लखन की लाश घर के अहाते में पड़ी थी , पूरा गाँव जुट गया था | अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं , बस चिंता थी कि अंतिम संस्कार के पैसों का इंतज़ाम कहाँ से होगा | आखिरकार बुज़ुर्ग ताऊ उठे और लखन के नाबालिग बेटे को लेकर महाजन के यहाँ चल दिए | उसने भी क़र्ज़ देने से इंकार कर दिया क्योंकि लखन के नाम न तो कोई खेत था और न ही कोई और जायदाद |
फिर ताऊ ने महाजन को कुछ समझाया और उसने आश्वस्त होकर पैसे दे दिए | श्मशान घाट पर लखन की चिता के साथ उसके बेटे का भविष्य भी आग में स्वाहा हो रहा था | एक और बचपन बंधुआ मज़दूरी की भेंट चढ़ गया था |
फिर ताऊ ने महाजन को कुछ समझाया और उसने आश्वस्त होकर पैसे दे दिए | श्मशान घाट पर लखन की चिता के साथ उसके बेटे का भविष्य भी आग में स्वाहा हो रहा था | एक और बचपन बंधुआ मज़दूरी की भेंट चढ़ गया था |
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