चिता की लपटें धीरे धीरे ठंडी पड़ने लगीं , लोग जाने लगे थे| लेकिन हेमंत के मन में अभी भी अंधड़ चल रहा था , बेटी की यादों का अंधड़| कहाँ गलती हो गयी उनसे , क्या गलत चाहा था उन्होंने| एक बाप के लिए कितना मुश्किल होता है अपने बच्चे की चिता को आग देना, धम्म से बैठ गए वो घाट की सीढ़ियों पर| चचेरे भाई ने कंधे पर हाँथ रखा और कहा " हौसला रखो , नियति को शायद यही मंजूर था "| उन्होंने अपने हांथों को भाई के हाँथ पर रख दिया और फिर चिता की ओर देखने लगे| अँधेरा होने लगा था और ठण्ड भी बढ़ गयी थी, घाट पर चारो ओर जलती चिताएं मन को किसी और ही दुनियां में ले जा रही थीं| यही आखिरी सत्य है, पढ़ा था कभी , आज दिख भी रहा था उसे| बगल में एक चिता किसी बुजुर्ग की जल रही थी और उसके घर वालों के चेहरे पर ग़म का कोई निशान नहीं था| एक और चिता थी जिसके पास एक छोटा बच्चा था , सर मुंडाए हुए| शायद ये उसके पिता की चिता थी , लेकिन उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है| हाँ ,उस बच्चे के साथ के लोग काफी दुखी थे और सब सर झुकाये बैठे थे| हेमंत के मन में ये सवाल घूमने लगा कि मौत भी क्या होती है , कहीं लोग खुश दिख रहे हैं तो कहीं लोग ग़मज़दा| घाट पर सांड़ अपनी रौ में इधर उधर घूम रहे थे और मृत्यु के साये में जीवन भी अपने हिसाब से चल रहा था| क्या इसी दिन के लिए माँ बाप बच्चों को पैदा करते हैं , हेमंत को अपने सवाल का उत्तर नहीं मिल रहा था|
बेटी के पैदा होने पर हेमंत बहुत खुश था , पूरे ऑफिस को पार्टी दी थी| घर नाते रिश्तेदारों से भरा हुआ था , लोग आपस में कह भी रहे थे कि बेटी के जन्म पर इतनी ख़ुशी मनाने वाले बहुत कम मिलते हैं| उनकी पत्नी भी टोक देतीं , "अरे इतनी भी क्या ख़ुशी मनाना , नज़र लग जाएगी बिटिया को "| लेकिन हेमंत को कुछ भी नहीं सूझता था अपने बेटी के आगे, रात रात भर बेटी के बारे में ही बात करता रहता था पत्नी से| अगले कई सालों कि योजना भी बन गयीं थी उसके जन्म के कुछ दिन के अंदर ही|
हेमंत की सारी दुनिया बेटी के इर्द गिर्द ही घूमने लगी| दिन में भी फोन करके उसके बारे में पूछता रहता और ऑफिस से आते ही उसके साथ खेलने में लग जाता| सारे दिन की थकान जैसे उड़नछू हो जाती और जब रात में बेटी उसके सीने पर फ़ैल कर सोती तो उसको लगता जैसे सारा जहाँ उसके पास सिमट गया है| पत्नी की शिकायत रहती कि अब वो उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता लेकिन हेमंत इसे हंस कर टाल देता| दूसरे बच्चे के बारे में वो सोचता ही नहीं था और माँ के ये कहने पर कि एक बेटा भी हो जाता तो ठीक रहता , उसने कभी ध्यान नहीं दिया| शायद उसे ये लगने लगा था कि एक और बच्चा हो गया तो वो बेटी को इतना समय नहीं दे पायेगा| धीरे धीरे बेटी बड़ी होने लगी , उसका नाम उसी ने रखा था " स्निग्धा ", घर पर उसे प्यार से रानी बुलाता| अब बेटी भी घर पर उसका इंतज़ार करती कि कब पापा आएं और वो उनके साथ खेले| समय पंख लगाकर उड़ता गया , रानी ने स्कूल के बाद कालेज में कदम रखा और वो दिन भी आ गया जब उसका एडमिशन यूनिवर्सिटी में भी हो गया| रानी भी हेमंत की तरह प्रखर थी , हमेशा कक्षा में उच्च स्थान पाती और अन्य चीजों में भी उसकी सक्रिय भागेदारी रहती| वाद विवाद प्रतियोगिता हो या कविता पाठ , हर जगह वो आगे रहती और हेमंत का सर गर्व से ऊँचा हो जाता|
स्निग्धा यूनिवर्सिटी के आखिरी वर्ष में थी जब उसको इस नौकरी का ऑफर मिला था| कंपनी का ऑफिस दूसरे प्रदेश में एक छोटे से कस्बे में था और जगह नक्सलवाद से प्रभावित थी| उसकी पत्नी ने तो साफ़ इंकार कर दिया था इस नौकरी के लिए , इतनी दूर और वो भी खतरनाक इलाके में| लेकिन स्निग्धा अपना मन बना चुकी थी | पहले तो उसने माँ को समझाने की कोशिश की लेकिन जब वो नहीं मानी तो हेमंत के पास आकर चुपचाप बैठ गयी| हेमंत भी इस नौकरी से खुश नहीं था , कमोबेश यही डर उसके मन में भी बैठा हुआ था| लेकिन बेटी को उदास देख कर उससे रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा " क्या हुआ रानी , क्यों उदास हो "| रानी ने सर उठाया और उसकी ओर देखते हुए बोली " क्या आपको भी लगता है कि मेरा निर्णय उचित नहीं है| क्या डर सिर्फ ऐसी जगहों पर ही है , क्या यहाँ क़त्ल और लूटपाट नहीं होती| और इस डर की वजह से क्या मैं अपना भविष्य नहीं बनाऊँ "| हेमंत के पास कोई जवाब नहीं था , वो बेटी को बस देखता रहा| फिर उसने ये कहते हुए कि अब तुम समझदार हो गयी हो और अपना भला बुरा खुद समझ सकती हो , सहमति दे दी|
वो दिन भी आ गया जब बेटी को जाना था| हेमंत और पत्नी दोनों बेटी को पहुँचाने गए और एक हफ्ते वहां रुक कर उसकी गृहस्थी जमा दी| वापस आते समय हेमंत अपने जज़्बातों पर काबू पाने का पूरा प्रयास करता रहा लेकिन आंसू बह ही निकले| पत्नी और रानी भी रो पड़ीं और ये देखकर हेमंत ने अपने आप को संभाला| इस तरह रोकर विदा किया तो ज्यादा तकलीफ होगी , ये सोचते हुए वो मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाने का असफल प्रयत्न करता रहा| बस जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गयी , तब तक स्निग्धा अपना हाँथ हिलाती रही और फिर भारी क़दमों से वापस लौट गयी|
हर दिन हेमंत फोन करता , वो एक एक चीज तफ्सील से पूछता| स्निग्धा उसी उत्साह से छोटी से छोटी बात उसे बताती , वो बातें भी जो वो अपने माँ से नहीं बता पाती थी| अब अपने ऑफिस की समस्याएं और घटनाएँ हेमंत के लिए गौण हो गयी थीं , उसे तो सिर्फ बेटी के ऑफिस की बातें और समस्याएं ही दिखती थीं अब| हर महीने दो तीन दिन के लिए वो बेटी के घर चला जाता और फिर वे दोनों दुनिया जहान की बातें करते| स्निग्धा के ऑफिस की अधिकांश समस्याएं वो हल कर देता और फिर वो दुगुने उत्साह से अपने काम में लग जाती|
इधर कुछ दिनों से स्निग्धा हेमंत के फोन का जवाब उतने उत्साह से नहीं दे रही थी| पहले तो हेमंत को लगा की शायद काम की अधिकता और तनाव होगा लेकिन धीरे धीरे उसे ये लगने लगा कि स्निग्धा उससे कुछ छुपा रही है| शनिवार को हेमंत निकल पड़ा बेटी से मिलने| पहले तो वो टालती रही लेकिन आखिरकार उसने बताना प्रारम्भ कर दिया| " नक्सलियों की आड़ में माफिया यहाँ की सभी कंपनियों से पैसा वसूल करने में लगे हैं और जब उसने इस बात को मीडिया में ले जाने की धमकी दी तो उसकी खुद की कंपनी के बॉस उसपर नाराज़ हो गए| उनके हिसाब से जैसा चल रहा है उसे चलने देना चाहिए और बिना वजह किसी पचड़े में फंसने से बेहतर है थोड़ा पैसा दे कर अपने को बचा के चलें "|
" क्या ये सही है पापा , आपने ही तो सिखाया था कि हमेशा अपने दिल की सुनो और जो खुद को सही लगे वही करो| यहाँ के माफिया न सिर्फ लोगों से पैसा वसूल रहे हैं बल्कि नक्सलिओं के खिलाफ एक ऐसा दुष्प्रचार भी कर रहे हैं जिनमे वो शामिल नहीं हैं| अब आप ही बताईये कि क्या मैं इसे ऐसे ही चलने दूँ "|
हेमंत भी निरुत्तर हो गया , बेटी की बातों में सच्चाई थी लेकिन उसे इस तरह परेशान नहीं देख सकता था| फिर ये भी ख्याल आया कि कहीं उसे कोई खतरा तो नहीं होगा लेकिन फिर उसने उस ख्याल को मन से झटक दिया|
"स्निग्धा , सवाल ये नहीं है कि सही क्या है और गलत क्या , सवाल ये है कि क्या हम उससे सीधे सीधे प्रभावित हो रहे हैं| पैसा तुम्हारी कंपनी को देना है और वो दे रही है , फिर तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है इससे", हेमंत ने उसे समझाने की कोशिश की| बेटी उससे सहमत नहीं थी लेकिन उसने अपना सर हिला दिया और दूसरी ओर देखने लगी|
वापस आने के बाद हेमंत परेशान हो गया लेकिन पत्नी के सामने वो बिलकुल सामान्य रहता ताकि उसे कोई चिंता नहीं हो| वो ये भी सोच रहा था कि वो बेटी को जॉब छोड़ने के लिए कह दे पर उसका खुद का मन इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था| उसे लगता था कि शायद कुछ दिन बाद स्निग्धा अपने आप को उस परिस्थिति में ढाल लेगी और सब कुछ सामान्य हो जायेगा| वो रोज फोन करता और उसे बेटी की बातों में सब कुछ सामान्य लगता|
इसी बीच एक दिन हेमंत ने समाचारों में उस कस्बे के बारे में कुछ देखा , शायद कोई मुठभेड़ हुई थी पुलिस और नक्सलियों में| शाम को उसकी बात हुई बेटी से तो उसने कुछ खास नहीं बताया , बस इतना कहा कि मैं ठीक हूँ पापा , आप चिंता मत कीजिये| लेकिन अब हेमंत का मन थोड़ा परेशान हो रहा था , उसने सोच लिया कि अगले शनिवार को पत्नी के साथ स्निग्धा के यहाँ जायेगा|
शुक्रवार की रात उसके मोबाइल फोन की घंटी बजी, फोन बेटी के एरिया से ही था लेकिन वहां के पुलिस थाने से| घबराया हुआ हेमंत पूछ रहा था कि क्या हुआ लेकिन वहां से यही बताया गया कि आप तुरंत आ जाइए , आपकी बेटी दुर्घटना में घायल हो गयी है| अफरा तफरी में वे दोनों निकल पड़े और सुबह हॉस्पिटल पहुंचे| हेमंत का तो दिल जैसे बैठ ही गया था और पत्नी ने बाहर से ही रोना शुरू कर दिया| फिर वहां खड़े एक कांस्टेबल ने उनको पोस्टमार्टम घर पहुँचाया जहाँ स्निग्धा के मृत शरीर पर सर रखकर हेमंत बहुत देर तक रोता रहा| पुलिस इंस्पेक्टर ने बताया कि ऑफिस से घर जाते समय किसी गाड़ी ने आपकी बेटी को टक्कर मार दिया , हम लोग छानबीन कर रहे हैं| और भी बहुत कुछ बता रहा था वो लेकिन हेमंत कुछ सुन नहीं पा रहा था, उसका दिमाग जैसे संज्ञाशून्य हो गया था| दिल पर पत्थर रखकर एम्बुलेंस में बेटी की लाश लेकर वो उसके घर पहुंचा और वहां से उसकी चीजों को समेटने लगा| इसी बीच लोगों की बातचीत भी कानों में पड़ रही थी कि क्या जरुरत थी माफिया से पंगा लेने की और अब उसके समझ में बात आने लगी| पत्नी तो जैसे पागल सी हो गयी थी , रह रह कर बेटी का नाम लेकर चिल्लाती और निढाल हो जाती|
बेटी की जलती चिता को देखते हुए हेमंत के दिमाग में ये सब घूम रहा था| आज तक तो उसने पत्नी को सारी बातें नहीं बतायीं थीं लेकिन अब उसने उसे हर बात बताने का फैसला कर लिया था| साथ ही साथ उसने बेटी के एरिया में ही अपना ट्रांसफर करवाने का दृढ निश्चय कर लिया| अब उसे बेटी के शुरू किये गए अधूरे कार्य को पूरा करना था और इसमें उसे अब किसी भी बात की परवाह नहीं थी| अपनी बेटी को इससे उचित श्रद्धांजलि और कुछ नहीं दे सकता था वो, एक बार और उसने चिता की ओर देखा और फिर आसमान की ओर सर उठा लिया| कहीं दूर तारों के बीच उसे अपनी बेटी का मुस्कुराता संतुष्ट चेहरा नज़र आने लगा|
बेटी के पैदा होने पर हेमंत बहुत खुश था , पूरे ऑफिस को पार्टी दी थी| घर नाते रिश्तेदारों से भरा हुआ था , लोग आपस में कह भी रहे थे कि बेटी के जन्म पर इतनी ख़ुशी मनाने वाले बहुत कम मिलते हैं| उनकी पत्नी भी टोक देतीं , "अरे इतनी भी क्या ख़ुशी मनाना , नज़र लग जाएगी बिटिया को "| लेकिन हेमंत को कुछ भी नहीं सूझता था अपने बेटी के आगे, रात रात भर बेटी के बारे में ही बात करता रहता था पत्नी से| अगले कई सालों कि योजना भी बन गयीं थी उसके जन्म के कुछ दिन के अंदर ही|
हेमंत की सारी दुनिया बेटी के इर्द गिर्द ही घूमने लगी| दिन में भी फोन करके उसके बारे में पूछता रहता और ऑफिस से आते ही उसके साथ खेलने में लग जाता| सारे दिन की थकान जैसे उड़नछू हो जाती और जब रात में बेटी उसके सीने पर फ़ैल कर सोती तो उसको लगता जैसे सारा जहाँ उसके पास सिमट गया है| पत्नी की शिकायत रहती कि अब वो उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता लेकिन हेमंत इसे हंस कर टाल देता| दूसरे बच्चे के बारे में वो सोचता ही नहीं था और माँ के ये कहने पर कि एक बेटा भी हो जाता तो ठीक रहता , उसने कभी ध्यान नहीं दिया| शायद उसे ये लगने लगा था कि एक और बच्चा हो गया तो वो बेटी को इतना समय नहीं दे पायेगा| धीरे धीरे बेटी बड़ी होने लगी , उसका नाम उसी ने रखा था " स्निग्धा ", घर पर उसे प्यार से रानी बुलाता| अब बेटी भी घर पर उसका इंतज़ार करती कि कब पापा आएं और वो उनके साथ खेले| समय पंख लगाकर उड़ता गया , रानी ने स्कूल के बाद कालेज में कदम रखा और वो दिन भी आ गया जब उसका एडमिशन यूनिवर्सिटी में भी हो गया| रानी भी हेमंत की तरह प्रखर थी , हमेशा कक्षा में उच्च स्थान पाती और अन्य चीजों में भी उसकी सक्रिय भागेदारी रहती| वाद विवाद प्रतियोगिता हो या कविता पाठ , हर जगह वो आगे रहती और हेमंत का सर गर्व से ऊँचा हो जाता|
स्निग्धा यूनिवर्सिटी के आखिरी वर्ष में थी जब उसको इस नौकरी का ऑफर मिला था| कंपनी का ऑफिस दूसरे प्रदेश में एक छोटे से कस्बे में था और जगह नक्सलवाद से प्रभावित थी| उसकी पत्नी ने तो साफ़ इंकार कर दिया था इस नौकरी के लिए , इतनी दूर और वो भी खतरनाक इलाके में| लेकिन स्निग्धा अपना मन बना चुकी थी | पहले तो उसने माँ को समझाने की कोशिश की लेकिन जब वो नहीं मानी तो हेमंत के पास आकर चुपचाप बैठ गयी| हेमंत भी इस नौकरी से खुश नहीं था , कमोबेश यही डर उसके मन में भी बैठा हुआ था| लेकिन बेटी को उदास देख कर उससे रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा " क्या हुआ रानी , क्यों उदास हो "| रानी ने सर उठाया और उसकी ओर देखते हुए बोली " क्या आपको भी लगता है कि मेरा निर्णय उचित नहीं है| क्या डर सिर्फ ऐसी जगहों पर ही है , क्या यहाँ क़त्ल और लूटपाट नहीं होती| और इस डर की वजह से क्या मैं अपना भविष्य नहीं बनाऊँ "| हेमंत के पास कोई जवाब नहीं था , वो बेटी को बस देखता रहा| फिर उसने ये कहते हुए कि अब तुम समझदार हो गयी हो और अपना भला बुरा खुद समझ सकती हो , सहमति दे दी|
वो दिन भी आ गया जब बेटी को जाना था| हेमंत और पत्नी दोनों बेटी को पहुँचाने गए और एक हफ्ते वहां रुक कर उसकी गृहस्थी जमा दी| वापस आते समय हेमंत अपने जज़्बातों पर काबू पाने का पूरा प्रयास करता रहा लेकिन आंसू बह ही निकले| पत्नी और रानी भी रो पड़ीं और ये देखकर हेमंत ने अपने आप को संभाला| इस तरह रोकर विदा किया तो ज्यादा तकलीफ होगी , ये सोचते हुए वो मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाने का असफल प्रयत्न करता रहा| बस जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गयी , तब तक स्निग्धा अपना हाँथ हिलाती रही और फिर भारी क़दमों से वापस लौट गयी|
हर दिन हेमंत फोन करता , वो एक एक चीज तफ्सील से पूछता| स्निग्धा उसी उत्साह से छोटी से छोटी बात उसे बताती , वो बातें भी जो वो अपने माँ से नहीं बता पाती थी| अब अपने ऑफिस की समस्याएं और घटनाएँ हेमंत के लिए गौण हो गयी थीं , उसे तो सिर्फ बेटी के ऑफिस की बातें और समस्याएं ही दिखती थीं अब| हर महीने दो तीन दिन के लिए वो बेटी के घर चला जाता और फिर वे दोनों दुनिया जहान की बातें करते| स्निग्धा के ऑफिस की अधिकांश समस्याएं वो हल कर देता और फिर वो दुगुने उत्साह से अपने काम में लग जाती|
इधर कुछ दिनों से स्निग्धा हेमंत के फोन का जवाब उतने उत्साह से नहीं दे रही थी| पहले तो हेमंत को लगा की शायद काम की अधिकता और तनाव होगा लेकिन धीरे धीरे उसे ये लगने लगा कि स्निग्धा उससे कुछ छुपा रही है| शनिवार को हेमंत निकल पड़ा बेटी से मिलने| पहले तो वो टालती रही लेकिन आखिरकार उसने बताना प्रारम्भ कर दिया| " नक्सलियों की आड़ में माफिया यहाँ की सभी कंपनियों से पैसा वसूल करने में लगे हैं और जब उसने इस बात को मीडिया में ले जाने की धमकी दी तो उसकी खुद की कंपनी के बॉस उसपर नाराज़ हो गए| उनके हिसाब से जैसा चल रहा है उसे चलने देना चाहिए और बिना वजह किसी पचड़े में फंसने से बेहतर है थोड़ा पैसा दे कर अपने को बचा के चलें "|
" क्या ये सही है पापा , आपने ही तो सिखाया था कि हमेशा अपने दिल की सुनो और जो खुद को सही लगे वही करो| यहाँ के माफिया न सिर्फ लोगों से पैसा वसूल रहे हैं बल्कि नक्सलिओं के खिलाफ एक ऐसा दुष्प्रचार भी कर रहे हैं जिनमे वो शामिल नहीं हैं| अब आप ही बताईये कि क्या मैं इसे ऐसे ही चलने दूँ "|
हेमंत भी निरुत्तर हो गया , बेटी की बातों में सच्चाई थी लेकिन उसे इस तरह परेशान नहीं देख सकता था| फिर ये भी ख्याल आया कि कहीं उसे कोई खतरा तो नहीं होगा लेकिन फिर उसने उस ख्याल को मन से झटक दिया|
"स्निग्धा , सवाल ये नहीं है कि सही क्या है और गलत क्या , सवाल ये है कि क्या हम उससे सीधे सीधे प्रभावित हो रहे हैं| पैसा तुम्हारी कंपनी को देना है और वो दे रही है , फिर तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है इससे", हेमंत ने उसे समझाने की कोशिश की| बेटी उससे सहमत नहीं थी लेकिन उसने अपना सर हिला दिया और दूसरी ओर देखने लगी|
वापस आने के बाद हेमंत परेशान हो गया लेकिन पत्नी के सामने वो बिलकुल सामान्य रहता ताकि उसे कोई चिंता नहीं हो| वो ये भी सोच रहा था कि वो बेटी को जॉब छोड़ने के लिए कह दे पर उसका खुद का मन इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था| उसे लगता था कि शायद कुछ दिन बाद स्निग्धा अपने आप को उस परिस्थिति में ढाल लेगी और सब कुछ सामान्य हो जायेगा| वो रोज फोन करता और उसे बेटी की बातों में सब कुछ सामान्य लगता|
इसी बीच एक दिन हेमंत ने समाचारों में उस कस्बे के बारे में कुछ देखा , शायद कोई मुठभेड़ हुई थी पुलिस और नक्सलियों में| शाम को उसकी बात हुई बेटी से तो उसने कुछ खास नहीं बताया , बस इतना कहा कि मैं ठीक हूँ पापा , आप चिंता मत कीजिये| लेकिन अब हेमंत का मन थोड़ा परेशान हो रहा था , उसने सोच लिया कि अगले शनिवार को पत्नी के साथ स्निग्धा के यहाँ जायेगा|
शुक्रवार की रात उसके मोबाइल फोन की घंटी बजी, फोन बेटी के एरिया से ही था लेकिन वहां के पुलिस थाने से| घबराया हुआ हेमंत पूछ रहा था कि क्या हुआ लेकिन वहां से यही बताया गया कि आप तुरंत आ जाइए , आपकी बेटी दुर्घटना में घायल हो गयी है| अफरा तफरी में वे दोनों निकल पड़े और सुबह हॉस्पिटल पहुंचे| हेमंत का तो दिल जैसे बैठ ही गया था और पत्नी ने बाहर से ही रोना शुरू कर दिया| फिर वहां खड़े एक कांस्टेबल ने उनको पोस्टमार्टम घर पहुँचाया जहाँ स्निग्धा के मृत शरीर पर सर रखकर हेमंत बहुत देर तक रोता रहा| पुलिस इंस्पेक्टर ने बताया कि ऑफिस से घर जाते समय किसी गाड़ी ने आपकी बेटी को टक्कर मार दिया , हम लोग छानबीन कर रहे हैं| और भी बहुत कुछ बता रहा था वो लेकिन हेमंत कुछ सुन नहीं पा रहा था, उसका दिमाग जैसे संज्ञाशून्य हो गया था| दिल पर पत्थर रखकर एम्बुलेंस में बेटी की लाश लेकर वो उसके घर पहुंचा और वहां से उसकी चीजों को समेटने लगा| इसी बीच लोगों की बातचीत भी कानों में पड़ रही थी कि क्या जरुरत थी माफिया से पंगा लेने की और अब उसके समझ में बात आने लगी| पत्नी तो जैसे पागल सी हो गयी थी , रह रह कर बेटी का नाम लेकर चिल्लाती और निढाल हो जाती|
बेटी की जलती चिता को देखते हुए हेमंत के दिमाग में ये सब घूम रहा था| आज तक तो उसने पत्नी को सारी बातें नहीं बतायीं थीं लेकिन अब उसने उसे हर बात बताने का फैसला कर लिया था| साथ ही साथ उसने बेटी के एरिया में ही अपना ट्रांसफर करवाने का दृढ निश्चय कर लिया| अब उसे बेटी के शुरू किये गए अधूरे कार्य को पूरा करना था और इसमें उसे अब किसी भी बात की परवाह नहीं थी| अपनी बेटी को इससे उचित श्रद्धांजलि और कुछ नहीं दे सकता था वो, एक बार और उसने चिता की ओर देखा और फिर आसमान की ओर सर उठा लिया| कहीं दूर तारों के बीच उसे अपनी बेटी का मुस्कुराता संतुष्ट चेहरा नज़र आने लगा|
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