" क्या हुआ सलीम साहब , चेहरा इतना उतरा हुआ क्यूँ है ? कहीं फिर इस बार टिकट का मसला गड़बड़ तो नहीं हो गया "|
" नहीं , कुछ नहीं , बस यूँ ही तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है "| टाल तो दिया उन्होंने लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खाए जा रहा था | पिछली बार भी यही हुआ था , आखिरी समय तक आश्वासन मिलता रहा था कि सीट आपकी पक्की है , फिर जाने क्यूँ उनका पत्ता फिर कट गया |
बैठक में कुर्सी पर औंधे लेटे लेटे पिछला २५ साल उनकी निगाहों से गुज़र गया | इसी जगह से उन्होंने छात्र जीवन की राजनीति शुरू की थी और पहली बार यहीं से उन्होंने विधान सभा का चुनाव लड़ा था | पार्टी में उनकी इज़्ज़त थी और उसकी वजह थी उनकी स्वच्छ छवि | किसी भी प्रकार के विवाद से दूर थे और आज तक किसी भी घोटाले में उनका नाम नहीं उछला था | इसी राजनीति की वज़ह से उन्होंने शादी करने का ख्याल भी मन से निकाल दिया था और वो पूरी तरह से यहाँ की जनता के हो कर रह गए थे |
लेकिन पिछले १० साल में राजनीति में तमाम परिवर्तन देखने को मिल रहे थे | राजनीति सेवा के बदले कमाने का जरिया बन गयी थी | लेकिन उन्होंने अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया और इस बदलते दौर में भी अपने को अक्षुण्ण रखा | अब राजनीति पर जात , बिरादरी और मज़हब हावी होने लगा था और वो तो अपनी पार्टी में कुछ गिने चुने लोगों में से थे जो किसी और मज़हब के थे | उनके इलाक़े के नौजवान राजनीतिज्ञ अब इतना तो समझ ही गए थे कि इनके रहते वो अपने मंसूबों को नहीं पा सकते | फिर क्या था , उन्होंने पार्टी प्रमुख के कान भरना शुरू कर दिया | कभी सलीम साहब का जो गुण हुआ करता था वो अब अवगुण में बदल गया | लेकिन फिर भी उनको उम्मीद थी कि पार्टी प्रमुख इस बार उनकी सीट जरूर सुरक्षित रखेंगे | पिछली बार ही उनको समझाया गया था कि इस बार आप आराम कर लीजिये , अगली बार आपका टिकट पक्का है | आखिर इतने सालों तक सेवा की थी उन्होंने पार्टी और क्षेत्र की जनता की , तो उसका प्रतिफल तो मिलना ही चाहिए |
आज सलीम सोचने पर मजबूर हो गए कि उन्होंने अपने आप को इस राजनीति के हिसाब से नहीं बदला या राजनीति ने ही अपने मूल्यों को बदल लिया | यही सोचते सोचते उनकी आँख लग गयी | अचानक फोन की घंटी से उनकी आँख खुल गयी , फोन पर विपक्षी दल के पार्टी प्रमुख थे | उन्होंने खुला न्योता दिया उनको अपने दल में आने का और टिकट का भरोसा भी | सलीम सोच में पड़ गए , क्या करूँ , क्या उस दल में चला जाऊँ जिसके खिलाफ वो सारी जिंदगी चुनाव लड़ते रहे या अपने दल में ही रह कर अगले चुनाव का इंतज़ार करूँ ?
आखिर में उन्होंने फोन लगाया अपने सबसे घनिष्ठ मित्र और राजनीतिक विश्लेषक राजीव को | राजीव ने सब सुना और उनसे पूछा " तुमने राजनीति क्यों शुरू की थी , क्या तुम्हे पद का लालच था , या पैसे का | जहाँ तक मुझे पता है तुमने ये जनता की सेवा के लिए शुरू किया था और तुम उसमे कामयाब भी थे | पिछले चुनाव में तुमको टिकट नहीं मिलने का नुकसान सबसे ज्यादा क्षेत्र की जनता का हुआ और अगर इस बार तुम विपक्षी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हो तो ये न सिर्फ तुम्हारे अपने सिद्धांतों से समझौता होगा , बल्कि जनता भी तुम पर विश्वास नहीं कर पायेगी | इसलिए कोई भी कदम बहुत सोच समझ कर उठाना "|
अगले दिन अख़बारों में सुर्खियां थीं " सलीम साहब ने अपने क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परचा दाखिल किया "|
" नहीं , कुछ नहीं , बस यूँ ही तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है "| टाल तो दिया उन्होंने लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खाए जा रहा था | पिछली बार भी यही हुआ था , आखिरी समय तक आश्वासन मिलता रहा था कि सीट आपकी पक्की है , फिर जाने क्यूँ उनका पत्ता फिर कट गया |
बैठक में कुर्सी पर औंधे लेटे लेटे पिछला २५ साल उनकी निगाहों से गुज़र गया | इसी जगह से उन्होंने छात्र जीवन की राजनीति शुरू की थी और पहली बार यहीं से उन्होंने विधान सभा का चुनाव लड़ा था | पार्टी में उनकी इज़्ज़त थी और उसकी वजह थी उनकी स्वच्छ छवि | किसी भी प्रकार के विवाद से दूर थे और आज तक किसी भी घोटाले में उनका नाम नहीं उछला था | इसी राजनीति की वज़ह से उन्होंने शादी करने का ख्याल भी मन से निकाल दिया था और वो पूरी तरह से यहाँ की जनता के हो कर रह गए थे |
लेकिन पिछले १० साल में राजनीति में तमाम परिवर्तन देखने को मिल रहे थे | राजनीति सेवा के बदले कमाने का जरिया बन गयी थी | लेकिन उन्होंने अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया और इस बदलते दौर में भी अपने को अक्षुण्ण रखा | अब राजनीति पर जात , बिरादरी और मज़हब हावी होने लगा था और वो तो अपनी पार्टी में कुछ गिने चुने लोगों में से थे जो किसी और मज़हब के थे | उनके इलाक़े के नौजवान राजनीतिज्ञ अब इतना तो समझ ही गए थे कि इनके रहते वो अपने मंसूबों को नहीं पा सकते | फिर क्या था , उन्होंने पार्टी प्रमुख के कान भरना शुरू कर दिया | कभी सलीम साहब का जो गुण हुआ करता था वो अब अवगुण में बदल गया | लेकिन फिर भी उनको उम्मीद थी कि पार्टी प्रमुख इस बार उनकी सीट जरूर सुरक्षित रखेंगे | पिछली बार ही उनको समझाया गया था कि इस बार आप आराम कर लीजिये , अगली बार आपका टिकट पक्का है | आखिर इतने सालों तक सेवा की थी उन्होंने पार्टी और क्षेत्र की जनता की , तो उसका प्रतिफल तो मिलना ही चाहिए |
आज सलीम सोचने पर मजबूर हो गए कि उन्होंने अपने आप को इस राजनीति के हिसाब से नहीं बदला या राजनीति ने ही अपने मूल्यों को बदल लिया | यही सोचते सोचते उनकी आँख लग गयी | अचानक फोन की घंटी से उनकी आँख खुल गयी , फोन पर विपक्षी दल के पार्टी प्रमुख थे | उन्होंने खुला न्योता दिया उनको अपने दल में आने का और टिकट का भरोसा भी | सलीम सोच में पड़ गए , क्या करूँ , क्या उस दल में चला जाऊँ जिसके खिलाफ वो सारी जिंदगी चुनाव लड़ते रहे या अपने दल में ही रह कर अगले चुनाव का इंतज़ार करूँ ?
आखिर में उन्होंने फोन लगाया अपने सबसे घनिष्ठ मित्र और राजनीतिक विश्लेषक राजीव को | राजीव ने सब सुना और उनसे पूछा " तुमने राजनीति क्यों शुरू की थी , क्या तुम्हे पद का लालच था , या पैसे का | जहाँ तक मुझे पता है तुमने ये जनता की सेवा के लिए शुरू किया था और तुम उसमे कामयाब भी थे | पिछले चुनाव में तुमको टिकट नहीं मिलने का नुकसान सबसे ज्यादा क्षेत्र की जनता का हुआ और अगर इस बार तुम विपक्षी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हो तो ये न सिर्फ तुम्हारे अपने सिद्धांतों से समझौता होगा , बल्कि जनता भी तुम पर विश्वास नहीं कर पायेगी | इसलिए कोई भी कदम बहुत सोच समझ कर उठाना "|
अगले दिन अख़बारों में सुर्खियां थीं " सलीम साहब ने अपने क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परचा दाखिल किया "|
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