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Saturday, January 3, 2015

लक्ष्य-

फिर चाय पीने की तलब जोर मार रही थी , मौसम भी वैसा ही था | कमरे से बाहर निकलते ही सर्द हवा के झोंके ने एकबारगी तो हिला ही दिया लेकिन कदम खुद ब खुद उस नुक्कड़ वाली दुकान की और बढ़ चले |
यही जगह थी जहाँ कभी जमावड़ा लगता था दोस्तों का , हर कोई अपने ख्वाब संजोये था | सबको कुछ न कुछ बन के दिखाना था , किसी को माँ बाप के लिए तो किसी को खुद के लिए | लेकिन वो तो सिर्फ उसके लिए कुछ बनना चाहता था जिसने ये शर्त रखी थी कि जब तक तुम किसी अच्छी नौकरी में नहीं लग जाते , मेरे बारे में सोचना भी मत | और वो अपनों को छोड़ कर , मन में ये ठान कर आ गया कि तभी वापस जायेगा जब कुछ बन जायेगा |
जिस दिन उसने राज्य सेवा की मुख्य परीक्षा पास की , उसी दिन अपने शहर गया था ये खबर देने | लेकिन शर्त रखने वाला ही नहीं था वहां | अब उसे कोई लक्ष्य नहीं दिख रहा था , बुझे क़दमों से वो वापस आ गया और इंटरव्यू देने की इच्छा नहीं रही | फिर उसने तंय कर लिया कि औरों को उनकी मंजिल तक पहुँचाने का कार्य ही अब उसका लक्ष्य रहेगा |
चाय का ग्लास सामने रखा था और उसकी निगाहें अपने कोचिंग सेंटर के बोर्ड को देख रहीं थीं |

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