Translate

Tuesday, October 14, 2014

रक्तदान शिविर --

बात काफी वर्ष पहले की है , तब मैं मुग़लसराय में था | काफी भीड़भाड़ वाली शाखा थी और काम भी बहुत हुआ करता था | लेकिन इन सब के बावजूद हम लोग कुछ न कुछ कार्यक्रम करते ही रहते थे | शायद हमारी उस इलाके की इकलौती बैंक शाखा थी जो सामाजिक कार्यक्रमों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती थी |
हमारे बैंक की स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे थे और इस उपलक्ष्य में समस्त आंचलिक कार्यालयों को निर्देश दिए गए थे कि इस पूरे वर्ष कोई न कोई सामाजिक कार्यक्रम करने हैं | हमारा आंचलिक कार्यालय बनारस था और बनारस और आसपास के सभी शाखा प्रबंधकों को वर्ष भर चलने वाले कार्यक्रमों के बारे में निर्णय करने के लिए आंचलिक कार्यालय बुलाया गया | उस मीटिंग में ये निर्णय लिया गया कि इस १०० वर्ष के कार्यक्रमों की शुरुआत रक्तदान शिविर के आयोजन से की जाये | बनारस शहर में स्थित सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के सामने स्थित शाखा को ये निर्देश दिया गया कि वो इस आयोजन को करे | बाक़ी भी तमाम आयोजनों की रुपरेखा बना ली गयी और हर २ महीने पर मीटिंग करते रहने की बात तंय हुई |
अगले दिन जब मैं शाखा में गया तो कहीं न कहीं मेरे मन में ये बात चल रही थी कि हमें भी रक्तदान शिविर का आयोजन अपनी शाखा में करना चाहिए | फिर शाम को मैंने समस्त स्टाफ की बैठक की और अपना विचार सबके सामने रखा | उम्मीद के विपरीत समस्त स्टाफ ने एक स्वर में कहा कि हम लोग जरूर करेंगे और फिर उसी समय ये शिविर कब और कैसे करना है के बारे में निर्णय ले लिया गया | अगले दिन हम लोगों ने जगह का चुनाव करना प्रारम्भ किया और एक मैरिज हाल , जहाँ जगह पर्याप्त थी, को बुक कर दिया गया | शाम को फिर एक बैठक हुई और उस बैठक के दौरान ही हमारे शाखा के एक प्रतिष्ठित ग्राहक शखा में आये | उन्होंने पूछ लिया कि किस चीज की बैठक है तो हम लोगों ने रक्तदान शिविर के आयोजन के बारे में उनको बताया | ये सुनते ही उन्होंने कहा कि अगर आप लोग ऐसा करने का सोच रहे हैं तो हमारी भागीदारी जरूर रहेगी |
अगले दिन एक और सुखद आश्चर्य सामने था , उनके साथ करीब ६ और प्रतिष्ठित ग्राहक आये और उन्होंने कहा कि आप पूरे कार्यक्रम का विवरण दीजिये | अब उन सब लोगों ने एक एक चीज की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली , किसी ने मैरिज हॉल का किराया वहां किया , किसी ने कहा कि उस दिन का खान पान हमारी ओर से रहेगा , किसी ने गाड़ियों की जिम्मेदारी ली तो किसी ने टेंट के सारे सामान का खर्च वहन करने का जिम्मा लिया | कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में मैंने पद्मश्री मोहम्मद शाहिद से बात की और वो सहर्ष तैयार हो गए | इतना ही नहीं उन्होंने हॉकी के दो और ओलम्पिक खिलाडियों को भी बोल दिया आने के लिए |
हमने अपने आंचलिक कार्यालय को ये बात बताई नहीं थी कि हम लोग भी ये कार्यक्रम करने जा रहे हैं और पूरी तैयारी चलती रही | लोगों का उत्साह देखते बन रहा था , कई लोगों ने आकर शिकायत भी की , कि उन्हें नहीं शामिल किया गया | खैर सब कुछ बिलकुल ठीक तरीके से चल रहा था कि एक दिन आंचलिक कार्यालय से तत्काल मीटिंग के लिए फोन आया | मीटिंग में पहुँचने पर पता चला कि जिस शाखा को रक्तदान शिविर का आयोजन करना था वो उसे कर पाने में असमर्थता व्यक्त कर रही थी | सब चिंतित थे कि अब क्या होगा क्योंकि सिफ १० दिन ही बचे थे | अब मैंने अपने शाखा के कार्यक्रम के बारे में बता देना ही उचित समझा | अब सबका चेहरा खिल गया था , तुरंत पूछा गया कि कितना खर्च होगा और कितने रुपयों की जरुरत है | जब मैंने ये बताया कि हम लोग बहुत ही कम खर्च कर रहें हैं क्योंकि सारा खर्च तो शाखा के ग्राहक ही उठा रहे हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा |
अब तक सारे क्षेत्र में इस कार्यक्रम का भरपूर प्रचार हो चुका था , हर आदमी इससे किसी न किसी रूप में जुड़ना चाहता था | रक्त लेने के लिए जो संस्था आने वाली थी उसने हमसे पूछा कि कितने यूनिट रक्त मिल सकेगा | हम लोगों ने बताया कि कम से कम १०० यूनिट तो मिलेगा ही लेकिन उनको शायद अपने पूर्व अनुभवों के चलते इसपर भरोसा नहीं हुआ |
खैर कार्यक्रम का दिन आ गया , एक टीम बनारस जाकर मुख्य अतिथि और उनके साथियों को लेकर आई | सभी अतिथियों के लिए शाल और नटराज की मूर्ति भेंट स्वरुप मंगाई गयी थी | नियत समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ और कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा हुआ था | सबसे पहले मैंने ही रक्तदान की इच्छा जाहिर की थी लेकिन उससे पहले ही तमाम लोगों में होड़ लग गयी थी रक्त देने के लिए | जब तक मैं पहुंचु , लगभग ५० लोग रक्त दे चुके थे और मेरे बाद भी काफी लम्बी कतार थी | रक्त लेने वाली संस्था ने सिर्फ ६० यूनिट के लिए ही व्यवस्था की थी जिसके चलते तमाम लोग रक्त देने से वंचित रह गए | आंचलिक कार्यालय से आये हुए लोग दंग थे कि ऐसा आयोजन भी हो सकता है | मुख्य अतिथि भी भावुक हो गए और बोले कि मैं कई कार्यक्रमों में जाता हूँ लेकिन ऐसा कार्यक्रम मैंने आज तक नहीं देखा था जहाँ हर आदमी दिल से जुड़ा हो | मीडिया के लोग भी थे और अगले दिन तमाम समाचार पत्रों में इस कार्यक्रम की खबर प्रमुखता से छपी थी | मैंने जब स्थानीय लोगों को धन्यवाद देना चाहा तो उन्होंने ये कह कर मेरा मुह बंद करा दिया कि आप लोग अगर बैंकर होकर समाज के लिए इतना सोच सकते हैं तो क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि हम लोग इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें | एक ऐसे वर्ष की शुरुआत हो चुकी थी जिस वर्ष में हम लोगों ने न सिर्फ तमाम सामाजिक कार्यक्रम किये , बल्कि आतंकवाद के खिलाफ एक सर्व धर्म की गोष्ठी भी आयोजित की, जिसके बारे में विस्तार से फिर कभी | 

No comments:

Post a Comment