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Sunday, February 16, 2014

हैप्पी न्यू इयर

हैप्पी न्यू इयर , नया साल मुबारक | आतिशबाजियां छुड़ाते और एक दूसरे को मिठाई खिलाते हुए लोग जोर जोर से चिल्ला रहे थे और एक दूसरे को नया साल मंगलमय होने कि शुभकामना भी दे रहे थे |
उसी जगह भयानक ठण्ड में एक झोपडी में फटे हुए कम्बल में गुड़मुड़ पड़ा हुआ मजदुर सोच रहा था कि अपना तो पुराना साल भी ऐसा ही था और इस साल भी शायद कुछ न बदले | अपना अच्छा साल कब आयेगा |

प्रवचन

"सब मोह माया है | अपना क्या है , क्या साथ जायेगा , धन दौलत सब यहीं रह जायेगा" | दूरदर्शन पर सुबह सुबह ये प्रवचन सुनकर मन बड़ा प्रसन्न हुआ और वो सोचने लगा कि सच में क्या रखा है इन चीजो में |
अचानक मोबाइल पर आये मेसेज ने ध्यान भंग किया कि आपके खाते से १५००० रु निकाले गए हैं | एटीएम सुपुत्र के पास था और वह हॉस्टल में रहता था | टी वी अब बंद हो गया था और पुत्र फ़ोन पर लताड़ा जा रहा था " पैसे की कीमत करना सीखो , क्या क्या कर्म ( कुकर्म ? ) करना पड़ता है इसे कमाने में , तुम्हे क्या पता "| 

हीरो

आप भी ना , फ़िल्म देख कर भी कोई रोता है भला | पत्नी मुझे समझा रही थी , ये अलग बात थी कि उसकी आँखे भी बह रही थी | बहुत संवेदनशील फ़िल्म थी और अपनी भावनाओ पे काबू रखना मुश्किल हो गया था | घर पहुचने पर बेटी ने जैसे ही पूछा कि फ़िल्म कैसी थी , उसकी माँ बोल पड़ी "अरे तुम्हारे पापा तो रो पड़े फ़िल्म देखकर "| मैं उस समय ये कतई जाहिर नहीं होने देना चाहता था कि मैं फ़िल्म देख कर रो रहा था , क्योंकि मैं तो हीरो था उसकी नजर में| लेकिन जब उसने मुझे नजरें इधर उधर छिपाते देखा तो वो कहने लगी " अपनी भावनाओ को जाहिर करने में कैसी हिचक पापा , उन्हें छिपाने में हिचक होनी चाहिए | आप तो मेरे हीरो हैं और हमेशा रहेंगे" | अब मेरी आँखों में फिर से आंसू थे | 

बेटियाँ—


" ये क्या है पापा, आज फिर आप भूखे रह गए पूरे दिन, इतनी भी क्या परेशानियां है ऑफिस में कि खाना भी नहीं खा सकते"|
" पर बेटी, तुम्हे कैसे पता चला कि मैंने खाना नहीं खाया", अपने बैग की ओर देखते हुए मैंने कहा|
" मैंने तो अभी बैग से अपना टिफ़िन निकाला भी नहीं"
" पापा, आपका चेहरा देखते ही मुझे सब पता चल जाता है, खैर चलिए, मैं गरमा गरम नाश्ता लाती हूँ आपके लिए"|
मुझे एकदम से अपनी माँ याद आ गयी| उसे भी मेरा चेहरा देख के सब पता चल जाता था|
बेटी मेरे लिए नाश्ता ला रही थी और मैं सोच रहा था कि कितनी जल्दी बेटियाँ, माँ की जगह ले लेती हैं|

जीवनदान--

"पागल हो गए हैं आप , आप का दिमाग तो नहीं फिर गया है | आपने भी तो अपील की थी पेपर में , कौन आया था आपके बेटे को किडनी देने" | पत्नी चिल्ला रही थी और पेपर उसके हाथ से छीनने की कोशिश कर रही थी | आज पेपर में एक अपील छपी थी कि किसी नौजवान की किडनी ख़राब हो गयी थी और उसे किडनी ट्रांसप्लांट की जरुरत थी | उसने तय कर लिया था की अगर उसकी किडनी उस नौजवान के किडनी से मैच हो गयी तो वो जरुर अपनी एक किडनी डोनेट करेगा | अपने बेटे को तो वो दोनों चाह कर भी डोनेट नहीं कर पाये थे क्योंकि उनकी किडनी मैच ही नहीं हुई थी | फिर उसने पत्नी को सम्भाला और कहा " हमारे बेटे के समय भी कोई और इसी तरह डोनेट करना चाह रहा होगा लेकिन उसके घर वालों ने मना कर दिया होगा | अगर उसने अपने घर वालों की बात नहीं सुनी होती तो शायद हमारा बेटा आज जिन्दा होता "| इसलिए आज मुझे मत रोको और किसी और बेटे की जिंदगी बचा लेने दो | इतना कह कर वह जाने लगा और जाते हुए उसे अपनी आँखों में अपने बेटे का हँसता हुआ चेहरा नजर आ रहा था | 

वृद्धाश्रम

आज आप इधर कैसे ? शर्माजी के पूछते ही मेरे मन का बाँध टूट गया | क्या बताऊँ , एकलौता बेटा है , कितनी मन्नते मानी थी तब जाके पैदा हुआ था | फिर लगातार बीमार रहता था तो कितनी ही रातें हम दोनों जागते हुए बिताते थे | किसी चीज कि कमी नहीं छोड़ी इसके परवरिश में | खैर इन सब बातों का कोई दुःख नहीं है , शायद सभी माँ बाप अपनी औलाद को ऐसे ही पालते हैं | लेकिन कल जब बेटे कि अनुपस्थिति में एक फ़ोन आया और उधर से वृद्धाश्रम का मैनेजर बोला कि पैसा मिल गया है , अब आप ला सकते हैं उन लोगों को , तो लगा कि शायद इससे अच्छा औलाद ही नहीं हुई होती | 
लेकिन शर्माजी का जवाब सुनकर मन का बोझ उतर सा गया " कम से कम आप लोगो को वहाँ पर अपने जैसे लोग मिलेंगे जिनके साथ समय बिता सकते हैं , सुख दुःख साझा कर सकते हैं | यहाँ तो हम इनसे तो दूर , आपस में भी बात करते हैं तो इनको बुरा लगता है "| 

रामराज्य

देखा , सभी अधर्मियों को सबक सिखा दिया | अब एक भव्य मंदिर बनेगा और सारे पाप धुल जायेंगे | कुछ लोग पूरे एरिया में घूम घूम कर ये खबर सुना रहे थे |
और उधर कोने में बैठा लंगड़ा भिखारी सोच रहा था क्या सचमुच ऐसा रामराज्य आएगा जब उन जैसो को भी सुकून की रोटी मिल सकेगी | क्योंकि कल इन्ही लोगों ने उसे फटकारते हुए भगा दिया था |

डायरी

उसकी डायरी के फटे हुए पन्ने जैसे उसका मजाक उड़ा रहे थे | कॉलेज के दिनों में तमाम रातों की तन्हाईयों के अनाम किस्से उसमे दर्ज थे और समय समय पर वो उनको फिर से जी लेता था | उन्ही पन्नो में से एक पन्ने पर गुलाब के फूलों कि खुश्बू भी समायी थी क्योंकि इस पन्ने पर उसके जिंदगी का सबसे खूबसूरत लम्हा दर्ज था | उस दिन पहली बार उसने उस लड़की को देखा था और रात कि तन्हाईयों में उसका जिक्र डायरी के पन्नो में किया था | अगले कई सालों तक वो पन्ना उसे बार बार पलटने पर मजबूर करता रहा और वो उन सूखे गुलाब कि पंखुड़ियों में उसकी खुश्बू महसूस करता रहा | आखिर कॉलेज ख़त्म हुआ और वो उसको वो सब नहीं कह पाया , जिसको इतने सालों तक वह डायरी पे लिखता रहा था | फिर भी उम्मीद थी कि कभी कह पायेगा लेकिन जब बाजार में उसे चमकती साडी में किसी और के साथ जाते देखा तो डायरी के पन्नो को सम्भालना उसे बहुत कठिन लगने लगा |

सामाजिक

देर शाम घर पहुचते ही पत्नी ने बताया कि पड़ोसी क्लर्क चौहानजी के बच्चे का जन्मदिन है | मैंने सोचा कि देर तो हो गयी है लेकिन हो ही लेते हैं और चला गया | वहाँ पर चौबेजी को देख कर सोच में पड़ गया कि आज ये अपने मुहल्ले के इस कार्यक्रम में कैसे आ गए | इतने बड़े अफसर हैं , इन्हे तो शादी वगैरह जैसे बड़े कार्यक्रमों में भी आना अपनी तौहीन लगता था | मैं कुछ निष्कर्ष निकाल पाता कि अचानक एक आवाज कानों में पड़ी " ४ महीने बाद ही रिटायरमेंट है इसलिए अब सामाजिक बन रहे हैं "

फैसला

रात के २ बज रहे थे लेकिन आँखों से नींद गायब थी| क्या उसका फैसला सही था, पापा को तकलीफ तो नहीं होगी इस फैसले से , यही द्वन्द चल रहा था दिमाग में|लेकिन पापा ने हमेशा कहा कि न तो गलत करो और न ही गलत बर्दास्त करो,फिर आज का फैसला??अचानक कंधे पर पापा ने हाथ रखा और कहा " सो जाओ बेटा , तुम्हारे फैसले पर मुझे फक्र है| तुम्हारा खुद का भी एक वजूद है , इसे कभी मत भूलना "| 
उसके जेहन में पुरानी बातें घूमने लगीं |एक महीने पहले इंगेजमेंट हुई थी |निखिल दुबई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था|घर में सभी खुश , इतना अच्छा रिश्ता , वो भी बिना दहेज़ का| लेकिन आज निखिल ने फिर फ़ोन किया कि “शादी के बाद तो तुमको मेरे साथ दुबई ही रहना है , फिर क्यों परेशान हो अपने उस छोटे से स्कूल के लिए”| उसने भी कुछ सोचकर फिर कहा “तुम क्यों नहीं समझते , ये सिर्फ स्कूल ही नहीं , मेरी खुद की पहचान है”|इतना सुनते ही वो उफन पड़ा और बोला , तुम लड़कियाँ भी न, थोडा पढ़ क्या लेती हो , खुद को पता नहीं ??|खैर स्कूल तो तुम्हे छोड़ना ही पड़ेगा|
“निखिल मैं अपना वजूद खोकर, शायद बहुत खुश रहकर भी, जी नहीं पाऊँगी,और अगर तुम मेरी भावनाओं को सम्मान नहीं दे सकते तो कैसे ये उम्मीद करते हो कि मैं ही तुम्हे समझूँ ”|फिर शादी के लिए ना कहते हुए फ़ोन रख दिया| 

कामचोर

"कामचोर तू यहाँ छुप के बैठा है , काम करने के नाम पर बुखार आ जाता है तुम लोगो को"| और ये कहते हुए उन लोगो ने घसीटते हुए हरई को झोपडी से बाहर निकला और दुबारा काम पे लगा दिया | हरई की जोरू दूर से देख रही थी लेकिन उसमे हिम्मत नहीं थी कि वो कुछ कह सके | दरअसल कल रात से ही हरई को बुखार था और दवा के नाम पर एक गोली दे दी थी मालिक ने | सुबह किसी तरह हिम्मत जुटा कर वो ईंट पाथने के लिए गया लेकिन बुखार से उसकी हिम्मत छूट गयी और वो वापस झोपड़ी में आकर लेट गया | फिर क्या था , मालिक के आदमियों ने उसे पीटना शुरू कर दिया | उसकी जोरू ने रोते हुए उसे बचाने कि कोशिश की , लेकिन बुखार से टूटा शरीर बर्दास्त नहीं कर पाया और वो बेहोश हो गया | हरई कि साँसे रुकने लगी तो आनन फानन में मालिक ने उसे अस्पताल में भर्ती करवाया लेकिन उसने दम तोड़ दिया | फिर मामले को रफा दफा करवाकर चुपचाप उसका अंतिम संस्कार भी करवा दिया |
भट्ठे पे उसकी जोरू रो रो के सबसे पूछ रही थी कि उसका मरद कहाँ है | वहीँ दूर से कही बज रहे राष्ट्रगान की आवाज आ रही थी "जन गन मन अधिनायक जयहे" लेकिन भट्ठे पे सारे खामोश थे क्योंकि सभी वहाँ बंधुवा मजदूर थे |

जमीर

किसी भी कीमत पर नीचा दिखाना था अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी को , जो उससे बहुत आगे बढ़ गया था | फिर उसके दिमाग में ये ख्याल आया कि क्यों न उसको ब्लैकमेल किया जाये | बस वो चला गया उस औरत के पास और अपनी योजना बतायी , साथ में ढेरो पैसो का प्रलोभन भी | लेकिन जवाब सुनकर स्तब्ध रह गया ' मज़बूरी में हम लोग शरीर बेचते हैं साहब , जमीर नहीं " | 

खुशहाली

अरे भाई , कहा जात हउवा सब जने | कौनो मेला लगल हौ का | दुक्खू काका हैरानी में पूछत रहलन सबसे | लेकिन केहु के पास एतना समय नाही रहल की काका के बता सके | फिर अचानक रजना देखा गयल ओनके | रजना भी हाली हाली भागत रहल , लेकिन काका क बात सुन के रुक गयल | 
अरे काका , तूं नाहीं सुनला का ! कौनो आम आदमी क सभा हौ अउर सब लोग कहत हउअन की ओकरे पास सब मुस्किलन क हल हौ | 
अच्छा , तूं एक बात ओनसे पूछ लीहा की गांव से सब लोग शहर काहे भागत हउअन , इहाँ कब खुशहाली आई | कौनो रस्ता अइसन बनवा दें जौन शहर से सबके गांव ले आवे | काका क बात सुन के रजना क कदम रुक गईल |
" पहली बार भोजपुरी में कुछ लिखा है " 

भेलेन्टाइन डे

रात को सोने के लिए जैसे ही फूलचन बिस्तर पर गया , उसकी पत्नी ने शरमाते हुए पूछा " क्योंजी , ई भेलेन्टाइन डे क्या होता है , कौनो नया त्यौहार है का | फूलचन अचकचा गया इस सवाल से और बोला " तुमको ई सब कहा से पता चला | इतना साल हो गया बियाह हुए , पहले तो नाही पूछा ,आज काहे पूछ रही हो " | उसकी पत्नी ने फिर शरमाते हुए कहा "अरे शाम को किसनवा का लड़का अपनी मेहरारू से कह रहा था कि भेलेन्टाइन डे पर वो उसके लिए नयी साडी लाएगा" |
फूलचन ने गहरी सांस ली और बोला " अरे वैलेंटाइन डे प्रेम का त्यौहार है ,जो इस देश में पहले नही मनता था, अब मनने लगा है” |फिर वो सोचने लगा कि इस दुनिया में सब त्यौहार उन लोगों के लिए हैं जिनका पेट भरा हो , खाली पेट कौन त्यौहार मनाता है |वैसे भी गरीबों के लिए तो प्यार करने पर भी रोक है, उनके लिए जैसे सब दिन वैसे ही वैलेंटाइन डे |और उसकी पत्नी सोच रही थी कि पहिले तो पूरा बसंत ही प्रेम का त्यौहार होता था , अब बस एक दिन |