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Monday, February 23, 2015

एक दिन--

" जरा अंदर आईये ", बॉस का फोन था इण्टरकॉम पर | उसके लहज़े ने सोचने के लिए कुछ नहीं छोड़ा था | क्या गड़बड़ हो गयी आज फिर , तनाव से भरे हुए अंदर पहुंचे |
" ये क्या रिपोर्ट बनायी है , इतने साल हो गए आपको , कब सीखेंगे | दूसरी रिपोर्ट बना के आज ही दीजिये "|
मुंह लटकाये वापस अपनी मेज पर आ गए | सर भन्नानें लगा था , पता नहीं क्या समझता है अपने आप को | चाय की तेज़ तलब हुई , फिर याद आया कि सुबह से अभी तक चाय नहीं आई |
" गोपी , ज़रा चाय तो लाना ", लेकिन गोपी ने बताया कि कैंटीन वाला तो आया ही नहीं आज |
" बाहर से लाऊँ क्या " गोपी ने पूछा | बेमन से हाँ बोलकर फिर से लग गए रिपोर्ट बनाने में | दुबारा रिपोर्ट दिखाया , बॉस का ईगो अब संतुष्ट हो गया था इसलिए रिपोर्ट पास हो गयी | फाइलें निपटाते शाम के ७ बज गए , शरीर और मन थक कर चूर हो गया था | ऑफिस से बाहर निकले और जैसे ही स्कूटर स्टैंड से उतारा , देखा पहिया पंचर था |
बुरी तरह झल्लाए , और पूरी कायनात को कोसते हुए स्कूटर घसीट कर पंचर वाले के पास पहुंचे और आधे घंटे बाद बनवाकर घर की ओर चल पड़े | इसी झल्लाहट में कब रेड लाइट पार कर गए , पता ही नहीं चला | किसी तरह पुलिस वाले को १०० रु थमाकर जान बचायी और घर पहुंचे | रात के ९ बज गए थे , बिजली भी आज गुल थी |
आज का तो दिन ही ख़राब है सोचते हुए दरवाजे को खटखटाने वाले ही थे कि बेटी ने दरवाज़ा खोला | उनके हाँथ से बैग लेते हुए उसने कहा " चाय पिएंगे पापा , अभी अभी बनायीं है "| उसके चेहरे की तरफ गौर से देखा उन्होंने और थोड़ी देर पहले ही उनके मन में आया ख्याल काफ़ूर हो चुका था |   

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