" हमहूँ जॉब मेला देखे , हमके भी तैयार करा " , आवाज लगाती छुटकी घर में घुसी | रमिया बर्तन मांज कर किनारे रख रही थी | ख़ुशी के मारे छुटकी टकरा गयी रमिया से , बर्तन टन टन करते लुढक गए |
" हट मुँहझौंसी , गिरा देहलेस बटुली | अच्छा इ बता , तोहरे संघे के जाई मेला देखे ", थोड़ा गुस्सा दिखाते बोली रमिया |
" ललिया भी जाई , हम ओकरे संघे चल जॉब , हमके भी नया फराक पहिने के हौ "| फिर दौड़ के खुद ही लाल फराक ले के आ गयी | नए के नाम पर ले दे के यही एक कपडा था उसके पास जो वो शादी बियाह , मेला , नाच वगैरह में पहनती थी |
" ठीक हौ , जो पहिले मुंह धो के आव , मारे धूर के भूत जइसन हो गयल हौ तोर मुंह " , और छुटकी लोटा से पानी लेकर मुंह धोने बैठ गयी | रमिया ने उसे नयका फराक पहनाया और मुंह पर बचा के रखा हुआ पाउडर भी लगा दिया | छोटकी चप्पल पहिन के निकलने को हुई कि रमिया बोली " पईसा ले जा की ओइसही मेला देखबी " और निकाल कर दो रूपया उसके हाँथ में धर दिया | छोटकी तीर की माफ़िक़ उड़ गयी , रमिया चिल्लाती रह गयी " तनिक ध्यान से , ज्यादा देर मत करिहे मेला में "|
दोनों दोस्त उछलते कूदते मेला देखने चलीं | पूरा रास्ता धुरियाया हुआ था , लोग पैदल , साइकिल से , बैलगाड़ी से और ज्यादा बड़के घर वाले मोटरसाइकिल से जा रहे थे | दूर से ही गुब्बारे दिखाई पड़ने लगे , बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ रही थी और ढोल धमाके की आवाज भी आ रही थी | मेला में पहुँचते ही चारो तरफ भीड़ ही भीड़ नज़र आ रही थी , कहीं चाट के ठेले , कहीं चिनिया बादाम की दूकान | जगह जगह झूले भी लगे हुए थे और बच्चे उस पर झूल रहे थे । उनकी सबसे पसंदीदा चीज थी बुढ़िया का बाल जो कि जगह जगह बिक रही थी |
छोटकी ने ललिया का हाँथ पकड़ कर एक दुकान की तरफ खींचा , बुढ़िया के बाल का दाम पूछा और एक रुपये में दोनों ने खरीद लिया | उसे खाते हुए दोनों मेला का चक्कर लगाने लगीं | एक जगह मिटटी के खिलौने बिक रहे थे , छोटे , रंगीन और मन को मोहने वाले | ललिया की नज़र अटक गयी उस पर , फिर दोनों हांथों से छू कर देखने लगीं | एक छोटा सा खिलौना लिया उन्होंने और फिर बांसुरी की दुकान पर से एक बांसुरी | मेले में एक तरफ डुगडुगी बज़ रही थी , कोई तमाशा हो रहा था वहां | दोनों भागते हुए उधर पहुंची और उचक उचक कर देखने की कोशिश करने लगीं | कुछ दिख नहीं रहा था लेकिन अंदर जाने के लिए टिकट लेना पड़ता | पैसे अब ख़त्म हो रहे थे और वो दोनों भी अब लगभग सारा मेला घूम आई थीं |
तभी छोटकी को ध्यान आया माई रमिया का | चिनिया बादाम बहुत पसंद थे उसको , उसने बचे पैसे का चिनिया बादाम लिया और फिर ललिया का हाथ पकड़ कर चल पड़ी मेले के बाहर | दोनों घर की ओर चल पड़ीं , लोग अभी भी जा रहे थे मेले की ओर | ललिया बांसुरी बजा रही थी , छोटकी चिनिया बादाम संभाले चल रही थी | रास्ते पर धूर गर्दा उड़ रहा था , ढोल ढमाके और बांसुरी की सुरीली आवाज़ अभी भी सुनाई दे रही थी |
" हट मुँहझौंसी , गिरा देहलेस बटुली | अच्छा इ बता , तोहरे संघे के जाई मेला देखे ", थोड़ा गुस्सा दिखाते बोली रमिया |
" ललिया भी जाई , हम ओकरे संघे चल जॉब , हमके भी नया फराक पहिने के हौ "| फिर दौड़ के खुद ही लाल फराक ले के आ गयी | नए के नाम पर ले दे के यही एक कपडा था उसके पास जो वो शादी बियाह , मेला , नाच वगैरह में पहनती थी |
" ठीक हौ , जो पहिले मुंह धो के आव , मारे धूर के भूत जइसन हो गयल हौ तोर मुंह " , और छुटकी लोटा से पानी लेकर मुंह धोने बैठ गयी | रमिया ने उसे नयका फराक पहनाया और मुंह पर बचा के रखा हुआ पाउडर भी लगा दिया | छोटकी चप्पल पहिन के निकलने को हुई कि रमिया बोली " पईसा ले जा की ओइसही मेला देखबी " और निकाल कर दो रूपया उसके हाँथ में धर दिया | छोटकी तीर की माफ़िक़ उड़ गयी , रमिया चिल्लाती रह गयी " तनिक ध्यान से , ज्यादा देर मत करिहे मेला में "|
दोनों दोस्त उछलते कूदते मेला देखने चलीं | पूरा रास्ता धुरियाया हुआ था , लोग पैदल , साइकिल से , बैलगाड़ी से और ज्यादा बड़के घर वाले मोटरसाइकिल से जा रहे थे | दूर से ही गुब्बारे दिखाई पड़ने लगे , बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ रही थी और ढोल धमाके की आवाज भी आ रही थी | मेला में पहुँचते ही चारो तरफ भीड़ ही भीड़ नज़र आ रही थी , कहीं चाट के ठेले , कहीं चिनिया बादाम की दूकान | जगह जगह झूले भी लगे हुए थे और बच्चे उस पर झूल रहे थे । उनकी सबसे पसंदीदा चीज थी बुढ़िया का बाल जो कि जगह जगह बिक रही थी |
छोटकी ने ललिया का हाँथ पकड़ कर एक दुकान की तरफ खींचा , बुढ़िया के बाल का दाम पूछा और एक रुपये में दोनों ने खरीद लिया | उसे खाते हुए दोनों मेला का चक्कर लगाने लगीं | एक जगह मिटटी के खिलौने बिक रहे थे , छोटे , रंगीन और मन को मोहने वाले | ललिया की नज़र अटक गयी उस पर , फिर दोनों हांथों से छू कर देखने लगीं | एक छोटा सा खिलौना लिया उन्होंने और फिर बांसुरी की दुकान पर से एक बांसुरी | मेले में एक तरफ डुगडुगी बज़ रही थी , कोई तमाशा हो रहा था वहां | दोनों भागते हुए उधर पहुंची और उचक उचक कर देखने की कोशिश करने लगीं | कुछ दिख नहीं रहा था लेकिन अंदर जाने के लिए टिकट लेना पड़ता | पैसे अब ख़त्म हो रहे थे और वो दोनों भी अब लगभग सारा मेला घूम आई थीं |
तभी छोटकी को ध्यान आया माई रमिया का | चिनिया बादाम बहुत पसंद थे उसको , उसने बचे पैसे का चिनिया बादाम लिया और फिर ललिया का हाथ पकड़ कर चल पड़ी मेले के बाहर | दोनों घर की ओर चल पड़ीं , लोग अभी भी जा रहे थे मेले की ओर | ललिया बांसुरी बजा रही थी , छोटकी चिनिया बादाम संभाले चल रही थी | रास्ते पर धूर गर्दा उड़ रहा था , ढोल ढमाके और बांसुरी की सुरीली आवाज़ अभी भी सुनाई दे रही थी |
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