" कुछ नहीं हुआ है मुझे , चले जाइए आप लोग यहाँ से " , वो पागलों की तरह चीख रही थी | चेहरे से खून बह कर गर्दन पर आकर सूख गया था | अक्सर उसके घर से रोने और चिल्लाने की आवाजें आती रहतीं थीं और बगल के फ्लैट में रहते हुए उसे अनसुना करना बहुत कठिन हो गया था | उस दिन फिर जब आवाजें बर्दास्त के बाहर हो गयीं तो आखिर उसने फैसला कर लिया देखने का | दरवाजा जरा सा धक्का देते ही खुल गया और अंदर का दृश्य झकझोर देने वाला था | वो उसको बुरी तरह पीट रहा था और आखिर खुद गिर पड़ा | जैसे ही किसी के आने का आभास हुआ , वो अपने को सँभालते हुए पलटी और चिल्लाने लगी |
अगले दोपहर उसको देखा तो रहा नहीं गया | उसके कंधे पर हाँथ रखकर जानना चाहा कि क्यों बर्दास्त करती है वो ये मारपीट | पहले तो अपनी सूनी आँखों से आसमान में देखती रही फिर धीरे से बोली " कम पढ़ी लिखी हूँ न , अपने घर में तो सिर्फ मार पीट ही होती है , बाहर निकली तो लोग शायद नोंच के खा जाएंगे " | एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह छोड़कर वो वापस चली गयी |
अगले दोपहर उसको देखा तो रहा नहीं गया | उसके कंधे पर हाँथ रखकर जानना चाहा कि क्यों बर्दास्त करती है वो ये मारपीट | पहले तो अपनी सूनी आँखों से आसमान में देखती रही फिर धीरे से बोली " कम पढ़ी लिखी हूँ न , अपने घर में तो सिर्फ मार पीट ही होती है , बाहर निकली तो लोग शायद नोंच के खा जाएंगे " | एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह छोड़कर वो वापस चली गयी |
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