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Sunday, May 31, 2015

उसके हिस्से का उजाला--

" अरे छोटका क माई , देख तो तनिख । काम भर का पत्तल बन गया है न की अउर बनायें "। मुसहराने का दुखिया बहुत खुश था , आखिरकार गाँव में शादी थी और पत्तल उसी के यहाँ से जाती थी ।
" काल तनिक अउर पत्तल बना लेना , कहीं कम न पड़ जाये ।  याद है न पिछले बियाह में घट गया था पत्तल , केतना गाली सुनाये थे हमको अउर पइसो पूरा नहीं मिला था "। दुखिया ने हामी में सर हिलाया , कइसे भुला सकता था उसको ।
अगले दिन भिन्सहरे ही वो लग गया अउर पत्तल बनाने में , इस बार कम न पड़े । छोटका भी लगा हुआ था उसके साथ और दौड़ दौड़ कर सब काम कर रहा था । शाम तक ढेर सारा पत्तल तैयार था अउर दुखिया खुश था कि इस बार कौनो गड़बड़ नहीं होगा । अब इंतज़ार था अगले दिन का जब गाँव में जा कर पत्तल पहुँचाना था ।
अगले दिन पत्तल का गट्ठर बनाकर दुखिया निकल गया गाँव की ओर । छोटका भी साथ था , गाँव में घुसते ही सजावट दिखने लगी उनको । दोनों ख़ुशी ख़ुशी शादी वाले घर पहुंचे और एक किनारे पत्तल रखकर बैठ गए । बस इंतज़ार कि घर का कोई आये और पत्तल ले । तभी एक जीप आके दरवाजे पर रुकी और घर के लड़के ने मज़दूर को आवाज़ लगायी । मज़दूर जीप से तमाम पैकेट निकालने लगा और उसमे से कुछ पैकेट रेडीमेड थालियों के भी थे । दुखिया को चक्कर आ गया , पिछले एक हफ्ते से हाड़तोड़ मेहनत करके उसने पत्तल बनाये थे । इतने में लड़का उसके पास आया और बोला " अरे दुखिया , अब तो पत्तल का ज़रूरत नहीं है , काहें बइठे हो इहाँ "। दुखिया उसके पैर पर गिर गया और बोला " मालिक , आप ही के इहाँ के लिए बनाया है , आप नहीं लोगे तो हम कहाँ ले जायेंगे इसको "।
लड़के ने अनिच्छा से पत्तल रखवा लिया , साथ में ये भी कह दिया कि अगर जरुरत पड़ी तो इस्तेमाल होगा , नहीं तो वापस ले जाना । दुखिया भारी कदमों से वापस चल पड़ा , छोटका पीछे पीछे था । रात में गाँव में शादी की धूम थी , चारो तरफ बत्तियों की चकाचौंध थी लेकिन दुखिया के हिस्से का उजाला शहर के रेडीमेड थालियों ने छीन लिया था ।  

यातना--

" ऊँची जात में पैदा होना तो अभिशाप हो गया | सालों साल रगड़ते रहो , कोई प्रमोशन नहीं और एक ये हैं ?
शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उसके कानों में उतर रहे थे ।
इतिहास एक बार फिर अपने आप को दोहरा रहा था ।

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"पहले तो हमें नौकरी ही नहीं मिलती। अगर मिल भी जाए तो सालों साल रगड़ते रहो, कोई प्रमोशन नहीं। और एक ये हैं।"
"और लो जन्म ऊँची जात में।"
पिघले हुए सीसे की तरह ये शब्द उसके कानों में उतर रहे थे ।

सरनेम--

" भाईसाहब , आपका शुभनाम ?
" जी , राजेश कुमार "।
" और आगे ?
" बस इतना ही , क्यों ?
" मेरा मतलब था कि कोई टाइटल नहीं लगाते आप "।
" जरुरी है क्या ", लहज़ा तल्ख़ हो गया ।
" अब लोगों को पहचाने भी तो कैसे ", अजीब सी नज़रों से देखते हुए वो आगे बढ़ गया ।  

एक कविता--

आज फिर आँधियाँ उठीं दिल में
आज फिर नज़र , आप आये हैं !
खाक़ हो जाते ,ग़र नहीं मिलते
खत्म अब , गर्दिशों के साये हैं!
सोचते रहते जिनको शामो सहर,
ख्वाबों में भी , कब वो आये हैं !
खिल उठी है ये सारी कायनात,
मन ही मन जब वो मुस्कुराएं हैं!
शायद करेंगे ,आज वादे वफ़ा,
फिर से पहलू में आज आये हैं!
आज फिर आँधियाँ उठीं दिल में
आज फिर नज़र , आप आये हैं !!

अर्थ --

एकदम उसके ज़बान पर चढ़ गया था ये शब्द " काना  ", हंसी मज़ाक में किसी को भी बोल देता था वो ।
आज भी वही हुआ जब बचपन का एक मित्र आया और उसके साथ मज़ाक चल रहा था । अचानक किसी बात पर उसने बोल दिया " क्या यार काने हो क्या , इतना भी नहीं दिखता "।
और फिर वो एकदम से खामोश हो गया , दरअसल उसका बचपन का दोस्त वास्तव में काना था । उसे उस शब्द की पीड़ा का एहसास हो गया था ।

Friday, May 29, 2015

पहचान--

अचानक उसके कान में सहकर्मी राज की आवाज़ पड़ी " यार देखो , आज लूले को बहुत जल्दी है "।
बचपन में पोलियो का शिकार हो गया था वो पर ऑफिस के काम में किसी से भी कमतर नहीं था । अपने काम से अपना वज़ूद बनाने की ज़द्दोज़हद और ऐसे सम्बोधन । कभी कभी टूट जाता था वो , लेकिन साथ ही साथ एक नया हौसला भी भर उठता उसमे ।
आज अपने कार्यालय के सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी का पुरस्कार लेते समय उसने जब राज को स्टेज पर से देखा , तो राज खुद को लूला महसूस कर रहा था । अब उसकी पहचान पुख़्ता हो चुकी थी ।

Wednesday, May 27, 2015

नासूर--

" तुमको बुरा नहीं लगता इसमें , बिना अपनी मर्ज़ी के ये सब ", उसने पूछ लिया |
" हाँ , बहुत तक़लीफ़ हुई थी मुझे , जब अस्मत लुटी थी मेरी | और उससे भी ज्यादा तक़लीफ़ तब हुई थी , जब घर वालों ने भी दरवाज़ा बंद कर दिया था "|
उसने अपना चेहरा घुमा लिया , पुराना ज़ख्म फिर उभर आया था |

Monday, May 25, 2015

पहल--

" फिर उठा लाये ये बासी फ़ल , कितनी बार कहा है कि अच्छी दुकान से ही लाया करो , सुनते क्यों नहीं आप "।
पत्नी की बातों से उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। वो ठेले वाली बूढी औरत की संतुष्टि भरी मुस्कान के आगे इन सब बातों को कोई तवज़्ज़ो नहीं देता था।
दरअसल उसकी पत्नी को पता भी नहीं था कि उसकी माँ ने भी उसे इसी तरह ठेला लगाकर पढ़ाया था । वो तो उसकी नौकरी लगने के पहले ही चल बसी थी, पर अब वो किसी और बेटे का भविष्य सँवारने की पहल कर रहा था।

Sunday, May 24, 2015

बदलती गंध--

भागते हुए किसी तरह सबको चढ़ाकर वो ट्रेन में घुसे और अपनी फूली हुई साँसों को क़ाबू में करने की चेष्टा करने लगे पत्नी और बच्चे उस भीड़ में घुस गए थे और बैठने की जगह तलाश रहे थे कहने को तो ये स्लीपर डब्बा था लेकिन पैर रखने की भी जगह नहीं थी| गर्मी के दिन , छुटियों का समय , आरक्षण मिलना लगभग नामुमकिन था इसलिए आज ऐसी यात्रा करनी पड़ रही थी उनको|
थोड़ी देर में सांसें सामान्य हुईं तो अजीब सी दुर्गन्ध महसूस होने लगी , लोगों के पसीने और सांसों की गंध। अब उनको बेचैनी महसूस होने लगी लेकिन कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। फिर ध्यान आया कि परिवार को जगह मिली की नहीं, और थोड़ा अंदर घुसे। पत्नी और बच्चे किसी तरह सीट से टिक कर खड़े थे और उनको देखकर मुस्कुराने की कोशिश करने लगे। पर उनके चेहरे उनकी परेशानियों की चुगली कर रहे थे। बहुत प्रयत्न किया उन्होंने कि लोगों से कुछ फ़ासला रहे और उस गंध से राहत , लेकिन उस भीड़ में ये संभव नहीं था।
अचानक उनके कंधे पर कुछ गीलापन महसूस हुआ , हाथ लगाया तो सचमुच कन्धा गीला था। उन्होंने ऊपर नज़र दौड़ाई तो छोटे बच्चे ऊपर वाली सीट से लघुशंका कर रहे थे। उनकी माँ दूसरे किनारे बैठी हुई इन चीजों से बेखबर नींद में डूबी थी। वो एकदम से चिल्ला उठा और लोगों की नज़र उसकी तरफ घूम गयी। अब लोग उसपर हँसने लगे थे तो उसका गुस्सा भी काफूर हो गया और वो अपना कन्धा झाड़ कर वापस डिब्बे का मुआयना करने लगे। चारो तरफ लोग भेड़ बकरियों की तरह ठुँसे पड़े थे लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बेफिक्र थे। किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था कि किसका जूता किसके शरीर से रगड़ खा रहा था और किसी के खैनी ठोंकने से बाकियों को क्या दिक्कत हो रही थी। एक नज़र उसने अपने कपड़ों पर भी डाली और फिर उसकी हिम्मत दुबारा उनको देखने की नहीं पड़ी , बिलकुल डिब्बे के लोगों की वेशभूषा से मेल खा रहे थे।
कुछ समय बीत चुका था ट्रेन चलते और अभी ६ घंटे का सफर बाक़ी था। वो सोच में डूबे थे कि कैसे कटेगा सफर पत्नी और बच्चों का इस हालत में तभी सीट पर बैठे कुछ लोगों ने उठ कर उनके परिवार को बैठने की जगह दे दी। अब वो लोग उनसे सट कर खड़े थे, उसी तरह पसीने की गंध से लिपटे हुए। उनकी साँसों से भी अजीब सी गंध आ रही थी लेकिन अब वो गंध उनको खटक नहीं रही थी।

पत्नी और बच्चे अब सीट पर बैठे हुए थे, ट्रेन अपनी रफ़्तार में चल रही थी, और वो भी अपने सहयात्री के ऊपर टिक कर खड़े खड़े झपकी ले रहे थे। धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो चला था और वो इस भीड़ का एक हिस्सा बन गए थे|

खोट--

" ज़रा इसको सिल कर बढ़िया पॉलिश कर देना "।
उसने सर हिला कर जूता ले लिया और साहब ने बड़े अनमने मन से वहाँ रखी टूटी चप्पल पैर में डाल ली ।
" लीजिये साहब , जूता ठीक हो गया ", पर उन्होंने जैसे ही पैर निकाला , मोज़ा चप्पल में लगी कील में फंस गया।
" कैसी चप्पल रखते हो तुम लोग ", नाराज़गी दिखाते हुए उन्होंने उसके बताये पैसों का आधा दिया और चल दिए।
वो अपनी टूटी चप्पल की कील दुरुस्त करते हुए सोच रहा था कि छेद मोज़े में हुआ था या नीयत में।
   

Saturday, May 23, 2015

अँधेरा घना था तुम्हारे शहर में
चिराग़े वफ़ा मैं जला चाहता हूँ ,

जो कहते थे हर दम हमें ढूँढ लेंगे
उन्हीं की नज़र से गिला चाहता हूँ ,

न जाने कहाँ से , खबर ये उड़ी थी
मैं काफ़िर हूँ पर बस भला चाहता हूँ ,

बहुत याद आओगे महफ़िल में सबको
वो महफ़िल में हो बस गिला चाहता हूँ !!

दाँव--

गाँव में एक नयी बीमारी का प्रकोप फैला और लगातार कुछ बच्चों की मौत हो गयी । एक तरफ जहाँ लोग भयभीत थे वहीँ दूसरी तरफ ठाकुर के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी ।
अगले दिन उसके कोठी के पास अपनी कोठरी में रहने वाली अकेली विधवा को लोगों के हुजूम ने डायन कह कर गाँव से बाहर खदेड़ दिया ।
बच्चों की मौत का सिलसिला तो नहीं रुका लेकिन वो ज़मीन अब ठाकुर की थी ।

अनुत्तरित प्रश्न --

" काश उसने नहीं देखा होता मलिन बस्ती के बच्चों को , दिमाग जैसे संज्ञाशून्य हो गया था उसका । पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तो बनानी ही थी "। 
अब शाम ढलने के बाद उसी पेड़ के सहारे खड़ी थी , जहाँ वो हर शाम जाती थी । मन में विचारों का अंधड़ चल रहा था । एक वो थी जिसे आज तक़ ज़िन्दगी में किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हुई थी और एक वो बच्चे थे जिनकी ज़िन्दगी अभावों का प्रतीक थी । लौट कर उसने माँ से पूछा भी था कि आखिर ऐसा क्यों है , उन बच्चों का क्या कुसूर है जो वे ऐसी नारकीय जिंदगी बसर कर रहे हैं । माँ ने भी जवाब नहीं दिया । 
उसने एक बार आसमान की ओर देखा , जैसे पूछ रही हो कि ये सब क्यों नहीं दिखता तुम्हें । जवाब तो नहीं मिला लेकिन उसके मन में इन बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा पुख़्ता हो गयी । एक नए सबेरे का उदय हो रहा था उसके मन में ।

Friday, May 22, 2015

बड़प्पन--

" मैंने तो बिना पैसे दिए ही शॉपिंग कर ली | वो बाजार में एक छोटी सी किराने की दुकान है न , आज वहां चली गयी थी | सामान लेने के बाद उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया, बोला कि वो आपको जानता है और इसलिए पैसे नहीं लेगा "|
वो सोच में पड़ गया , अपने गाँव का छोटी जात का दुकानदार , जिसकी बेटी की शादी में १०१ रुपये देकर उसने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी |
आज वो अपने आप को बहुत छोटा महसूस कर रहा था |

Wednesday, May 20, 2015

नयी परम्परा--

कुछ दिन पहले ही उसके पिताजी की अचानक मौत हो गयी और अमेरिका में लगी नयी नौकरी की दिक्कतों के चलते वो कश्मकश में था कि कैसे गाँव पहुंचे | लेकिन फ़ोन पर माँ ने उसकी उलझन दूर कर दी |
और तेरहवीं के दिन उसके यहाँ सारे समाज को भोज नहीं दिया गया , बल्कि हस्पताल की नींव डाली गयी | पिताजी की अंतिम इच्छा को पूरा करते हुए एक नए परंपरा की शुरुवात हो गयी थी |

अपने अपने फ़र्ज़--

" पापा , आपने अगर मुझे बेटी माना है तो मुझे इस अधिकार से कभी वंचित मत कीजियेगा ", विदा होते समय वो उनसे लिपट कर रो पड़ी थी और वहाँ मौज़ूद लोगों की आँखें नम हो गयी थीं । 
वो अपने एकलौते पुत्र को खो बैठे थे जिसकी नयी नयी शादी हुई थी , और हर उस आवाज़ के सामने चट्टान बन कर खड़े हो गए थे जो उनकी बहू को इस हादसे के लिए दोषी ठहरा रहे थे । फिर उन्होंने बहू को धीरे धीरे सँभाला और उसे अपनी बेटी का दर्ज़ा दे दिया । उसके अपने माता पिता भी संतुष्ट थे कि वो अब उस घर की बेटी बन गयी थी । 
आजीवन उनका ध्यान रखने के बाद उनकी अर्थी को अपना कन्धा देकर वो बेटे का फ़र्ज़ भी निभा गयी ।
ग़ज़ल हो या गीत , यारों फ़र्क़ क्या है,
आजकल किसको बताएं , फ़र्ज़ क्या है,
ना रहे दुनियां में अब ,दुःख बाँटने वाले,
ना रहे अब लोग , जो पूछें मर्ज़ क्या है,
चल पड़े हैं राह में , दिखती नहीं मंज़िल,
मिल गए गर दोस्त, फिर तो हर्ज़ क्या है,
खुद की ही चिंता , ज़माने भर में सबको,
जब लूट लें अपनों को , लेना क़र्ज़ क्या है,
ग़ज़ल हो या गीत , यारों फ़र्क़ क्या है,
आजकल किसको बताएं , फ़र्ज़ क्या है !! 

Tuesday, May 19, 2015

ज़िन्दगी--

कतरा कतरा ज़िन्दगी 
सिसकियाँ भरती रही 
मौत अपने जीत पर 
फिर जश्न मनाने लगी 
किसी ने भी नहीं समझा
दर्द ऐसी ज़िन्दगी का
जब किसी से नहीं कर सके
फ़रियाद अपनी मौत का
क्या ऐसा जीवन ही निहित है
अगर हाँ तो फिर क्यूँ जिए कोई
क्यूँ न बाहें पसार स्वागत करे
उस इच्छा का जिसे लोग कुछ भी कहें
लेकिन जो छुटकारा तो दिला दे
ऐसी बेमतलब लाचार ज़िन्दगी से !!

Sunday, May 17, 2015

ज़रूरत--

आज नयी बहू ने नौकर को बड़ी बहू के कमरे से रात में निकलते देख लिया । जैसे ही अगली सुबह उसने सास से इसका जिक्र किया तो सास को पहले तो कुछ नहीं सुझा , फिर वो बड़ी बहू के चरित्र पर कीचड़ उछालने लगी ।
बात बड़ी बहू के कान में पड़ी और वो दनदनाते हुए आ गयी ।
" मेरे चरित्र पर ऊँगली उछालने से पहले अपने बेटे को भी देख लो , कई कई महीने घर नहीं आता है और वहाँ क्या क्या करता है , ये भी बता दो इसको "।
छोटी बहू स्तब्ध , कुछ कहे उससे पहले ही फिर उसके कानों में आवाज़ पड़ी " सुन छोटी , जब शरीर को ज़रूरत होती है तो सही गलत कुछ नहीं होता "।
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आज नयी बहू ने नौकर को बड़ी बहू के कमरे से रात में निकलते देख लिया । रात आँखों आँखों में बीत गयी , किससे क्या पूछे | अगली सुबह बड़ी बहू ने उसके चेहरे को पढ़ लिया और उसे अपने कमरे में बुलाया ।
" मेरे चरित्र के बारे में कुछ धारणा बनाने से पहले मेरे पति को भी जान लो , कई कई महीने घर नहीं आता है और वहाँ क्या क्या करता है , ये सबको पता है "।
छोटी बहू स्तब्ध , कुछ कहे उससे पहले ही वो फिर बोली " और हाँ , जब शरीर को ज़रूरत होती है तो सही गलत कुछ नहीं होता "।

ग्राहक सेवा--

" साहब , पइसा जमा करना है , पर्ची नाहीं दिखत है | मिल ज़ात त बड़ा मेहरबानी होत ", डरते डरते उसने कहा |
" अब केतना पर्ची छपवायें हम लोग , पता नाहीं कहा चुरा ले जाते हैं सब ", बड़बड़ाते और घूरते हुए हरिराम स्टेशनरी रूम में घुसे | थोड़ी देर बाद जमा पर्ची लाकर उसके सामने पटक दिया और बोले " बस एक ही लेना , कुछ भी नहीं छोड़ते लोग यहाँ "|
पूरे गाँव को पता था , हरिराम के व्यवहार के बारे में लेकिन सब झेल जाते थे | एक ही तो शाखा थी बैंक की वहां और सबको वहीँ जाना होता था | एकाध ने मैनेजर से शिकायत की लेकिन उलटे वो उन्ही पर भड़क गया | उसे पता था की वो तो कम ही समय रहता है बैंक में , ज्यादातर काम तो हरिराम ही निपटा देता है | शायद उसमे हिम्मत भी नहीं थी हरिराम को बोलने की |
खैर उसने पर्ची भरी और जमा करने काउंटर पर पहुंचा | रोकड़िया महोदय नदारद थे और उसकी हिम्मत नहीं थी कि किसी से पूछे | पहले से खड़े कुछ लोगों ने बताया कि आधे घंटे से गायब हैं महोदय | खैर थोड़ी देर बाद वो पधारे और सबसे आगे खड़े व्यक्ति की पर्ची लेकर उसे डांटने लगे " पर्ची भी ठीक से नहीं भरते तुम लोग और चले आते हो हमारा सरदर्द बढ़ाने "| जैसे तैसे उसका नंबर आया , पर्ची पकड़ाते समय उसका दिल बुरी तरह घबराया हुआ था | रोकड़िया ने एक बार जमा पर्ची देखी और वापस फेंकते हुए बोला " अरे न तो शाखा का नाम लिखा और न हस्ताक्षर किया , अब क्या ये भी हम ही करेंगे "| उसने पर्ची पर शाखा का नाम लिखा और नीचे हस्ताक्षर किया और डरते हुए फिर पर्ची रोकड़िया की तरफ बढ़ाई |
एक बार फिर रोकड़िया महोदय गायब थे , शायद पान खाने का समय हो गया था उनका | उसके सामने इंतज़ार करने के सिवा कोई चारा नहीं था | वापस आने पर एक बार नोट हाँथ में लेकर देखते और एक बार उसको | उसका दिल तो ऐसे धड़क रहा था जैसे उसने खुद नक़ली नोट छाप के दिया हो , लेकिन शुक्र था कि रोकड़िया महोदय ने बिना नुक़्ता चीनी किये पैसे को ले लिया और आधी पर्ची फाड़ के उनको पकड़ा दिया | अब वो वापस मुड़ा और पासबुक में इंट्री कराने के लिए दूसरे काउंटर पर पहुंचा |
काउंटर बंद था , कोई नहीं था वहां और हरिराम ने दूर से ही चिल्ला कर बताया " कल आना , आज नहीं होगी इंट्री ", और वो थके क़दमों से बैंक के बाहर निकल गया | बैंक के गेट पर लिखा स्लोगन " हम ग्राहकों से हैं , ग्राहक हमसे नहीं है " उसका मज़ाक उड़ा रहा था |

मर्म--

" ये नदी का किनारा , ये शीतल हवा , किसी और दुनियाँ में आ गए हों जैसे " , राहुल बोलते बोलते खो सा गया |
कृति को भी लग रहा था कि कितना सुकून है यहाँ , महानगर के भागमभाग , प्रदूषण और शोर से दूर , एक अलग ही दुनियाँ |
" उस वीतरागी को देखो , अपने स्वान के साथ इन सब से परे कितने मज़े में चला जा रहा है | काश हम भी ऐसी ज़िन्दगी जी पाते "|
" जिम्मेदारियों से भाग कर सुकून की तलाश पलायन कहलाता है कृति | हम तो इस समाज में रह कर परिवार , समाज और इंसानियत के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभा कर ही सुकून पा सकते हैं "|
कृति के मन में जैसे असंख्य कपोत उड़ने लगे , उसे जीवन का मर्म समझ में आ गया |

मंज़िल--

" अब तो ठहर जाओ बाबा , यहाँ विश्राम कर लो | आखिर कब तक तुम्हारी यात्रा अनवरत जारी रहेगी ", घाट ने आवाज़ लगायी सन्यासी को |
" लेकिन मुझे तो मंज़िल की तलाश है , वो दूर उस पार शायद मेरी मंज़िल है | बस ये नदी ही तो पार करनी है ", बाबा के क़दमों ने रुकने से इंकार कर दिया | 
उनके सफर का साथी श्वान भी बिना रुके उनके साथ चल रहा था और घाट पर बैठे कबूतरों ने भी आसमान में उड़ान भर कर उनका मार्ग प्रशस्त कर दिया | मंज़िल पाने का हौसला अब कामयाबी में बदल रहा था |

Wednesday, May 13, 2015

भविष्य--

कितना कुछ सहा था उसने अपने जीवन में , अब बस एक ही जिद थी कि अपने बच्चे को शिक्षा की रोशनी से वंचित नहीं रखेगी |
आज लालटेन की मद्धम रोशनी उसे एहसास दिला रही थी कि अँधेरा कितना भी घना क्यूँ न हो , रोशनी की एक किरण ही काफी होती है उसे दूर करने के लिए | अब वो उस रोशनी में अपने बच्चे का उज्जवल भविष्य देख रही थी |

परिमार्जन--

" मम्मी " सुनते ही रत्ना झट से जग गयी और बीमार बेटी का सर सहलाने लगी | शाम से उसे बुखार था और रह रह कर उसे खांसी भी आ रही थी | दवा ला दी थी उसने और वो भी उसका पूरा ध्यान रख रहा था | धीरे धीरे बेटी नींद की आगोश में समा गयी और रत्ना भी उसका हाँथ पकड़े सो गयी |
उसकी आँखों से नींद गायब थी , अचानक उसके कदम घर के किनारे वाले कमरे की ओर बढ़ गए | माँ के खांसने की आवाज़ सुनाई दे रही थी और वो उसे दबाने की भरपूर कोशिश कर रही थी | उसे रत्ना का चिल्लाना याद आ गया कि इनकी खांसी के चलते उसे नींद नहीं आती है | धीरे से उसने खांसी का सिरप उठाया और माँ को उठाकर पिलाने लगा | पता नहीं कब वो माँ का हाथ पकड़े पकड़े सो गया , शायद अपनी गलती सुधारने की संतुष्टि मिल गयी थी |

विसंगति--

" अरे रामू , तुम वापस कब आये , फिर से घर का काम करोगे "? 
" क्या करता साहब , बेटा तो अपनी नौकरी पर चला जाता था और रात देर से लौटता था "।
" तो क्या , आराम से घर पर रहते , बहू और बच्चों के साथ समय बिताते "। 
" अब क्या कहूँ साहब , आप कम से कम हमें नौकरों जैसा तो समझते हो , पर बहू तो .. "?