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Sunday, February 16, 2014

वृद्धाश्रम

आज आप इधर कैसे ? शर्माजी के पूछते ही मेरे मन का बाँध टूट गया | क्या बताऊँ , एकलौता बेटा है , कितनी मन्नते मानी थी तब जाके पैदा हुआ था | फिर लगातार बीमार रहता था तो कितनी ही रातें हम दोनों जागते हुए बिताते थे | किसी चीज कि कमी नहीं छोड़ी इसके परवरिश में | खैर इन सब बातों का कोई दुःख नहीं है , शायद सभी माँ बाप अपनी औलाद को ऐसे ही पालते हैं | लेकिन कल जब बेटे कि अनुपस्थिति में एक फ़ोन आया और उधर से वृद्धाश्रम का मैनेजर बोला कि पैसा मिल गया है , अब आप ला सकते हैं उन लोगों को , तो लगा कि शायद इससे अच्छा औलाद ही नहीं हुई होती | 
लेकिन शर्माजी का जवाब सुनकर मन का बोझ उतर सा गया " कम से कम आप लोगो को वहाँ पर अपने जैसे लोग मिलेंगे जिनके साथ समय बिता सकते हैं , सुख दुःख साझा कर सकते हैं | यहाँ तो हम इनसे तो दूर , आपस में भी बात करते हैं तो इनको बुरा लगता है "| 

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