Translate

Wednesday, October 22, 2014

सर्वव्यापी--

" त्योहारों के मौसम में इनकी बिक्री बहुत बढ़ गयी है " , मुस्कुराते दुकानदारों की बातचीत सुनते हुए उसने देखा , फुटपाथ पर बिछे हुए तमाम देवी देवताओं के चित्र इसकी गवाही दे रहे थे |
" भगवान हर जगह होते हैं , उन्हें खोजने की जरुरत नहीं " , मंदिर में सुना ये प्रवचन उसे याद आ गया |    

उजियारा --

चारो ओर पटाखों का शोर गूंज रहा था , पूरा गाँव रौशनी से चमक रहा था | लेकिन रघु के कदम तो जैसे जम गए थे , उठते ही नहीं थे | क्या सोच कर चला था , लेकिन अब क्या मुंह लेकर घर जाए |
घर में मेहरारू और बिटिया उसकी राह देख रहे होंगे | दीवाली का मौका , पास में कुछ पैसे होते तो वो भी कुछ पटाखे और नए कपड़े ले लेता उनके लिए | लेकिन महाजन ने भी मना कर दिया | घर से थोड़ा पहले एक पेड़ के नीचे बैठ गया वो , हिम्मत जवाब दे गयी उसकी |
" बापू , यहाँ काहे बैठे हो , घर चलो , हम लोग कब से तुम्हरी राह देख रहे हैं ", बिटिया की आवाज सुन वो चौंक उठा |
" माफ़ कर दे बिटिया , कुछ ला नहीं पाये तुम्हरे लिए ", उसका गला भर्रा गया |
" घर तो चलो बापू " और उसका हाँथ खींच कर बिटिया उसे ले गयी |
" माँ , माँ , बापू आ गए ", बिटिया ने हुलस कर माँ को आवाज लगायी |
" अरे तुम्हीं से हम लोगन का होली दीवाली है , कुछ ला नहीं पाये तो का हुआ , तुम तो हो ना , फिर मन जाई दीवाली " |
मेहरारू समझा रही थी , घर के बाहर और अंदर कुछ दिए झिलमिला रहे थे और उजियारा धीरे धीरे उसके मन के अंधियारे को मिटा रहा था |

Sunday, October 19, 2014

फ़र्ज़--

डॉक्टर के पेशानी पर ठण्ड में भी पसीने की बुँदे चुहचुहाँ रहीं थी | सामने पड़ा हुआ शख्स कोई मामूली शख्स नहीं था | एक तरफ इंसानियत और पेशे का फ़र्ज़ तो दूसरी तरफ देश और समाज का |
मरीज़ का चेहरा देखते ही वो उसे पहचान गए थे | एक बार उनका हाथ अपने सेल फोन पर गया लेकिन फिर उसे वापस रख दिया | क्या करें , इसी उधेड़बुन में ऑपरेशन टेबल पर पहुँच गए | 
करीब एक घंटे बाद बाहर निकले तो उनके जेहन में अपने पेशे में बताई गयी पहली सीख घूम रही थी " डॉक्टर का पहला फ़र्ज़ होता है जान बचाना " |

Saturday, October 18, 2014

दिए--

किसी के आस के दिए ,
किसी के एहसास के दिए ,
सोचा था इस बार जलाएंगे ,
लेकिन वक़्त की तल्खी ने ,
बुझा दिए , सारे ज़ज्बात के दिए ,
काश कि हम सचमुच जला पाते ,
रौशनी सब ओर फैला पाते ,
किसी भी तूफ़ान में बुझे नहीं ,
ऐसे दिए हम ला पाते ,
लेकिन कभी जरूर जलाएंगे हम ,
खुशियों और उम्मीदों की सौगात के दिए !!

प्रगति--

हर साल की तरह इस साल भी दिवाली पर बूढी अम्मा दिए लेकर सड़क के किनारे बैठ गयी | 
पर इस साल उनका एक भी दिया नही बिका | 
वो मायूस होकर बोली " अगले साल से हम दिया नाही बेचब , अब जमाना बदल गइल हौ , लोगन के पास इतना समय नाही हौ ई दिया के जलावे खातिर "
अंजू सिंह..

जीवन--

कई सालों से वो बूढी औरत फुटपाथ पर दिए बेच रही थी |
आज पूछ ही लिया " दिए कब तक बेचती रहोगी दादी " |
" जब तक लौ बची है बेटा " |

Thursday, October 16, 2014

नमस्कार " नया लेखन - नए दस्तखत "के मित्रो--

नमस्कार " नया लेखन - नए दस्तखत "के मित्रो | जैसा कि आपको बताया जा चूका हैं इस मंच के पटल पर प्रत्येक सप्ताह एक तस्वीर दी जायेगी और उस तस्वीर को देखकर सभी एक लघु कथा लिखेंगे . यह एक सामान्य सी प्रतियोगिता होगी जिसमें सभी सदस्य भाग ले सकते हैं सिवाय एडमिन/ जज और फोटो प्रस्तुत करने वाले सदस्य के ,
इस प्रतियोगिता के नियम इस प्रकार होंगे
1 सिर्फ एक लघु कथा ही पोस्ट की जानी चाहिए
2.दिए गयी समय सीमा से पहले या पश्चात पोस्ट की गयी लघु कथा मान्य नही होगी 
3 . बेस्ट लघु कथा का चयन एडमिन /मनोनीत जज और फोटो देने वाला सदस्य करेगा और अंतिम निर्णय ही मान्य होगा
4.जो विजेता घोषित होगा उसको अगले सप्ताह फोटो पोस्ट करने का अधिकार प्रदान किया जाएगा
5. जब ब्लॉग बनाया जायेगा तो पुरुस्कृत लघु कथाओं को सर्वश्रेष्ठ लघु कथा के नाम से पोस्ट किया जाएगा
6 . आपकी लघु कथा का मूल भाव आप से पहले पोस्ट लघु कथाओं के समान नही होना चाहिए
7 . समय- आज रात 8 बजे से शनिवार रात 11 बजे तक लघु कथा पोस्ट की जा सकती हैं
8. इस प्रतियोगिता का उद्देश्य मनोरंजन के साथ साथ लेखन सीखने को प्रेरित करना हैं एक चित्र पर सबके विभिन्न भाव एक उत्सुकता जगाते हैं इसे सकारात्मक रूप से ग्रहण कीजिये
9. आलोचना नही समालोचना कीजिये सिर्फ लाइक नही करिए उचित मार्गदर्शन की दरकार सबको रहती हैं दूसरों के सुझावों को सकारात्मक रूप से ले नकारात्मकता से नही
१०. पुराने मित्र गणों से आग्रह हैं की लघु कथा लिखते रहे नए कहानीकारों से आग्रह हैं की आपकी लघु कथाओं का इस ग्रुप को इंतज़ार हैं आपकी लघु कथाएं आपकी सोच की परिपक्वता को दर्शाती हैं .
११ .लघु कथा के साथ चित्र पोस्ट करे तो अच्छा होगा .परन्तु लघु कथा के उपर ' प्रतियोगिता के लिय " लिखना अनिवार्य हैं .देखा गया हैं सब लघु कथा पोस्ट कर देते हैं परन्तु प्रतियोगिता के लिय लिखना भूल जाते हैं कृपया ध्यान दे इस तरफ भी ...
इस बार चित्र दिया हैं अर्चना तिवारी जी ने और जज होंगे श्री योगराज प्रभाकर जी , विवेक झा जी ,    जी एवम विनय कुमार..

Wednesday, October 15, 2014

संवेदना--

दीवाली एक ऐसा त्यौहार है जिसका जिक्र आते ही बच्चे तो बच्चे , बड़े भी उतने ही उत्साहित हो जाते हैं | घरों की सफाई , रंग रोगन , नए कपड़े , मिठाईयां और रौशनी , सब कुछ तो जुड़ा है इसके साथ | महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती है और सब तरफ उत्सव का माहौल नज़र आता है | इस घर में भी कुछ ऐसा ही माहौल था , सबसे ज्यादा खुश था मोनू , उम्र सिर्फ ९ साल लेकिन उत्साह में किसी से कम नहीं |
आख़िरकार दीवाली का दिन भी आ गया | मोनू नए कपड़े पहन कर बहुत खुश था , पूरा दिन सजावट करने में लगा रहा और शाम को घूमने जाने का प्रोग्राम भी पहले से तंय था | शाम होते होते घर जगमगाने लगा , चारो तरफ झालर , दिए और मोमबत्ती की रौशनी झिलमिला रही थी | मोनू अब बाहर जाने के लिए मचलने लगा और आखिर सब लोग तैयार हो गए शहर की सजावट और रौशनी देखने के लिए |
सब लोग कार में सवार हुए और चल पड़े रोशनियों से आँख मिचौली खेलने | मोनू बहुत प्रसन्न था , इतनी सारी रौशनी देख रहा था और उसकी ख़ुशी में सभी शरीक थे | कुछ देर घूमने के बाद एक दुकान पर कार रुकी और सब लोग उतरे | मिठाई और चाट की दुकान थी और सारे अपनी पसंद के हिसाब से ले कर खाने लगे | मोनू ने भी चाट लिया और खाने लगा | अचानक उसकी निगाह दूर के एक लड़के पर पड़ी जो नीचे गिरे दोनों में से खाने के लिए कुछ ढूँढ रहा था | मोनू के हाँथ रुक गए , अब वो खा नहीं पा रहा था | उसकी निगाहें आश्चर्य से उस लड़के को ही देख रहीं थी , वो समझ नहीं पा रहा था कि ये बच्चा आखिर नीचे गिरे हुए में से क्यों खा रहा है | संभवतः आज तक उसने कभी ऐसा दृस्य नहीं देखा था | थोड़ी देर बाद सब लोग वापस कार में सवार हो गए और पूरा शहर घूम कर वापस घर पहुंचे | लेकिन अब मोनू के चेहरे से वो ख़ुशी काफूर हो चुकी थी |
घर पहुँच कर मोनू गुमसुम था , लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया | सबको लगा कि शायद थका है इसलिए ऐसा लग रहा है | लेकिन जब वो देर तक गुमसुम रहा तो श्याम को लगा कि जरूर कोई बात है | श्याम ने जब पूछा तो पहले तो उसने जवाब नहीं दिया , लेकिन बार बार पूछने पर भरी आँखों से बोल पड़ा " वो बच्चा नीचे का गिरा हुआ क्यों खा रहा था , क्या उसके घर पर कोई नहीं था जो उसे खिला पिला सके , उसे घुमा सके , नए कपड़े दिला सके " | उसके सवाल ने श्याम को हतप्रभ कर दिया , इतनी कम उम्र में इतनी गंभीर सोच | देखा तो उसने भी था उस बच्चे को , लेकिन उसे क्यों नहीं चुभा ये , वो ख्याल उसके मन में क्यों नहीं आया | वो सोचने लगा कि हम लोग इन सब चीजों के प्रति संवेदनहीन हो गए हैं , अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता हमें |
खैर , श्याम ने उसे समझा बुझा कर शांत किया , लेकिन उसका मन अशांत था | आज मोनू ने उसकी आँखें खोल दी थी , जो वो महसूस कर रहा था , अब कुछ कुछ वो भी महसूस कर रहा था |
अगले दिन रविवार था , श्याम ने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि वो फिर उसे लेकर उसी दुकान पर जायेगा | शाम को उसने मोनू से कहा कि चलो घूम कर आते है तो वो तैयार हो गया | जैसे ही वो लोग उसी दुकान पर पहुंचे , मोनू की निगाह उस बच्चे को ढूंढने लगीं | श्याम ने भी निगाह दौड़ाई और थोड़ी दूर पर वो बच्चा दिख ही गया |
श्याम कार की तरफ बढ़ा और उसने नए कपड़े का पैकेट और मिठाई का डब्बा निकाला और मोनू को पकड़ा दिया | मोनू ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर वो दौड़ कर उस बच्चे के पास पहुँच गया | मोनू ने जब उसे डब्बे पकड़ाए तो एकबारगी वो बच्चा भी हैरान रह गया | उसे तो लोगों के दुत्कार की ही आदत थी , उसे भी कोई कुछ दे सकता है , ये उसकी कल्पना से परे था | कुछ देर तक तो वो डब्बे को हाथ में लेकर खड़ा रहा और फिर उसकी आँखें ख़ुशी से चमकने लगीं | उसने एक बार मोनू की ओर देखा और डब्बे लेकर अपने घर की ओर दौड़ पड़ा | मोनू उसी तरफ टकटकी लगाये देखता रहा , जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गया |
पर अब मोनू के चेहरे पर जो ख़ुशी नज़र आ रही थी , वो शायद श्याम को कभी नहीं दिखी थी | लेकिन अब श्याम को यक़ीन हो गया था कि आगे चलकर मोनू कम से कम एक बेहतर और संवेदनशील इंसान तो जरूर बनेगा |

Tuesday, October 14, 2014

रक्तदान शिविर --

बात काफी वर्ष पहले की है , तब मैं मुग़लसराय में था | काफी भीड़भाड़ वाली शाखा थी और काम भी बहुत हुआ करता था | लेकिन इन सब के बावजूद हम लोग कुछ न कुछ कार्यक्रम करते ही रहते थे | शायद हमारी उस इलाके की इकलौती बैंक शाखा थी जो सामाजिक कार्यक्रमों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती थी |
हमारे बैंक की स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे थे और इस उपलक्ष्य में समस्त आंचलिक कार्यालयों को निर्देश दिए गए थे कि इस पूरे वर्ष कोई न कोई सामाजिक कार्यक्रम करने हैं | हमारा आंचलिक कार्यालय बनारस था और बनारस और आसपास के सभी शाखा प्रबंधकों को वर्ष भर चलने वाले कार्यक्रमों के बारे में निर्णय करने के लिए आंचलिक कार्यालय बुलाया गया | उस मीटिंग में ये निर्णय लिया गया कि इस १०० वर्ष के कार्यक्रमों की शुरुआत रक्तदान शिविर के आयोजन से की जाये | बनारस शहर में स्थित सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के सामने स्थित शाखा को ये निर्देश दिया गया कि वो इस आयोजन को करे | बाक़ी भी तमाम आयोजनों की रुपरेखा बना ली गयी और हर २ महीने पर मीटिंग करते रहने की बात तंय हुई |
अगले दिन जब मैं शाखा में गया तो कहीं न कहीं मेरे मन में ये बात चल रही थी कि हमें भी रक्तदान शिविर का आयोजन अपनी शाखा में करना चाहिए | फिर शाम को मैंने समस्त स्टाफ की बैठक की और अपना विचार सबके सामने रखा | उम्मीद के विपरीत समस्त स्टाफ ने एक स्वर में कहा कि हम लोग जरूर करेंगे और फिर उसी समय ये शिविर कब और कैसे करना है के बारे में निर्णय ले लिया गया | अगले दिन हम लोगों ने जगह का चुनाव करना प्रारम्भ किया और एक मैरिज हाल , जहाँ जगह पर्याप्त थी, को बुक कर दिया गया | शाम को फिर एक बैठक हुई और उस बैठक के दौरान ही हमारे शाखा के एक प्रतिष्ठित ग्राहक शखा में आये | उन्होंने पूछ लिया कि किस चीज की बैठक है तो हम लोगों ने रक्तदान शिविर के आयोजन के बारे में उनको बताया | ये सुनते ही उन्होंने कहा कि अगर आप लोग ऐसा करने का सोच रहे हैं तो हमारी भागीदारी जरूर रहेगी |
अगले दिन एक और सुखद आश्चर्य सामने था , उनके साथ करीब ६ और प्रतिष्ठित ग्राहक आये और उन्होंने कहा कि आप पूरे कार्यक्रम का विवरण दीजिये | अब उन सब लोगों ने एक एक चीज की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली , किसी ने मैरिज हॉल का किराया वहां किया , किसी ने कहा कि उस दिन का खान पान हमारी ओर से रहेगा , किसी ने गाड़ियों की जिम्मेदारी ली तो किसी ने टेंट के सारे सामान का खर्च वहन करने का जिम्मा लिया | कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में मैंने पद्मश्री मोहम्मद शाहिद से बात की और वो सहर्ष तैयार हो गए | इतना ही नहीं उन्होंने हॉकी के दो और ओलम्पिक खिलाडियों को भी बोल दिया आने के लिए |
हमने अपने आंचलिक कार्यालय को ये बात बताई नहीं थी कि हम लोग भी ये कार्यक्रम करने जा रहे हैं और पूरी तैयारी चलती रही | लोगों का उत्साह देखते बन रहा था , कई लोगों ने आकर शिकायत भी की , कि उन्हें नहीं शामिल किया गया | खैर सब कुछ बिलकुल ठीक तरीके से चल रहा था कि एक दिन आंचलिक कार्यालय से तत्काल मीटिंग के लिए फोन आया | मीटिंग में पहुँचने पर पता चला कि जिस शाखा को रक्तदान शिविर का आयोजन करना था वो उसे कर पाने में असमर्थता व्यक्त कर रही थी | सब चिंतित थे कि अब क्या होगा क्योंकि सिफ १० दिन ही बचे थे | अब मैंने अपने शाखा के कार्यक्रम के बारे में बता देना ही उचित समझा | अब सबका चेहरा खिल गया था , तुरंत पूछा गया कि कितना खर्च होगा और कितने रुपयों की जरुरत है | जब मैंने ये बताया कि हम लोग बहुत ही कम खर्च कर रहें हैं क्योंकि सारा खर्च तो शाखा के ग्राहक ही उठा रहे हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा |
अब तक सारे क्षेत्र में इस कार्यक्रम का भरपूर प्रचार हो चुका था , हर आदमी इससे किसी न किसी रूप में जुड़ना चाहता था | रक्त लेने के लिए जो संस्था आने वाली थी उसने हमसे पूछा कि कितने यूनिट रक्त मिल सकेगा | हम लोगों ने बताया कि कम से कम १०० यूनिट तो मिलेगा ही लेकिन उनको शायद अपने पूर्व अनुभवों के चलते इसपर भरोसा नहीं हुआ |
खैर कार्यक्रम का दिन आ गया , एक टीम बनारस जाकर मुख्य अतिथि और उनके साथियों को लेकर आई | सभी अतिथियों के लिए शाल और नटराज की मूर्ति भेंट स्वरुप मंगाई गयी थी | नियत समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ और कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा हुआ था | सबसे पहले मैंने ही रक्तदान की इच्छा जाहिर की थी लेकिन उससे पहले ही तमाम लोगों में होड़ लग गयी थी रक्त देने के लिए | जब तक मैं पहुंचु , लगभग ५० लोग रक्त दे चुके थे और मेरे बाद भी काफी लम्बी कतार थी | रक्त लेने वाली संस्था ने सिर्फ ६० यूनिट के लिए ही व्यवस्था की थी जिसके चलते तमाम लोग रक्त देने से वंचित रह गए | आंचलिक कार्यालय से आये हुए लोग दंग थे कि ऐसा आयोजन भी हो सकता है | मुख्य अतिथि भी भावुक हो गए और बोले कि मैं कई कार्यक्रमों में जाता हूँ लेकिन ऐसा कार्यक्रम मैंने आज तक नहीं देखा था जहाँ हर आदमी दिल से जुड़ा हो | मीडिया के लोग भी थे और अगले दिन तमाम समाचार पत्रों में इस कार्यक्रम की खबर प्रमुखता से छपी थी | मैंने जब स्थानीय लोगों को धन्यवाद देना चाहा तो उन्होंने ये कह कर मेरा मुह बंद करा दिया कि आप लोग अगर बैंकर होकर समाज के लिए इतना सोच सकते हैं तो क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि हम लोग इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें | एक ऐसे वर्ष की शुरुआत हो चुकी थी जिस वर्ष में हम लोगों ने न सिर्फ तमाम सामाजिक कार्यक्रम किये , बल्कि आतंकवाद के खिलाफ एक सर्व धर्म की गोष्ठी भी आयोजित की, जिसके बारे में विस्तार से फिर कभी | 

Monday, October 13, 2014

होनी--

अभी हांथों की मेहँदी भी नहीं सूखी थी और ये हादसा |
" भगवान को यही मंजूर था " , लोग दिलासा दे रहे थे |
" लेकिन जिस भगवान को ये मंजूर था वो भगवान हमें मंजूर नहीं "|  
ये चेहरे भी क्या क्या सितम ढाते हैं ,
खुद को तो दिखते नहीं , औरों को क्यूँ भाते हैं !! 
चलते रहे सफ़र में , कभी सोचा ही नहीं ,
पहुचेंगे गर मुक़ाम पे तो हासिल क्या होगा !!

ख़ुशी--

जन्मदिन मनाकर सब होटल से बाहर निकले | बच्चा बहुत खुश था , नए नए कपडे , ढेरों तोहफे और खूब सारी मस्ती | सब बाहर खड़ी गाड़ियों में बैठने लगे तभी बच्चे की नज़र गयी कोने में खड़े एक और बच्चे पर | तन पर नाम मात्र के कपड़े और नज़रें उस पर |
अचानक बच्चा मुड़ा और कोने वाले बच्चे की ओर बढ़ा | पास पहुँच कर उसने अपने हाथ में लिए तोहफे को उसको पकड़ा दिया और वापस आने लगा |
अब बच्चा पहले से कहीं ज्यादा खुश था |

Saturday, October 11, 2014

नया लेखन - नए दस्तखत के मित्रों

नया लेखन - नए दस्तखत के मित्रों , इंतज़ार की घड़ियाँ समाप्त हुयी | इस सप्ताह पिछले बार के विजेता अर्चना तिवारी जी ने चित्र दिया था | इस बार का चित्र एक अलग थीम पर था , आधुनिकता और विकास का प्रतीक एक मॉल का चित्र था | बड़ी प्यारी प्यारी कहानियां आयीं इस बार | मज़ा आ गया , एक ही चित्र पर इतने लोगों की अलग अलग कल्पनायें , बड़ा शानदार अनुभव रहा | सबको बधाईयां और धन्यवाद सहभागिता के लिए | उम्मीद करतें हैं की आगे भी इसी तरह से सहभागी बनते रहेंगे आप सब | नए लोगों का दस्तक देना और उनका लेखन वाक़ई काबिलेतारीफ है |
इस बार भी विजेता कहानी का चयन बहुत कठिन रहा , क्योंकि अधिकांश कहानियां बहुत उम्दा थीं लेकिन इस बार जिस कहानी को अर्चना तिवारी जी , योगराज प्रभाकर जी और विनय कुमार ने सबसे अच्छा पाया वो कहानी  जी की है | बहुत बेहतरीन कहानी लिखी हैं इन्होने | एक परिवार के माध्यम से इन्होने न सिर्फ गांव के हाट / बाजार और आधुनिक मॉल की बहुत अच्छी तुलना की और इस अंधाधुंध उपभोक्तावाद और चमक दमक पर एक प्रश्नचिन्ह भी लगा दिया | बहुत बहुत बधाई संध्या तिवारी जी | इस सप्ताह कुछ और कहानियां भी बहुत ही उम्दा थीं ।
और अब अगले सप्ताह कहानी का चित्र संध्या तिवारी जी प्रस्तुत करेंगी .
शुक्रिया अर्चना तिवारी जी , योगराज प्रभाकर जी और नीलिमा शर्माजी..
संध्या तिवारी जी की कहानी --

Thursday, October 9, 2014

विकास--

रमुआ सब तरफ चकर पकर देख रहा था , खूब बिजली बत्ती चमक रही थी , उसकी आँख चौंधिया जा रही थी | 
" बाबू , बड़ा सुन्दर जगह है ई तो , एतना नीक नीक दुकान है , केतना साफ़ हौ इ जगह , हमरा गांव कब अइसन होइ "|
" बचवा , ई माल के चमक क कीमत त केहु के चुकावे के पड़ी न " |

हवाएँ--

हम तो समझे थे ,
हवाएँ खामोश नहीं होतीं ,
लेकिन इन सन्नाटों को देखकर ,
अब महसूस होने लगा है कि ,
वक़्त बेवक़्त चलने वालीं हवाएँ ,
कभी कभी ख़ामोशी की शक्ल में ,
आने वाले तूफान की आहट दे देती हैं !!

Wednesday, October 8, 2014

कुत्ता--

" फिर मत आना घर पर , जब देखो तब चले आते हैं " |
अब क्या करे , दफ्तर में तो साहब से बात कर ही नहीं सकते , कैसे करे बच्चे का इलाज़ ?
गेट से बाहर निकला तो नज़र पड़ी , वहाँ तख्ती लटक रही थी " कुत्तों से सावधान " | 

कुत्ते--

" दुर , दुर , भाग यहाँ से ", और उसने खींच कर एक डंडा मारा कुत्ते को |
कुत्ता कांय कांय करता भागा और दूर खड़े अपने गिरोह के बाकी कुत्तों में शामिल हो गया |
उसकी इस हरक़त पे पता नहीं क्या सोच रहे थे वो सारे कुत्ते ??
प्रवचन बढ़िया था , काफी लोग इकट्ठा हुए थे | समस्त जीवों से प्यार करने की बातें हुई और लोगों ने खूब सराहा |
समापन के बाद भोजन का भी अच्छा प्रबंध था | खूब छक कर भोजन किया सबने और बर्बाद भी उतना ही किया |
पकवानों की गंध से खिंचे हुए तमाम कुत्ते भी आस पास मंडराने लगे |
लेकिन जब कुत्तों का ये खलल नाकाबिले बर्दास्त हो गया तो उसने खींच कर एक डंडा मारा कुत्ते को |
कुत्ता भागा और दूर खड़े बाकी कुत्तों में शामिल हो गया | बाक़ी कुत्ते सोच में पड़ गए थे !!

Tuesday, October 7, 2014

मौसम--

तुम तो जुदा हो गए थे ,
मौसमों की तरह ,
मैं ही भूल नहीं पाया तुम्हे ,
सावन , पतझड़ की तरह ,
लेकिन फिर से नईं कोंपलें निकल रहीं हैं ,
मन का कोना फिर हरा सा हो रहा है ,
काश सूरज न डूबे फिर कभी ,
काश चांदनी रहे हमेशा कायम ,
अब शायद सह न पाऊँ फिर से ,
बदलते हुए मौसमों की दस्तक़ !!

Monday, October 6, 2014

बर्तन--

" बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है चच्चा , क्या पक रहा है " |
" कुछ नहीं , गोश्त पक रहा है | आज बकरीद है न , कोई दे गया था " |
 दलान में किनारे अलग रखे हुए कुछ बर्तन आज मुस्कुरा रहे थे |

कुर्बानी--

"क्या बात है, आपने कुर्बानी क्यों नहीं दी इस बार ? " 
"दरअसल क़ुरआन मजीद फिर से पढ़ ली थी मैंने |"

Friday, October 3, 2014

प्रार्थना--

आज की प्रार्थना में शामिल सभी वर्ग के बच्चों के लबों पर एक ही प्रार्थना थी " हमें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की शक्ति देना बापू " | 
बापू के चेहरे पर असीम शांति झलकने लगी | उन्हें यक़ीन हो गया था कि ये बच्चे ही उनके सपनों का भारत बनाएंगे और अब समाज की बागडोर सही हाथों में है |

Thursday, October 2, 2014

झाड़ू--

" अम्बे है मेरी माँ , दुर्गे है मेरी माँ " गुनगुनाते हुए बटोही गली में झाड़ू लगा रहा था | अचानक सामने से एक भीड़ आई और वो किनारे हट गया |
" अरे मिल गया रे झाड़ू " चिल्लाते हुए लोगों का हुजूम , जिसमे कुछ खद्दरधारी भी थे , बटोही की ओर बढ़ा | जब तक वो कुछ समझे , झाड़ू छीन लिया गया था और फिर भीड़ ने बारी बारी से झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचाई | इसी छीना छपटी में बेचारे बटोही का झाड़ू भी टूट गया |
" सर , मेरी फोटो देखी आपने , आजके सांध्यकालीन अखबार में छपी है " , बताते हुए नेताजी बहुत प्रसन्न थे | उधर बटोही नगर निगम में झाड़ू टूट जाने की वजह से झाड़ खा रहा था और गांधीजी की प्रतिमा खामोश थी |

Wednesday, October 1, 2014

ऊँट की सवारी--

ऊँट को राजस्थान का जहाज कहा जाता है लेकिन हमारी यादें इससे किसी और रूप में जुड़ी हुई हैं | गर्मियों की छुट्टियाँ तो हर साल गाँव में ही बीतती थीं | बिजली तो थी ही नहीं सड़कों का भी बुरा हाल था | अव्वल तो सड़कें थी हीं नहीं और थीं भी तो कच्ची और टूटी फूटी | यातायात के साधन बहुत सीमित थे , इक्का दुक्का बसें चलती थीं | अधिकतर हम लोग पैदल , साइकिल या बैलगाड़ी की सवारी करते थे | एक और वाहन हुआ करता था जिसे सगड़ी कहते थे | ये एक तीन पहिया वाहन होता था जिस पर बड़े बुजुर्ग सवारी करते थे |
हमारे घरों में दुधारू पशु खूब होते थे और उनको चराने ले जाना अपने आप में बड़ा रोमांचक अनुभव हुआ करता था | पता नहीं कितने लोगों ने भैंस की सवारी की है , लेकिन बहुत मजा आता था | खेतों में चरी और बरसीम उगाई जाती थी ताकि पशुओं को हरा चारा मिल सके | लेकिन एक और बहुत आवश्यक चीज होती थी पशुओं के लिए " खली " , जो उनको खिलाई जाती थी ताकि वे खूब दूध दें | ये खली अक्सर शहर से आती थी और इसको लाने का वाहन था ऊँट | लगभग हर हफ्ते ऊँट हमारे घर आया करता था और जितने देर वो रहता था , हमारी उत्सुकता बनी रहती थी | हम लोग उसी के चारो ओर घूमते रहते थे क्योंकि उसका उठना और बैठना जितना दिलचस्प होता था उतना ही मजेदार होता था उसको चलते देखना |
कई बार इच्छा होती की हम भी ऊँटवान की तरह उसकी सवारी करें लेकिन  हिम्मत नहीं पड़ती थी | आखिरकार हिम्मत जुटाकर एक बार उसपर सवारी करने की इच्छा जताई | ऊँटवान ने कहा की ठीक है चलो घुमा देतें हैं | उसने ऊँट के ऊपर बैठा दिया और कहा कि कस कर पकड़ लो क्योंकि ऊँट बहुत हिलता है | खैर खूब कस कर पकड़ कर बैठे थे हम , ऊँट ने पहले एक पैर उठाया , हमें लगा की अब गिरे , तब गिरे , फिर उसने दूसरा पैर भी उठाया तो लगा की पीछे की तरफ लुढ़के , फिर उसने बाकी दोनों पैर भी उठाये और खड़ा हो गया | बस इतने में ही हालत ख़राब हो गयी थी और जब उसने चलना शुरू किया तो लगा कि पूरी दुनिया घूम रही है | थोड़ी देर बाद हम उतर गए लेकिन सर घूमता रहा | उसके बाद आगे भी वो ऊँटवाला आता रहा और हम लोग उसको देख कर रोमांचित होते रहे | 

बापू को याद करते हुए--

इस देश में गांधीजी से जुड़े सभी स्थलों को देखने की इच्छा है और कभी किताबों में पढ़ा हुआ " फीनिक्स आश्रम " , जिसको महात्मा गांधी ने १९०४ में स्थापित किया था , को भी देखने की तमन्ना थी | यह आश्रम सन १९८५ के दंगो में क्षतिग्रस्त हो गया था और इसका नाम बम्बई रख दिया था | बाद में २७ फरवरी २००० में इसे पुनः चालू किया गया | फीनिक्स सेट्लमेंट ट्रस्ट ने भारत सरकार कि मदद से यहाँ गांधीजी के घर को पुनः स्थापित किया और यहाँ क्लीनिक एवम एड्स सेंटर इत्यादि शुरू किया |
सके पहले भी दो बार डरबन गया लेकिन वहां नहीं जा पाया था , इसलिए इस बार सोच रखा था कि वहां जाएंगे | शाम को करीब ४ बजे फुर्सत मिलने के बाद मैंने ड्राइवर से कहा कि फीनिक्स चलना है , तो वो मुझे आश्चर्य से देखने लगा | मैंने पूछा कि क्या हुआ तो वो बोला कि शाम के समय , वो भी शुक्रवार को ( जब यहाँ वीकेंड शुरू हो जाता है ) , वहां जाना खतरनाक है | मुझे लगा वो शायद बहाना बना रहा है तो मैंने वहां के कुछ भारतीय लोगों से पूछा , तो उनका भी यही जवाब था |
कहीं कुछ चुभा कि गांधीजी , जो अहिंसा के पुजारी थे , के आश्रम में शाम के समय जाना खतरनाक है यहाँ | समय कम था क्योंकि वापसी का टिकट लिया हुआ था सो वापस आना पड़ा | लेकिन शीघ्र ही जाकर देखना है कि क्यों लोग उस जगह पर शाम को जाने में कतराते हैं | क्यों अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बापू के आश्रम का क्षेत्र भी हिंसा से अछूता नहीं है ?