंह अस्पष्ट सी आवाजें निकल रही थीं | वो अब धीरे धीरे अपनी ऑंखें खोलने का प्रयास कर रहे थे | खून अभी भी उनकी कलाईयों में चढ़ रहा था और मैं उनके सिरहाने बैठा उनको सहला रहा था |
मुझे सुबह का घटनाक्रम याद आ गया जिसके चलते उनको चोट लगी थी | मैं उनका लाडला पोता था और मुझे वो हमेशा बाबू ही बुलाते थे | मैं कल ही गांव आया था और आज मुझसे मिलने गांव के कई लोग आ गए | उसी बीच एक दलित लड़का आ कर दरवाजे पर पड़ी खाट पर बैठ गया | बाबा ने कभी भी दलितों को बराबर नहीं समझा था , शायद यह उनकी पीढ़ी की सोच थी | जबकि हम लोग इन चीजों के सख्त विरोधी थे और बाबा को समझाने की असफल चेष्टा करते रहते थे | बाबा का तो गुस्से के मारे बुरा हाल हो गया और उन्होंने उसे दौड़ा लिया | फिर ठोकर लगी और वो बेहोश हो गए | तुरंत उनको हस्पताल ले आया गया वर्ना कुछ भी हो सकता था |
उम्र भी काफी हो गयी थी उनकी और शरीर में रक्त की कमी भी | उन्हें ख़ून की सख्त जरुरत थी और मैं बीमारी की वजह से दे नहीं सकता था | तभी साथ आये गांव के मेरे दलित दोस्त ने आगे बढ़कर अपना खून दे दिया |
बाबा जब होश में आ गए तो मैंने उनको प्यार से बताया कि उनकी धमनियों में फिलवक्त दौड़ रहा खून उसी व्यक्ति का है जिनको उन्होंने कभी भी बराबर नहीं समझा | अब उनके चेहरे पर तमाम भाव आ जा रहे थे | शायद जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उनकी सोच को भी नया जीवन मिल रहा था |