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Sunday, February 16, 2014

फैसला

रात के २ बज रहे थे लेकिन आँखों से नींद गायब थी| क्या उसका फैसला सही था, पापा को तकलीफ तो नहीं होगी इस फैसले से , यही द्वन्द चल रहा था दिमाग में|लेकिन पापा ने हमेशा कहा कि न तो गलत करो और न ही गलत बर्दास्त करो,फिर आज का फैसला??अचानक कंधे पर पापा ने हाथ रखा और कहा " सो जाओ बेटा , तुम्हारे फैसले पर मुझे फक्र है| तुम्हारा खुद का भी एक वजूद है , इसे कभी मत भूलना "| 
उसके जेहन में पुरानी बातें घूमने लगीं |एक महीने पहले इंगेजमेंट हुई थी |निखिल दुबई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था|घर में सभी खुश , इतना अच्छा रिश्ता , वो भी बिना दहेज़ का| लेकिन आज निखिल ने फिर फ़ोन किया कि “शादी के बाद तो तुमको मेरे साथ दुबई ही रहना है , फिर क्यों परेशान हो अपने उस छोटे से स्कूल के लिए”| उसने भी कुछ सोचकर फिर कहा “तुम क्यों नहीं समझते , ये सिर्फ स्कूल ही नहीं , मेरी खुद की पहचान है”|इतना सुनते ही वो उफन पड़ा और बोला , तुम लड़कियाँ भी न, थोडा पढ़ क्या लेती हो , खुद को पता नहीं ??|खैर स्कूल तो तुम्हे छोड़ना ही पड़ेगा|
“निखिल मैं अपना वजूद खोकर, शायद बहुत खुश रहकर भी, जी नहीं पाऊँगी,और अगर तुम मेरी भावनाओं को सम्मान नहीं दे सकते तो कैसे ये उम्मीद करते हो कि मैं ही तुम्हे समझूँ ”|फिर शादी के लिए ना कहते हुए फ़ोन रख दिया| 

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