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Friday, February 27, 2015

प्रार्थना--

आज नेहा को प्रार्थना करते देख कर वो सोच में पड़ गया , पहले तो कभी देखा नहीं था |
फिर याद आ गया , सुबह तैयार होकर वो निकलने जा रही थी कि कराची के स्कूल में हुआ बच्चों पर हमला टी वी पर आने लगा | बिलकुल संज्ञाशून्य हो गयी थी ये सब देखकर और बस एक ही सवाल बार बार पूछ रही थी " पापा , उन बच्चों का क्या कसूर था "|
अब वो अपने सवाल का जवाब मांग रही थी या उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ !

साम्य--

मनोज ख़ामोशी से देख रहा था , बिलकुल वही ढंग , कहीं अतीत में खो गया वो | १२ साल पहले पत्नी इस दुनियां को छोड़ गयी थी , तब ये सिर्फ ५ साल की थी | उसने माँ , बाप दोनों का प्यार दिया था बेटी को | आज अचानक उसे इस तरह देख कर पत्नी की याद आ गयी उसे |
अचानक बेटी की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा " पापा , देखो मैं मम्मी जैसी लग रही हूँ ना "|
भर्राये गले से वो इतना ही बोल पाया " बेटी , तुम माँ जैसी नहीं , बिलकुल माँ लग रही हो "|

Monday, February 23, 2015

एक दिन--

" जरा अंदर आईये ", बॉस का फोन था इण्टरकॉम पर | उसके लहज़े ने सोचने के लिए कुछ नहीं छोड़ा था | क्या गड़बड़ हो गयी आज फिर , तनाव से भरे हुए अंदर पहुंचे |
" ये क्या रिपोर्ट बनायी है , इतने साल हो गए आपको , कब सीखेंगे | दूसरी रिपोर्ट बना के आज ही दीजिये "|
मुंह लटकाये वापस अपनी मेज पर आ गए | सर भन्नानें लगा था , पता नहीं क्या समझता है अपने आप को | चाय की तेज़ तलब हुई , फिर याद आया कि सुबह से अभी तक चाय नहीं आई |
" गोपी , ज़रा चाय तो लाना ", लेकिन गोपी ने बताया कि कैंटीन वाला तो आया ही नहीं आज |
" बाहर से लाऊँ क्या " गोपी ने पूछा | बेमन से हाँ बोलकर फिर से लग गए रिपोर्ट बनाने में | दुबारा रिपोर्ट दिखाया , बॉस का ईगो अब संतुष्ट हो गया था इसलिए रिपोर्ट पास हो गयी | फाइलें निपटाते शाम के ७ बज गए , शरीर और मन थक कर चूर हो गया था | ऑफिस से बाहर निकले और जैसे ही स्कूटर स्टैंड से उतारा , देखा पहिया पंचर था |
बुरी तरह झल्लाए , और पूरी कायनात को कोसते हुए स्कूटर घसीट कर पंचर वाले के पास पहुंचे और आधे घंटे बाद बनवाकर घर की ओर चल पड़े | इसी झल्लाहट में कब रेड लाइट पार कर गए , पता ही नहीं चला | किसी तरह पुलिस वाले को १०० रु थमाकर जान बचायी और घर पहुंचे | रात के ९ बज गए थे , बिजली भी आज गुल थी |
आज का तो दिन ही ख़राब है सोचते हुए दरवाजे को खटखटाने वाले ही थे कि बेटी ने दरवाज़ा खोला | उनके हाँथ से बैग लेते हुए उसने कहा " चाय पिएंगे पापा , अभी अभी बनायीं है "| उसके चेहरे की तरफ गौर से देखा उन्होंने और थोड़ी देर पहले ही उनके मन में आया ख्याल काफ़ूर हो चुका था |   

मेला--

" हमहूँ जॉब मेला देखे , हमके भी तैयार करा " , आवाज लगाती छुटकी घर में घुसी | रमिया बर्तन मांज कर किनारे रख रही थी | ख़ुशी के मारे छुटकी टकरा गयी रमिया से , बर्तन टन टन करते लुढक गए |
" हट मुँहझौंसी , गिरा देहलेस बटुली | अच्छा इ बता , तोहरे संघे के जाई मेला देखे ", थोड़ा गुस्सा दिखाते बोली रमिया |
" ललिया भी जाई , हम ओकरे संघे चल जॉब , हमके भी नया फराक पहिने के हौ "| फिर दौड़ के खुद ही लाल फराक ले के आ गयी | नए के नाम पर ले दे के यही एक कपडा था उसके पास जो वो शादी बियाह , मेला , नाच वगैरह में पहनती थी |
" ठीक हौ , जो पहिले मुंह धो के आव , मारे धूर के भूत जइसन हो गयल हौ तोर मुंह " , और छुटकी लोटा से पानी लेकर मुंह धोने बैठ गयी | रमिया ने उसे नयका फराक पहनाया और मुंह पर बचा के रखा हुआ पाउडर भी लगा दिया | छोटकी चप्पल पहिन के निकलने को हुई कि रमिया बोली " पईसा ले जा की ओइसही मेला देखबी " और निकाल कर दो रूपया उसके हाँथ में धर दिया | छोटकी तीर की माफ़िक़ उड़ गयी , रमिया चिल्लाती रह गयी " तनिक ध्यान से , ज्यादा देर मत करिहे मेला में "|
दोनों दोस्त उछलते कूदते मेला देखने चलीं | पूरा रास्ता धुरियाया हुआ था , लोग पैदल , साइकिल से , बैलगाड़ी से और ज्यादा बड़के घर वाले मोटरसाइकिल से जा रहे थे | दूर से ही गुब्बारे दिखाई पड़ने लगे , बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ रही थी और ढोल धमाके की आवाज भी आ रही थी | मेला में पहुँचते ही चारो तरफ भीड़ ही भीड़ नज़र आ रही थी , कहीं चाट के ठेले , कहीं चिनिया बादाम की दूकान | जगह जगह झूले भी लगे हुए थे और बच्चे उस पर झूल रहे थे । उनकी सबसे पसंदीदा चीज थी बुढ़िया का बाल जो कि जगह जगह बिक रही थी |
छोटकी ने ललिया का हाँथ पकड़ कर एक दुकान की तरफ खींचा , बुढ़िया के बाल का दाम पूछा और एक रुपये में दोनों ने खरीद लिया | उसे खाते हुए दोनों मेला का चक्कर लगाने लगीं | एक जगह मिटटी के खिलौने बिक रहे थे , छोटे , रंगीन और मन को मोहने वाले | ललिया की नज़र अटक गयी उस पर , फिर दोनों हांथों से छू कर देखने लगीं | एक छोटा सा खिलौना लिया उन्होंने और फिर बांसुरी की दुकान पर से एक बांसुरी | मेले में एक तरफ डुगडुगी बज़ रही थी , कोई तमाशा हो रहा था वहां | दोनों भागते हुए उधर पहुंची और उचक उचक कर देखने की कोशिश करने लगीं | कुछ दिख नहीं रहा था लेकिन अंदर जाने के लिए टिकट लेना पड़ता | पैसे अब ख़त्म हो रहे थे और वो दोनों भी अब लगभग सारा मेला घूम आई थीं |
तभी छोटकी को ध्यान आया माई रमिया का | चिनिया बादाम बहुत पसंद थे उसको , उसने बचे पैसे का चिनिया बादाम लिया और फिर ललिया का हाथ पकड़ कर चल पड़ी मेले के बाहर | दोनों घर की ओर चल पड़ीं , लोग अभी भी जा रहे थे मेले की ओर | ललिया बांसुरी बजा रही थी , छोटकी चिनिया बादाम संभाले चल रही थी | रास्ते पर धूर गर्दा उड़ रहा था , ढोल ढमाके और बांसुरी की सुरीली आवाज़ अभी भी सुनाई दे रही थी |

Friday, February 20, 2015

समानता--

" किन्नर भी हम जैसे ही तो हैं , जरुरत है उन्हें समाज का अभिन्न अंग बनाने की | हम सब को इसके लिए सम्मिलित प्रयास करना होगा "| उद्घाटन भाषण समाप्त करके मंत्रीजी ने घड़ी की तरफ देखा और स्टेज से उतर गए | सुरक्षा दस्ते ने उनको भींड से बचाकर पंडाल से बाहर निकाला और पसीना पोंछते वो कार में बैठने लगे |
" साहब , मेरे बच्चे को बचा लीजिये , उसे किन्नर जबरदस्ती उठा ले गए हैं " |
" इसमें मैं क्या कर सकता हूँ " कहते हुए एक नज़र उन्होंने उसकी तरफ देखा और गार्ड को इशारा किया | नीचे गिरे उस व्यक्ति के जेहन में मंत्री जी का कहा " किन्नर भी हम जैसे ही तो हैं " घूम रहा था | कार धूल उड़ाते हुए निकल गयी और स्टेज से किन्नर समाज के अन्य वक्ताओं की आवाज़ गूंज रही थी |

Thursday, February 19, 2015

बचपन--

लखन की लाश घर के अहाते में पड़ी थी , पूरा गाँव जुट गया था | अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं , बस चिंता थी कि अंतिम संस्कार के पैसों का इंतज़ाम कहाँ से होगा | आखिरकार बुज़ुर्ग ताऊ उठे और लखन के नाबालिग बेटे को लेकर महाजन के यहाँ चल दिए | उसने भी क़र्ज़ देने से इंकार कर दिया क्योंकि लखन के नाम न तो कोई खेत था और न ही कोई और जायदाद |
फिर ताऊ ने महाजन को कुछ समझाया और उसने आश्वस्त होकर पैसे दे दिए | श्मशान घाट पर लखन की चिता के साथ उसके बेटे का भविष्य भी आग में स्वाहा हो रहा था | एक और बचपन बंधुआ मज़दूरी की भेंट चढ़ गया था |  

Wednesday, February 18, 2015

बाल श्रम--

" साहब , पॉलिस कर दूँ , १५ रुपये लगेंगे " |
" नहीं कराना मुझे , हटो यहाँ से " |
" अच्छा सिर्फ १० रुपये , करा लो न साहब " |
" ठीक है , बढ़िया से क्रीम लगाके करना " और जूते उतार दिए उन्होंने |
बच्चे ने पॉलिस कर के जूते उनकी तरफ बढ़ा दिए | वो फोन पर बात कर रहे थे " हाँ हाँ , जरूर आऊंगा , बाल श्रम से जुड़े मुद्दे पर तो बहुत जगहों पर व्याख्यान दिए हैं मैंने , बस ज़रा पारिश्रमिक का ध्यान रखियेगा "| तभी नज़र पड़ी , सामने लोकल आ गयी थी | जल्दी से जूते पहने , जेब में से ५ का सिक्का निकाला और बच्चे की तरफ फेंकते हुए दौड़ कर ट्रैन में चढ़ गए | 

Monday, February 16, 2015

जवाब--

वो प्यार का पैमाना जानना चाह रही थी , लेकिन वो खामोश था |
अचानक उसने उसकी निगाहों में देखा , उसके सभी सवालों का जवाब मिल गया |
कभी कभी खामोशियाँ कितना कुछ बयान कर देती हैं |  

सज़ा--

" बाई , कल से काम पर मत आना "|
" लेकिन मेमसाब , मैंने तो कुछ नहीं किया "|
कहना तो चाहती थी " हाँ , तुमने तो कुछ नहीं किया लेकिन साहब को तो नहीं कह सकती मैं ", लेकिन जुबाँ ने साथ नहीं दिया |
बाई हिकारत से देखती हुई चली गयी , उसके अंदर कुछ दरक सा गया |

Saturday, February 14, 2015

शिक्षा दान--

" मज़ाक बना रखा है स्कूल प्रबंधन ने , कितनी बार कहा है कि फर्नीचर बदलो , सारे कमरों में ए सी लगाओ, लेकिन कान ही नहीं देते इन बातों पर "| बड़बड़ाते हुए सुमन ने अपना बैग पटक दिया और सोफे में धंस गयी |
" चलो तुम्हे दिखाता हूँ कुछ ", और वीरेन ने उसे साथ लिया और गाड़ी ले कर उस छोटे से गांव चल पड़ा |
सुमन अवाक बच्चों के उस जज़्बे और बिना छत वाले स्कूल को देखे जा रही थी |

Tuesday, February 10, 2015

पैंतरे--

" अभी बाबूजी का फोन आया था , आने के लिए कह रहे थे "|
" तो बता नहीं दिया उनको कि हम लोग घूमने जा रहे है "|
" कह तो दिया लेकिन वो कह रहे थे कि छोटी बहू ने बुलाया है तो सोचा तुम्हारे यहाँ भी होता चलूँ "|
छोटी बहू ने बुलाया है , कहीं ?
" अच्छा सुनो , उनको फोन करके कह दो कि हम लोग ही आ रहे हैं "|

हवा--

कितना कुछ बदल गया था उनके मोहल्ले में | नुक्कड़ पर खड़े आवारा लड़के कब किसके साथ छेड़खानी कर दें , मारपीट कर दें , कोई भरोसा नहीं रह गया था | पिछले हफ्ते ही उन्होंने टोका था उन लड़कों को तो उन्होंने धमकाते हुए कहा था " इसी तरह फ़टे में टाँग अड़ाओगे तो सोच लेना , आप की भी लड़की है "| कितने सालों तक पूरी ईमानदारी से पढ़ाया था उन्होंने छात्रों को कालेज में | और उनके साथ ही ऐसा सलूक , सोच भी नहीं सकते थे |
पर आज वो बहुत पेशोपेश में पड़ गए थे | इन लड़कों को तो सजा मिलनी ही चाहिए , पर उनका अपना स्वभाव | आख़िरकार लड़कों की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मामला रफा दफा करा दिया | नुक्कड़ तो अब भी वहीं था बस वहां से चलने वाली हवा अब बदल गयी थी |

फ़िक्र--

" हेलो , पापा , आप समय से अपनी दवा खा लेना "| बेटी के शब्द सुनकर उन्होंने सुकून की सांस ली | अभी कल ही उसने फोन नहीं किया तो एकदम परेशान हो गए और वापस आते ही पूरा लेक्चर दे डाला |
आज भी हड़बड़ी में वो भूल ही गयी थी पर एक बुज़ुर्ग को सामने देखते ही याद आ गया | पता तो उसको भी है और पापा को भी है , फोन तो सिर्फ बहाना है ये बताने के लिए कि आज भी वो सकुशल पहुँच गयी है | 

Monday, February 9, 2015

मरहम--

आज पत्नी ने देख लिया था बेटी को उस दलित लड़के के साथ बाजार में | घर आने पर उसने आसमान सर पर उठा लिया | एक बारगी तो वो भी विचलित हो गए लेकिन फिर उनको अपना समय याद आ गया , सिर्फ लड़की की जाति ही तो नीची थी |
अब वक़्त ने शायद उनके अपने घाव को भरने का एक मौका दे दिया था |

Saturday, February 7, 2015

उम्मीदें--

हैं उम्मीदें बाक़ी , तमन्नाओं को यूँ तमाम न कर,
आती है खुशियों की सहर , अब ग़म की शाम न कर,
छाये हों मायूसी के बादल , कितने भी घने फिर भी,
मासूमियत को अपनी , इन अंधेरों के नाम न कर,
बिछड़ते हैं हमसफ़र , गर जिंदगी की राहों पर,
किसी और के सफर में , काँटों का इंतज़ाम न कर,
सुना था कि हक़ीक़त में, रुलाती है दुनियाँ सबको
बाँटता चल सुकूँ , जहाँ को ग़मों का ग़ुलाम न कर,

हैं उम्मीदें बाक़ी , तमन्नाओं को यूँ तमाम न कर,
आती है खुशियों की सहर , अब ग़म की शाम न कर !!

Thursday, February 5, 2015

भाग्य--

बड़ी मुश्किल से उसका चेहरा नज़र आया , खासकर हँसने पर उसके उजले दांत उसके चेहरे का आभास दिला रहे थे | शायद १२-१३ साल की उम्र होगी उसकी , पूरा शरीर कालिख से पुता हुआ लेकिन फुर्ती में बेमिसाल | मिस्त्री काम करते हुए उससे तमाम औज़ार मांग रहा था और वो उसे दौड़ दौड़ के पकड़ा रहा था | न तो चेहरे पर कोई शिकन थी और न ही अपने भाग्य से कोई शिकायत |
गैराज से घर पहुँच कर उसे इच्छा हुई एक कप चाय पीने की | रविवार का दिन और जाड़े की दोपहर , धूप में पड़ी कुर्सी पर सर टिका लिया था उसने | फिर आवाज लगायी " रवि , जरा मम्मी को बोलो एक कप चाय बना दें "| दो तीन बार बोलने पर भी कोई जवाब नहीं आया तो उसे कस कर चिल्लाना पड़ा | कमरे में चल रहा टी वी अब बंद हो गया था लेकिन बेटे का बड़बड़ाना सुनाई देने लगा था | शायद वह अपने भाग्य को कोस रहा था | 

Sunday, February 1, 2015

नजरिया--

चाय का घूंट लेते हुए उनकी नज़र अखबार की एक खबर पर चली गयी " इलाके में एक लड़की की इज़्ज़त लुटी , आरोपी फरार "|
मन ही मन में राहत की सांस लेते हुए उन्होंने बगल में बैठी पत्नी से कहा " अच्छा हुआ , हमारी लड़की नहीं हुई वर्ना हमें भी डर के रहना पड़ता "|
पत्नी ने एक गहरी सांस ली और पिछले दिन का अखबार निकाला , पहले पन्ने पर छपी हुई तस्वीर जिसमें लड़कियां गणतंत्र दिवस के परेड की अगुआई कर रहीं थीं , उनके सामने रख दिया |
चाय उनके हाँथ में ठंडी हो रही थी , वो पत्नी से नज़र नहीं मिला पा रहे थे |

न्याय--

दोपहर में घंटी बजने पर उसने दरवाजा खोला तो वो दरिंदा जबरदस्ती अंदर घुस आया और उसकी अस्मिता को तार तार कर गया | अब शरीर तो जिन्दा बच गया लेकिन आत्मा बुरी तरह लहूलुहान थी | एक ऐसा हादसा जिसके लिए जिम्मेदार वो नहीं थी लेकिन भुगतना उसी को था |
पति ने आने पर जब सँभालने की कोशिश की तो उसे झटक कर वह जोर से रो पड़ी , शायद अब वो किसी पुरुष पर भरोसा नहीं कर पाएगी | एक वहशी की गलती की सज़ा अब पूरे पुरुष समाज को भुगतनी होगी |