Translate

Thursday, July 31, 2014

हरियाली

"कितनी अच्छी लगती है न ये हरी भरी घाँस , ये हरियाली"। बच्चे ने कहा तो पिता बीते समय में खो गया । 
कभी उसने भी अपने पिता से यही बात कही थी तो पिता ने जवाब दिया था " ये पर्यावरण ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी है , इसे सँभाल कर रखना । आने वाली पीढ़ियों को अगर हम एक हरा भरा वातावरण दे सकें तो उससे बड़ी कोई भेंट नहीं दे सकते उन्हें " । 
आज वो अपने बच्चे को भी यही शिक्षा दे रहा था ।

Tuesday, July 29, 2014

श्राद्ध--

" अरे पनीर की सब्ज़ी कहा है, जल्दी लाओ, यहाँ ख़त्म हो गयी", बड़े भैया ने आवाज़ लगायी और आगे बढ़ गए| कई पंगतों में लोग बैठ कर श्राद्ध का भोजन कर रहे थे, काफी गहमागहमी थी दरवाजे पर| सारे रिश्तेदार और अगल बगल के गांव से भी लोग खाने आये हुए थे| थोड़ी दूर ज़मीन पर कुछ और लोग भी बैठे थे जो हर पंगत के उठने के बाद पत्तल वगैरह बटोरते, उसे ले जाकर किनारे रख देते और जो कुछ भी खाने लायक बचा होता था, वो सब अपने बर्तनों में रख लेते थे|
खटिया पर लेटे हुए बाबूजी सब देख रहे थे, उनके दिमाग में पिछले कुछ सालों की घटनाएँ घूमने लगीं| माँ एकदम से बीमार पड़ी और उसने बिस्तर पकड़ लिया| बड़ा बेटा विदेश में था, छोटे के साथ ही रहते थे दोनों| खाने के नाम पर पतली खिचड़ी मिल जाती थी माँ को , लेकिन शायद बुढ़ापे में इच्छाएं और जोर मारने लगती हैं, तो माँ की भी इच्छा होती थी कि वो कुछ चटपटा खाए, और पनीर तो बहुत ही प्रिय था उसे| एक आध बार कहा भी उसने कि पनीर खाने का मन है लेकिन वो कह नहीं पाये बहू से|
अचानक वो उठे, धीरे से एक पनीर का डोंगा उठाया और ले जाकर उन ज़मीन पे बैठे लोगों को दे दिया| उधर उन लोगों की ख़ुशी का पारावार नहीं था, इधर बाबूजी ने एक नज़र आसमान की ओर देखा और उनकी आँखों से दो बूँद आँसू टपक पड़े| 

Saturday, July 26, 2014

ख़्याल--

आज अचानक बेटा अपने बीबी बच्चों सहित गांव पंहुचा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। कहाँ तो बुलाने पे भी कोई न कोई बहाना बना देता था और अगर आया भी तो अकेला और उसी दिन वापस।
" दादा दादी के पैर छुओ बच्चों" , और बहू ने भी झुक के पैर छुए दोनों के। फिर बहू ने लाड़ दिखाते हुए कहा " क्या बाबूजी, आप कितने दुबले हो गए हैं, लगता है माँ आपका ध्यान नहीं रख पाती, अब आप लोग हमारे साथ ही चल कर रहिये"।
"हाँ, हाँ, क्यों नहीं, बिलकुल अब आप लोग चलिए हमारे साथ, क्या रखा है अब यहाँ", बेटा भी कहने लगा और माँ के पास बैठ गया।
ये क्या हो गया है इनको, इतना परिवर्तन कैसे हो गया, समझ नहीं पा रहे थे बाबूजी कि अचानक अख़बार की खबर का ध्यान आ गया। उसके गाँव के बगल से बाईपास ( सड़क) निकल रहा था और अब वहाँ की जमीनों के दाम कई गुना बढ़ गए थे।  

सावन

"क्या मौसम है , चारो तरफ कीचड़ ही कीचड़ , घर से निकलना मुश्किल । सारे कपडे ख़राब हो गए", दीप्ती का बड़बड़ाना चालू था ।
सच में माँ , बड़ा ख़राब मौसम है ये बारिश का , बाहर निकलो तो एक तो कपड़े ख़राब हो जाते हैं और दूसरे जल्दी सूखते भी नहीं । बेटी ने भी हाँ में हाँ मिलायी ।
उधर गांव में किसान बारिश को देखकर हर्षित हो रहा था कि फ़सल नहीं सूखेगी और प्रार्थना कर रहा था कि बरखा रानी , जरा जम के बरसो । पेड़ों पर झूले पड़े हुए थे ,बारिश में भींगते हुए भी लड़कियाँ झूल रही थीं और कही रेडियो पर गाना बज रहा था "सावन के झूले पड़े" । 

दुर्भाग्य-

समय से बड़ा कोई नहीं होता शायद | इतने प्रतिभाशाली छात्र की ये दशा होगी , किसने सोचा था | दसवी की परीक्षा में पूरे जिले में उसका स्थान था | लेकिन उसके बाद उसे पढ़ने के लिए आपने क़स्बे से बाहर जाना पड़ा | 
घर की माली हालत के मद्देनजर दूर के एक रिस्तेदार के यहाँ रुक के पढ़ाई करने का प्रयास करने लगा | नयी जगह में मुश्किलें तो आ रही थी लेकिन उसका ध्यान आपने लक्ष्य और माँ पिताजी के सपनो पर था | बाक़ी सब तो ठीक था लेकिन उस घर का लड़का पढ़ने में बिलकुल गया गुजरा था | उसके पिताजी अक्सर उसके सामने इसकी खूब तारीफ करते और अपने पुत्र को कोसा करते | ये भला उसकी माँ को कैसे गवारा होता और वो अंदर ही अंदर उससे जलने लगी |
परीक्षा बिलकुल सर पे आ गयी थी और वो पूरी मेहनत से पढ़ाई में लगा था । एक दिन जब वो कॉलेज से आया तो उसके कमरे में सब कुछ बिखरा पड़ा था , किताबें और नोट्स सब फ़टे पड़े थे | सारा कसूर एक कुत्ते पर डाल दिया गया , कि उसी ने ये किया । वो संज्ञाशून्य हो गया , क्या करे कुछ समझ नहीं आ रहा था । आखिरकार किसी तरह से उसने परीक्षा तो दी लेकिन एक विषय में फेल हो गया । और जिस दिन रिजल्ट आया , उसी दिन वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठा ।

प्रमोशन--

" क्या बात है, बड़ी खुश नज़र आ रही हो", राजीव ने आते ही पूछा।
" सच में मैं बहुत खुश हूँ आज, मेरा प्रमोशन हो गया"।
" अरे, मैंने मना किया था ना, अब अगर ट्रांसफर भी हो गया तो माँ की देखभाल कौन करेगा और बच्चों की पढ़ाई का ध्यान"?
" तुमने भी तो कोशिश की थी प्रमोशन के लिए, अगर तुम्हारा हो जाता तो तुम्हारा ट्रांसफर भी तो हो सकता था न"।
" तो, रिफ्यूजल दे देना कल"।  

Friday, July 25, 2014

तस्वीर--

"इतनी कम उम्र और उसपर कंधे पर ये बोझ , कैसे संभालती होगी ये बच्ची । क्या जमाना आ गया है , ये गरीबी और बेचारगी जो न करा दे"। उस फोटोग्राफ को देखकर लोगों के मुँह से यही निकल रहा था ।
बगल में खड़ा फोटोग्राफर खुश था कि इन बच्चों ने कभी मॉडलिंग तो नहीं की थी लेकिन इनकी फोटो बड़ी अच्छी आई । 

संकल्प

इतनी कम उम्र और कंधे पर छोटे भाई का बोझ , लेकिन चेहरे पर शिकन तक नहीं । 
क्या लड़कियाँ बड़ी ही पैदा होती हैं ?? 
क्या माँ बनने के लिए किसी को पैदा करना जरुरी है ??
क्या अपने बच्चे या छोटे भाई / बहन का पेट भरने के लिए बड़ा होना जरुरी है ??
क्या संवेदना सिर्फ बच्चों / मजलूमों में ही बची है ??
क्या पैसा पास होने से दूसरों के दुःख दर्द समझने की क्षमता कम हो जाती है ??
क्या किसी ऐसे समाज की कल्पना की जा सकती है जहाँ भेदभाव , जुल्म या गरीबी न हो ??
हम सब मिलकर ऐसे समाज का निर्माण करें , आईये ये संकल्प लें !!!

भाषण

गाड़ी रुकते ही सामने से एक छोटी बच्ची अपने पीठ पर भाई को टांगे हुए लपकी । "बाबूजी , कुछ दे दो ना , भाई को भूख लगी है" , सुनते ही एक पल को तो दया आई लेकिन फिर न जाने क्यों क्रोध आ गया । "तुम लोग भी , इतनी कम उम्र में भीख मांगने लगते हो , पता नहीं कैसे माँ बाप हैं जो पैदा करके इनको सड़क पर छोड़ देते हैं"। 
" चल बाबू , ये साहब भी भाषण ही देंगे , कुछ और नहीं दे सकते" और वो दूसरे गाड़ी की ओर बढ़ गयी ।

Monday, July 21, 2014

स्वाद

"ये क्या मम्मी , फिर आपने इस ठेले वाले से सब्ज़ी खरीद ली । कितनी बार कहा है की सामने वाले शॉपिंग माल से ले लिया करो । सब्ज़ियाँ ताज़ी भी मिलती हैं और अच्छी भी । क्या मिलता है आपको इसके पास"।
"बेटा , इसकी सब्ज़ी में अपनापन है और उसमे जो स्वाद मिलता है न वो और कहीं नहीं मिलता"। 

बूढ़ा--

रोज़ देखता था वो उस बूढ़े को , गली के कोने में एक फटी हुई दरी पर बैठे हुए । सामने एक कटोरा , झुकी हुई नज़र , कमज़ोर और ज़र्ज़र शरीर । शायद ही किसी से कुछ कहता था वो , बस बीच बीच में कटोरे को उठा कर देख लेता , किसी ने कुछ डाल दिया हो तो निकाल कर रख लेता ।
पता नहीं क्यों , लेकिन उसके दिमाग में हमेशा आता था कि पूछना चाहिए कि वो कौन है और कब से यहाँ है । आखिर एक दिन शाम को वो उस बूढ़े के पास खड़ा हो गया , उसके कटोरे में पांच का सिक्का डाला और इंतज़ार करने लगा कि वो उसकी तरफ देखे तो कुछ पूछे उससे ।
बूढ़े ने बिना सर उठाये कटोरे से सिक्का निकाला और रख लिया , ऊपर देखा तक नहीं । उसने धीरे से पूछा " बाबा , तुम कौन हो और कहाँ से आये हो यहाँ पर "। बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया तो उसने फिर थोड़ी तेज़ आवाज़ में अपना सवाल दुहराया , लेकिन जवाब नहीं आया । अब उसे शक होने लगा कि कहीं ये बहरा तो नहीं है , उसने एक बार फिर से अपना सवाल चिल्लाकर किया , लेकिन कोई हरकत नहीं हुई बूढ़े में ।
अब उसे विश्वास हो गया था कि वो बहरा ही है और वो चला गया । धीरे धीरे उसकी आदत सी हो गयी , रोज़ शाम को बूढ़े को कुछ देना और थोड़ी देर इंतज़ार करना कि शायद वो उसे देखे , उससे कुछ कहे । लेकिन न तो उसने कभी कुछ कहा , न ही उसकी तरफ देखा ।
आखिरकार उसका मानव स्वभाव जागा, और वो उस बूढ़े की तरफ से उदासीन होने लगा | जब वो बूढ़ा कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा तो वो ही क्यूँ उसके बारे में सोचे , उसने अब बूढ़े को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया |
एक दिन अचानक वो नज़र नहीं आया , पता चला कि उसकी मौत हो गयी ।
काश वो जान पाया होता कि वो बूढ़ा बहरा ही नहीं था बल्कि अँधा भी था । 

वहम

बात उस समय की है जब हॉस्टल में रहते थे , ग्रेजुएशन की पढ़ाई के समय | एक कमरे में दो चौकियों को मिलाकर डबल बेड बना दिया गया था और उस पर तीन लोग सोते थे | रात को सोते सोते अक्सर २ बज ही जाते थे और सुबह ९ बजे के पहले आँख का खुलना थोड़ा मुश्किल ही होता था |
खैर ऐसे ही किसी रात को आँख लगी लेकिन थोड़ी देर बाद ही लगा कि पैर के अंगूठे में किसी चीज ने काट लिया है | काफी तेज दर्द हुआ तो उठना पड़ा और देखा कि अंगूठे से खून निकल रहा था | गौर से देखने पर एक दांत का निशान भी दिखा और जो एकलौती चीज दिमाग में आई कि शायद सांप ने काट लिया | अब , नींद गायब , रात के ३ बज रहे थे और बाकि दोनों दोस्त खर्राटे भरते हुए सो रहे थे | एक बार सोचा कि उनको जगाया जाये , फिर उनकी नींद देखकर जगाने कि इच्छा नहीं हुई | लेकिन डर भी लगा हुआ था कि सांप ने काटा है तो सुबह तक जाने क्या हो | फिर सोचा कि सो जाते हैं , अगर नींद खुल गयी सुबह तो ठीक , नहीं तो कोई बात ही नहीं | इसी उधेड़बुन में करीब एक घंटा बीत गया और नींद ने अपने आगोश में ले ही लिया |
सुबह आँख खुली , अपने को ठीक पाया , अंगूठे में दर्द तो था लेकिन काफी कम | फिर अचानक दिमाग में आया कि सांप कैसे हॉस्टल के थर्ड फ्लोर के कमरे में आ सकता है , शायद किसी छछूंदर ने काटा होगा , और फिर अपने ख्याल पर तरस आया कि ये छोटी सी बात रात में दिमाग में क्यों नहीं आई |

Friday, July 11, 2014

अंतिम संस्कार--

" मेरे पास समय बहुत कम है , डाक्टर ने बता दिया है कि कैंसर अपने आखिरी स्टेज में है , प्लीज बेटे को बुला लो अब" | पापा की दर्द भरी आवाज सुनकर वो अपने आप को रोक नहीं सकी , आँसू बेशाख्ता आँखों से बह निकले | माँ तो जैसे जड़ हो गयी थी , सिर्फ सूनी सूनी आँखों से कभी पापा को , तो कभी उसे देखती रहती |
कैसे बताये उनको , कल ही तो उसने फोन किया था भाई को | पूरी बात सुनने से पहले ही बोल पड़ा " मैं बार बार नहीं आ सकता वहां , अभी १५ दिन पहले ही तो आया हूँ | इतनी छुट्टी नहीं मिल सकती मुझे , और हाँ पैसों की जरुरत हो तो मुझे बता देना , भेज दूंगा"|
रात बीती , सुबह हुई | पापा नहीं रहे | हस्पताल के सभी बिल चुकाने के बाद , पापा का पार्थिव शरीर एम्बुलेंस से घर ले आई | और भाई को उसने मैसेज कर दिया " तुम्हारे भेजे हुए पैसों से हस्पताल के बिल चुकाने के बाद करीब छः हज़ार बच गए थे , तुम्हारे अकॉउंट में डलवा दूंगी | और हाँ , अंतिम संस्कार तो मैं करवा दूंगी , अगर छुट्टी मिल जाये तो ब्राह्मणों को भोजन कराने तेरहवीं में आ जाना"|  
तलाश -- पूनमजी की कहानी का अगला पार्ट--
दीपिका अपराधबोध से भर गयी थी , जिस सौरभ को उसने क्या , क्या नहीं कहा था , उसी ने आड़े वक़्त में निस्वार्थ भाव से उसकी मदद की थी | लेकिन अब वो उसका फोन ही नहीं उठा रहा था , कैसे माफ़ी मांगे अपने दुर्व्यवहार की , कैसे उस बोझ को उतारे अपने सर से | कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे |
अचानक उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी | आखिर ये टेक्नोलॉजी कब काम आएगी उसने सोचा और उसने फेसबुक पर एक नए नाम से अपना प्रोफाइल बनाया और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया सौरभ को | कुछ देर बाद नोटिफिकेशन आया " फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्टेड"| अब लाइक , कमेंट्स का सिलसिला चल पड़ा , धीरे धीरे चैटिंग बढ़ने लगी और दीपिका अपने बारे में उसे सब कुछ बताने लगी | कहीं ये दीपिका तो नहीं , सौरभ एक पल को चौंका , लेकिन नाम , पता , उम्र सब अलग थे तो उसने इसे एक कोइन्सिडेंस समझा |
फिर वो घड़ी भी आ गयी जब सौरभ ने मिलने की बात की | दीपिका को तो इसी मौके का इंतज़ार था , अगले दिन शाम को कैफ़े कॉफ़ी डे में मिलना तंय हुआ | सौरभ बहुत एक्ससाईटेड था तो दीपिका भी नर्वस कि पता नहीं वो कैसे रियेक्ट करे |

Thursday, July 10, 2014

अपने

" क्या बात है वर्माजी , बड़े खुश नज़र आ रहे हैं आप , कोई लाटरी तो नहीं लग गयी इस उम्र में" | "
नहीं भाई , दरअसल अख़बार में खबर थी कि एक वृद्धाश्रम बन रहा है अपने शहर में , अब कम से कम बाक़ी जिंदगी तो अपनों में गुजरेगी "|

दादी

दादी ने सब सुन लिया था कि दीपिका किससे बात कर रही है | अब वो सोच में पड़ गयी कि कैसे समझाए दीपिका को , वो तो कुछ दिन की मेहमान हैं , जिंदगी तो बच्ची की पूरी पड़ी है | उन्होंने उसके सर पे हाँथ फेरते हुए प्यार से पूछा " बेटा ये बता कि मैं कितने दिन जीने वाली हूँ , आखिर तुम्हे तो अपनी जिंदगी बितानी है न | तो मेरे लिए इस तरह अगर तू लड़कों को दुत्कारते रहेगी तो शायद मैं चिंता और दुःख में समय से पहले ही चली जाउंगी | चल मुझसे एक वादा कर कि अब और किसी से तू इस तरह का वर्ताव नहीं करेगी |
दीपिका ने हाँ में सर हिलाते हुए दादी कि गोद में सर छुपा लिया और दादी भी उसे प्यार से सहलाती रहीं | ये अलग बात थी कि उसके इरादे नहीं बदले थे |

Monday, July 7, 2014

पिज़्ज़ा

"पैसे पेड़ पर नहीं उगते बहादुर , अभी नहीं दे सकती मैं"|
बहादुर मुह लटकाये सोचने लगा कि अब बीबी के इलाज़ के पैसे कहाँ से लाए |
तभी बेटे की आवाज आई "क्या मम्मी आपने वेज पिज़्ज़ा मंगा दिया , आप भूल गयीं कि मैंने नान वेज पिज़्ज़ा के लिए कहा था | दूसरा आर्डर करदो ना प्लीज"|
ठीक है बेटा , बहादुर को बोल दो , लेता आएगा मार्केट से | 

Sunday, July 6, 2014

भूख़--

"अरे बेटा, कैसे खा लिया तुमने उस ठेले से समोसा और पानी पूरी, तुम तो जानते ही हो कि कितने गंदे हाथ होते हैं उनके और कैसा पानी और तेल इस्तेमाल करते हैं वो लोग", मम्मी परेशान थीं और पापा चिंतित|
तब तक बड़े भाई ने भी टोक दिया " तुमसे ये उम्मीद नहीं थी, तुम तो साइंस के छात्र हो"|
"लेकिन मम्मी, मुझे भूख़ लगी थी"|
अब सब खामोश थे|

Saturday, July 5, 2014

नज़र

दोस्तों के साथ मूवी देखकर और लंच करके लौटी थीं वो | घर में घुसते ही माँ ने कहा " अरे अपने शर्मा अंकल आए हैं , ड्राइंग रूम में जा के नमस्ते तो कर ले "|
ठीक है माँ , मिल लेती हूँ जा के , जरा दुपट्टा तो डाल लूँ |

अंतर

"डाक्टर साहब , ये बच्ची हमें नहीं चाहिए", बोलते हुए उस महिला के आँखों में आँसू आ गए थे |
"देखो , बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं है और अब देर भी काफी हो गयी है , तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है" |
" आप तो एबॉर्शन कर दीजिये , और कौन सी हमारे बेटे की उमर निकल गयी है" , सास ने ठन्डे स्वर में कहा । 

सीख

“अरे चाची , अब इस उमर में अंग्रेजी सीखने जा रही हो”|
“अब क्या बताएं , बेटा बता रहा था की बहू कान्वेंट में पढ़ी है और फर्राटे से अंग्रेजी बोलती है”|
“तो क्या हुआ , बेटा तो तुम्हारा ही है , समझा देगा बहू को”|
“वही समझने के लिए तो सीख रही हूँ “|

थप्पड़

तड़ाक , थप्पड़ बड़े जोर का था और साहब की उतनी ही तीखी आवाज़ " खाने में फिर बाल , दिखाई नहीं देता तुमको "|
बाई भी सहम गयी और सोचने लगी कि कल तो मेमसाब कह रहीं थीं कि कैसा मर्द है तुम्हारा , तुमको पी कर पीटता है , और साहब ने तो आज पी भी नहीं है |  

आज़ादी

हैप्पी इंडिपेंडेंस डे , आज़ादी की वर्षगांठ मुबारक | आतिशबाजियां छुड़ाते और एक दूसरे को मिठाई खिलाते हुए लोग चिल्ला रहे थे और एक दूसरे को इंडिपेंडेंस डे की शुभकामना भी दे रहे थे |
और सामने की मिठाई की दुकान पर छोटू रात के ११ बजे दौड़ दौड़ कर लोगों को पानी दे रहा था और टेबल साफ़ कर रहा था | 

Friday, July 4, 2014

पढ़ाई लिखाई--

" बीबीजी, आप नौकरी क्यों करते हो, आपके पास तो पैसे की कोई कमी नहीं है"|
" पैसा ही सब नहीं होता रे जिंदगी में, आखिर अपनी पढ़ाई लिखाई कब काम आएगी", बीबीजी ने उसे समझाने की कोशिश की|
अभी कुछ दिन पहले ही जब महरी ने कहा था कि मंहगी बहुत बढ़ गयी है और उसकी पगार भी थोड़ी बढ़ जाये तो बीबीजी ने उसे बड़े ही कठोर लहजे में मना कर दिया था|
आज शायद पढ़ाई लिखाई का उपयोग महरी की समझ में आ गया था|

उदासी--

आज हॉस्टल में उसके जन्मदिन पर खूब मस्ती हुई, केक काटा गया, पार्टी हुई और खूब नाच गाना हुआ| पूरी पार्टी के दौरान वह उदास ही रहा, हालांकि किसी को उसकी उदासी का आभास तक नहीं हुआ| लेकिन रात को जब वह अपने कमरे में पहुंचा तो तमाम कोशिशों के बावजूद भी अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया| तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, उसने जल्दी जल्दी अपने को सामान्य करने का प्रयास करते हुए दरवाजा खोला।
"क्या यार, तू उदास क्यों है आज ? आज तो तुझे खुश रहना चाहिए, बर्थडे के दिन भी कोई उदास रहता है क्या ?"
"नहीं तो, मैं उदास कहाँ हूँ यार" जबरदस्ती मुस्कुराते हुए उसने कहा|
"देख, तेरी हर बात मुझे पता है, लेकिन अपनी इस उदासी का कारण नहीं बताया तूने मुझे| चल बता, क्या बात है ?"|
बड़ी मुश्किल से रोका हुआ सब्र का बांध ढह गया और हिचकियाँ बंध गयीं उसकी| थोड़ा संयत होने के बाद भरे गले से बस इतना ही कह पाया, "मेरे जन्म का और मेरी माँ के जाने का दिन एक ही नहीं होना चाहिए था"| 

Wednesday, July 2, 2014

हैवानियत

सिग्नल लाल हो गया था इसलिए कार रोकनी पड़ी | अचानक नज़र पड़ी सड़क के किनारे भीख मांगते हुए बच्चों पर | जाड़े का मौसम और फ़टे कपड़े पहने बच्चे इस कार से उस कार तक दौड़ लगा रहे थे | मेरे शीशे पर भी दस्तक देने लगा एक बच्चा , मन व्यथित हो गया और कुछ पैसे निकाल कर दे दिया उसको |
शाम को घर पर चाय पीते हुए एक समाचार पे नज़र गयी , लिखा था कि बच्चों से भीख मंगवाने वाले एक गिरोह का सरगना गिरफ्तार | पूरी खबर पढ़ कर रोंगटे खड़े हो गए , कैसे बच्चों का अपहरण करके उनको इन गिरोहों को बेच देते हैं | फिर उनकी शारीरिक छति ( अंग-भंग ) करके भीख मांगने की ट्रेनिंग देते हैं और उनका टारगेट की रोज़ इतने पैसे लाना ही है नहीं तो भूखा रखेंगे और यातना अलग |
पैसे कमाने के लिए किस हद तक जा सकता है इंसान , उफ़्फ़ | कैसे किसी मासूम को इस पेशे में धकेल देते हैं लोग ? क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं की हम पता लगाएं कि भीख मांग रहा बच्चा सचमुच किसी गरीब घर का है या किसी गिरोह द्वारा अपहृत ? क्या आगे से ऐसे किसी बच्चे को कुछ दे पाउँगा , निर्णय नहीं कर पा रहा था मैं |

Tuesday, July 1, 2014

टीचर

आज ये महसूस हो रहा था कि जिंदगी उतनी आसान नहीं होती , जितना हम सोचते हैं | पढ़ते समय जब ये भी नहीं सोचा था कि आगे चल कर क्या बनना है तो बहुत सारे रास्ते दिखते थे , लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता गया वैसे वैसे जिंदगी एक संकरी सुरंग लगने लगी | अपने एक टीचर का कहा अब समझ में आ रहा था कि समय सबसे कीमती चीज होती है , इसकी इज्जत करो | 
इस बार आखिरी मौका था सिविल सर्विसेज का एग्जाम देने का और ये भी निकल गया | अब तो कोई रास्ता ही नज़र नहीं आ रहा था , क्या करें , किधर जाएँ | हर एग्जाम के लिए उम्र निकल चुकी थी |
अचानक उम्मीद कि किरण दिखी , याद आया कि टीचर तो बन सकते हैं अभी | उसके लिए तो उम्र है ,और आखिर उसी मोड़ पे आ गए जहाँ जाने के नाम पे सबकी हंसी उड़ाते थे | घर वालो कि उम्मीद और खुद कि नज़रों में अपनी इज्जत बचाने के लिए थके कदमो से बीएड का फॉर्म भरने चल दिए |