"कामचोर तू यहाँ छुप के बैठा है , काम करने के नाम पर बुखार आ जाता है तुम लोगो को"| और ये कहते हुए उन लोगो ने घसीटते हुए हरई को झोपडी से बाहर निकला और दुबारा काम पे लगा दिया | हरई की जोरू दूर से देख रही थी लेकिन उसमे हिम्मत नहीं थी कि वो कुछ कह सके | दरअसल कल रात से ही हरई को बुखार था और दवा के नाम पर एक गोली दे दी थी मालिक ने | सुबह किसी तरह हिम्मत जुटा कर वो ईंट पाथने के लिए गया लेकिन बुखार से उसकी हिम्मत छूट गयी और वो वापस झोपड़ी में आकर लेट गया | फिर क्या था , मालिक के आदमियों ने उसे पीटना शुरू कर दिया | उसकी जोरू ने रोते हुए उसे बचाने कि कोशिश की , लेकिन बुखार से टूटा शरीर बर्दास्त नहीं कर पाया और वो बेहोश हो गया | हरई कि साँसे रुकने लगी तो आनन फानन में मालिक ने उसे अस्पताल में भर्ती करवाया लेकिन उसने दम तोड़ दिया | फिर मामले को रफा दफा करवाकर चुपचाप उसका अंतिम संस्कार भी करवा दिया |
भट्ठे पे उसकी जोरू रो रो के सबसे पूछ रही थी कि उसका मरद कहाँ है | वहीँ दूर से कही बज रहे राष्ट्रगान की आवाज आ रही थी "जन गन मन अधिनायक जयहे" लेकिन भट्ठे पे सारे खामोश थे क्योंकि सभी वहाँ बंधुवा मजदूर थे |
भट्ठे पे उसकी जोरू रो रो के सबसे पूछ रही थी कि उसका मरद कहाँ है | वहीँ दूर से कही बज रहे राष्ट्रगान की आवाज आ रही थी "जन गन मन अधिनायक जयहे" लेकिन भट्ठे पे सारे खामोश थे क्योंकि सभी वहाँ बंधुवा मजदूर थे |
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