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Wednesday, August 31, 2016

भावनाओं की विरासत--लघुकथा

गुस्से से उबलता हुआ वो घर आया और कुर्सी पर धंस गया| कितनी बार समझाया है पिताजी को लेकिन सुनते ही नहीं मेरी बात, बस यही चल रहा था उसके मन में| माँ ने कमरे में कदम रखा और उसका चेहरा देखते ही समझ गयी|
"मैंने कहा था ना कि मत जा वहाँ, तेरे पिता अब इस उम्र में क्या समझेंगे", माँ ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए प्यार से कहा|
"लेकिन मैंने गलत क्या कहा माँ, आखिर इस दिन के लिए ही तो उन्होंने इतनो मेहनत की थी| आखिर क्यों नहीं छोड़ते पिताजी हवेली जाना, अपने दिन अब पहले जैसे तो नहीं रहे", उसका गुस्सा ठंडा होने का नाम ही नहीं ले रहा था|
"अच्छा ठीक है, आने दो उनको, एक बार फिर समझाते हैं", माँ ने उसे शांत करने की कोशिश की|
"इस बार तो उनको लेकर ही जाऊंगा, पता नहीं क्यों वो अपने पुरखों की ये विरासत ढो रहे हैं| अब राजे राजवाड़े नहीं रहे माँ कि उनकी चाकरी करनी ही पड़े", स्टूल पर रखे पानी के गिलास को उसने एक घूंट में ही खाली कर दिया|
कमरे में घुसते हुए पिताजी ने उसके शब्द सुन लिए और इशारों में उन्होंने माँ को चुप रहने के लिए बोला| वो भी उनको देखकर खड़ा हो गया और कुछ कहता, उसके पहले ही वो बोल पड़े "कुछ दिन की ही तो बात है, फिर जहाँ कहेगा चले चलेंगे तेरे साथ| बड़े ठाकुर अब बिस्तर पकड़ चुके हैं और जब तो वो हैं, तब तक ही मैं यहाँ हूँ"|
"लेकिन पिताजी, उनके पास तो उनका परिवार भी है, फिर क्या जरुरत है आपको रुकने की", उसके सवालों को अभी भी जवाब नहीं मिल पाया था|
"हां उनका परिवार हैं उनके साथ, लेकिन मुझे भी अपने बुजुर्गों से एक चीज विरासत में मिली है| जिस व्यक्ति ने आपकी मदद गाढ़े वक़्त में की हो, उसका साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए", पिताजी ने उसको प्यार से समझाया|
"मदद, अरे उनके बेटे ने तो आपकी अधिकतर जमीनें भी हड़प लीं| मदद के नाम पर धोखा दिया है उन लोगों ने और आप आज भी उनके दरवाजे पर बैठे रहते हैं", उसने अपना धैर्य खो सा दिया|
"हाँ, ठीक कह रहे हो, उनके बेटे ने ही तो हड़पी जमीनें", पिताजी की आवाज़ जैसे बहुत दूर से आती लगी उसको| एक झटका सा लगा उसको, बड़े ठाकुर के बेटे ने अपने पिताजी के भावनाओं की बलि चढ़ाई और वो अब अपने पिताजी की भावनाओं की बलि!
"माँ, मैं कल जा रहा हूँ, आता जाता रहूँगा आप लोगों के पास" कहकर उसने एक बार पिताजी की तरफ देखा| अब पिताजी के चहरे पर एक सुकून फैला दिख रहा था उसको| 

Tuesday, August 30, 2016

नए उजाले--लघुकथा

"डॉक्टर साहब, जल्दी आईये, मेरी बिटिया कुछ बोल रही है| मैंने कहा था ना कि एक दिन वो बोलेगी" बदहवास सी वो चिल्ला रही थी| वार्ड में चारो तरफ फैले सन्नाटे को उसकी आवाज़ ने जैसे चीर के रख दिया| एक दूसरे छोर पर पड़े उस मरीज ने उसकी तरफ देखा और उठ कर आने लगा| सरकारी हस्पताल में उस समय न तो कोई डॉक्टर था और न ही कोई कंपाउंडर, बस वो थी अपने बच्ची के साथ और दूसरे कोने का वो बूढ़ा मरीज, जिसकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था| पिछले पंद्रह दिन से वो अपनी बच्ची के साथ पड़ी हुई थी कि एकदिन वो ठीक हो जाएगी और अपने घर जाएगी|
"क्यों चिल्ला रही है, इस समय कहाँ है डॉक्टरहस्पताल में| थोड़ा सा पानी पिला इसे और उठा के बैठा दे, कल सुबह जब डॉक्टर आएंगे तो देखेंगे", कहते हुए बूढ़े ने उसकी बेटी को सहारा देकर बैठाया और पानी पिलाने में मदद करने लगा|
"कल तो इसके बापू भी आएंगे और देख कर खुश हो जायेंगे", बस वो कुछ न कुछ बोलते जा रही थी और उसकी आँख से आंसू लगातार गिर रहे थे|
"पिछले १५ दिन से तू यही रट रही है कि इसके बापू आएंगे, अब मान भी ले कि न तो तुम्हारे लिए कोई आयेगा और न ही मेरे लिए", बूढ़े के चेहरे पर समय भी अपनी स्याह परछाई की तरह मौजूद था|
उसने कुछ भी सुना नहीं और बेटी को सहलाते हुए उससे बात करती रही| समय अपनी रफ़्तार से ढल रहा था, उन बूढी आँखों को शायद भविष्य दिख रहा था| लेकिन उसकी चमकती आँखों में उम्मीद के कुछ नए उजाले तैर रहे थे|

Wednesday, August 24, 2016

भरोसा--लघुकथा

बेटे को पुलिस की जीप में जाते देख उनकी ऑंखें भर गयीं लेकिन उसके सामने जाहिर नहीं होने दिया| पड़ोसी जमा हो गए थे उनके घर के सामने, आखिर पुलिस की गाड़ी आयी थी| उत्सुकता सबको थी कि बात क्या है लेकिन कोई पूछ नहीं पा रहा था| गाड़ी जाने के बाद वो घर के बाहर रखी कुर्सी पर अधलेटे हो गए और मन को हल्का करने का प्रयास करने लगे|
"बेटे को पुलिस क्यों ले गयी भाईजान", पड़ोसी रज्जन की आवाज़ पर उन्होंने आँख खोली| खड़े होते समय उन्होंने रज्जन का हाथ पकड़ लिया और फीकी हंसी चेहरे पर लाते हुए बोले "दरअसल वो रास्ता भटक गया था और मुझे यही उचित लगा कि वो अपनी गलती की सजा भुगत कर एक नेक इंसान बने"|
रज्जन भौचक्का रह गए, एकदम से उनके मुंह से निकला "ये क्या कर दिया आपने, आपको पता नहीं है कि पुलिस द्वारा क्या सलूक होता है हमारे बच्चों के साथ| आपने खुद बुलाया पुलिस को, अगर उन्होंने कुछ कर दिया तो? वाक़्य पूरा नहीं कर पाए रज्जन|
"मुझे जितना भरोसा अपने बेटे पर है, उतना ही अपने देश की न्याय व्यवस्था पर| कभी कभी कुछ गलत तो सबसे हो जाता है, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हम उम्मीद ही खो बैठें", उन्होंने रज्जन के हाथ को हौले से दबा दिया|
रज्जन ने उनको गले लगा लिया, दोनों ही एक दूसरे को दिलासा दे रहे थे कि उनका भरोसा बरक़रार रहे|

Thursday, August 18, 2016

तोहफा--लघुकथा

"एक घंटे में पहुँच जाऊंगा छोटी, थोड़ा और इंज़ार कर ले", भैया का फोन आया तो वो दुगुने उत्साह से तैयारी में जुट गयी| घर तो पहले ही साफ़ कर चुकी थी, एक बार फिर उसने ड्राइंग रूम का सोफा झाड़ दिया| एक थाली में राखी और कुछ मिठाइयाँ भी उसने रख ली थी और तिलक के लिए चावल और हल्दी भी|
"कितनी बार सब ठीक करोगी, सब ठीक है| पांच मिनट भी नहीं रुकेंगे भैया यहाँ, बहुत फ़र्क़ है उनके और हमारे स्तर में", ऋषभ ने चुटकी ली|
"शादी के बाद की पहली राखी है और मैं तो बहुत खुश हूँ| शादी में तो हमने कुछ भी नहीं लिया, लेकिन इस रक्षाबंधन में बहुत बड़ा तोहफा लेने वाली हूँ और तुम भी ऐतराज़ नहीं करोगे", उसके चेहरे पर भेदभरी मुस्कान थी|
"मैं तो सिर्फ ये सोच रहा हूँ कि जो फैसला हमने लिया था, कहीं तुम अफ़सोस तो नहीं करने लगी उसपर", ऋषभ ने प्यार से कहा|
"लगता है आ गए भैया" कहकर वो दरवाजे की ओर लपकी| दरवाज़ा खुलते ही सामने भैया के साथ ननद को देखकर उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा| उसने लपक कर ननद को गले से लगा लिया, ऋषभ भौचक्का ये सब देख रहा था|
"मैंने पहले ही दो राखी ले रखी थी, लेकिन मुझे नहीं भरोसा नहीं था कि दूसरी राखी ये बांधेंगी", उसकी आँखों से बेतहाशा ख़ुशी झलक रही थी|
सालों से नाराज़ ननद ऋषभ को राखी बांध रही थी, खुशियाँ उसके चेहरे पर दिख रही थी| आज पहली बार उसने भैया से कुछ भी लेने से मना कर दिया, आखिर इतना बड़ा तोहफा जो मिल गया था| 

Wednesday, August 17, 2016

अपराधबोध--लघुकथा

"मैं जा रही हूँ घर छोड़कर, मुझे रोकना मत", फोन पर रितू को ये कहते सुनकर सलिल चौंक गया|
"क्या हुआ, मैंने तो सब कुछ भुला दिया है, तुम भी क्यूँ नहीं भूल जाती सब कुछ", उसने तुरंत पूछा|
"वही तो नहीं कर पा रही हूँ, मैं इंसान हूँ, तुम्हारी तरह देवता नहीं", बोलते बोलते वो सुबकने लगी|
"मैं आ रहा हूँ, एक बार मिलने के बाद बेशक चली जाना, मैं रोकूंगा नहीं", कहते हुए उसने फोन रख दिया और ऑफिस से निकल कर घर चल पड़ा| घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला हुआ ही था, वो अंदर कमरे में पहुँचा, रितू अपना ब्रीफकेस तैयार करके बैठी थी|
"मैंने कुछ गलत कह दिया क्या तुमसे, आजकल काम के तनाव में परेशान रहता हूँ रितू| मन से निकाल दो सब कुछ और फिर से नए सिरे से शुरू करो जिंदगी" सलिल ने उसका हाथ पकड़ लिया|
एकदम से रितू फूट फूट कर रोने लगी और उसने सलिल का हाथ झटक दिया| "तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं मुझे, आखिर जो गलती मैंने की है, उसके लिए अगर तुमने मुझे मारा होता, एक बार धक्के मार के घर से निकाल दिया होता, तो शायद मेरा अपराधबोध कुछ कम हुआ होता| अब तुम्हारा सामना करने की हिम्मत मुझमे नहीं है, मुझे प्लीज आज़ाद कर दो", कहते हुए रितू उठी और ब्रीफकेस उठाकर चलने लगी|
"अच्छा, सिर्फ इतना बता दो, अगर ये गलती मुझसे हुई होती तो क्या तुम मुझे माफ़ नहीं करती| तुम जरूर करती रितू, तो फिर मैंने किया तो इसमें परेशानी कैसी| असली आज़ादी तो एक दूसरे को पूरा स्पेस देने में है, पूरी तरह से स्वीकार करने में है, मत जाओ प्लीज", सलिल ने उसका ब्रीफकेस लेकर रख दिया| सलिल के आगोश में रितू की हिचकियाँ कम होने लगीं, अपराधबोध आँसुओं के जरिये निकल रहा था|   

Sunday, August 14, 2016

अट्टहास--लघुकथा

"बाबा, देखो तो वो टापू तो डूब जायेगा, अपनी नाव ले जाकर बचा लो ना उनको", बेटी एकदम दौड़ते हुए आयी|
"हाँ बेटा, जरूर जाऊंगा उनको बचाने| इस बार तो वो मना नहीं कर पाएंगे हमारे साथ चलने के लिए", नाव खोलते हुए रग्घू बोला| नाव उस उफनते हुए पानी में हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ी और पुरानी बातें रग्घू के दिमाग में हिचकोले खाने लगीं|
वह गाँव का सबसे संपन्न और एकलौता ऊँची जाति का परिवार था| अब सबको तो गाँव से निकाल नहीं सकता था तो खुद ही अपने आपको एक अलग टापू पर बसा लिया उन लोगों ने| उनके खेतों में रग्घू और उसके बस्ती के तमाम लोग काम करते और जो मिलता उससे अपना गुजर बसर करते|
"सोच भी लिया कैसे तुमने कि हम लोग आएंगे तुम्हारे घर शादी में", रग्घू को याद आया किस तरह दुत्कार के भगा दिया था उसे जब वो उनको बेटी की शादी में अपने यहाँ बुलाने गया था|
"तुम्हारे घर आएंगे हम लोग, सोच कैसे लिया तुमने, और आगे कभी भूलना मत इसे" और उसके बाद उनका गूंजता हुआ अट्टहास आज भी उसके जेहन में ताज़ा था|
नाव टापू के किनारे पहुँच गयी और उसे देखते ही उनका परिवार घबराया हुआ बाहर आया और नाव पर आकर बैठने लगा| नाव पर चढ़ने के लिए जैसे ही उन्होंने रग्घू का हाथ पकड़ा, रग्घू ने अचानक जोर जोर से हँसना शुरू कर दिया और धीरे धीरे उसकी हँसी अट्टहास में बदलने लगी| नाव नदी के उफनते पानी में आगे बढ़ रही थी और रग्घू के अट्टहास के साथ साथ बादल इकट्ठे होकर भयानक रूप से बरसने लगे थे|  

Friday, August 12, 2016

बेबसी-- लघुकथा

"बता जल्दी, कहाँ छुपा रखा है कमांडर को तुम लोगों ने", नशे में धुत्त और गुस्से के कांपते हुए दरोगा ने कस के एक लाठी मारी| मरियल सा आधी हड्डी का रग्घू लाठी पड़ते ही बाप बाप चिल्लाते हुए जमीन पर लेट गया| पीठ पर जहाँ लाठी पड़ी थी, वहां जैसे आग लग गयी थी उसके, लेकिन अब इतनी हिम्मत भी नहीं बची थी कि वो उठ पाए|
"साला, नाटक करता है, बहुत मोटी चमड़ी है इन सभो की, ऐसे नहीं बताएगा" कहते हुए दरोगा ने एक बार फिर लाठी उठायी| रग्घू जमीन पर पड़े पड़े फटी आँखों से देख रहा था, उसने अपने हाथ ऊपर उठा दिए| तब तक बगल में खड़े हवलदार ने लाठी पकड़ ली|
"अरे साहब, मर जायेगा ये, देखते नहीं, जान नहीं है इसके शरीर में", लाठी लेते हुए उसने कहा|
"ये सब इतनी जल्दी कहाँ मरते हैं| ठीक है अब तुम पूछो इससे, अगर फिर भी मुंह नहीं खोला तो और ढुकाई करता हूँ इसकी" कहते हुए दरोगा अपने कमरे की ओर बढ़ा| कुर्सी पर बैठकर उसने टांग मेज पर रखा और दारू की बोतल गटकने लगा|
हवलदार भी उसी तरफ का था और उसको थोड़ी हमदर्दी भी थी उन लोगों से| उसने रग्घू को उठाया और पानी का बोतल उसकी ओर बढ़ा दिया| रग्घू के हाथ कांप रहे थे, बोतल गिर पड़ी, जल्दी से उसने उठाया और थोड़ा पानी अंदर धकेला|
"देख रग्घू, ये दरोगा बिलकुल जानवर है, अगर जानता है तो बता दे, वर्ना मार डालेगा तुझको", हवलदार ने समझाते हुए कहा|
"अरे साहब, हमको तो इ भी नहीं मालूम कि इ कमांडर क्या है और कौन है| हमें तो किसी तरह अपना पेट भरने को मिल जाए, बस यही में दिन रात बीतता है| पिछले साल अपना लड़का भी गँवा बैठे थे जंगल में, आप ही बचा सकत हो हमको,", कहते कहते रग्घू फूट फूट कर रोने लगा|
"अच्छा, वो तुम्हारा लड़का था जिसे उन लोगों ने मार दिया था", हवलदार को याद आया| पुलिस का मुखबिर होने के संदेह में गिरोह के लोगों ने एक नौजवान को गोली मार दी थी|
"अब का बताएं साहब, उधर लड़का गवा पुलिस के साथ होये के सुबहा में और इधर पुलिस हमका मार डाली गिरोह के साथ होये के सुबहा में| अब तो जंगल के अंदर भी मरन है और बाहर भी, जियल ही मुश्किल है हम लोगन का", रग्घू सिसकते हुए लेट गया जमीन पर|
हवलदार सन्न हो गया, उसने एक बार फिर उठाया रग्घू को और दीवार से सहारा देकर बैठा दिया|
"मैं बात करता हूँ दरोगा से, शायद मान जाये, नहीं तो तुम्हारी किस्मत", बुझे मन से बोलता हुआ वो दरोगा के कमरे की तरफ बढ़ा| उसने अंदर झाँका, दरोगा दारू की बोतल खाली करके कुर्सी पर ही लुढ़क गया था|
थके क़दमों से वो बाहर निकला और जाकर चबूतरे पर बैठ गया| चारो तरफ अँधेरा सांय सांय कर रहा था, उसने अपनी कमीज उतारी और बगल में रख दिया| अचानक उसके मुह से अपनी बेबसी पर जोर की रुलाई फूट पड़ी, उसके दिमाग में अंदर पड़ा मरियल रग्घू घूम रहा था जिसे बचा पाने का हौसला वो खोता जा रहा था|   

Wednesday, August 10, 2016

अँधेरे-- लघुकथा

स्ट्रीट लाइट की मटमैली रौशनी में उसे दूर से दिख रहीं थी दो औरतें| अँधेरा फ़ैल रहा था और शायद उनके जिंदगी में फैले अंधेरों को कम करने का समय भी हो रहा था| अभी वो उनसे थोड़ी दूर थी लेकिन रास्ता वही था जो उनके पास से ही गुजरता था| उनकी भड़कीली पोशाक उस अँधेरे को चीर रही थी और हाव भाव बता रहे थे कि वो वहाँ अपने धंधे के निमित्त खड़ी थीं| उसे एक वितृष्णा सी हुई उनको देखकर और साथ ही साथ अपने आप पर थोड़ा अभिमान भी हुअा|
नजदीक पहुँचते पहुँचते उसके चेहरे के अभिमान का भाव थोड़ा और गहरा हो गया| उनके सामने पहुँच कर वो थोड़ी ठिठकी, लेकिन उन औरतों ने उसे देखकर अनदेखा कर दिया| उसके कदम रुक गए और वो उनकी तरफ पलटी, एक बार तो वो दोनों भी चौंक गयीं, लेकिन उनको लगा कि कोई पत्रकार होगा तो एक ने उचटती नज़र डालते हुए कहा "अभी अपना धंधे का टाइम है, किसी और समय पूछ लेना जो पूछना हो"|
"धंधे के लिए ये सब करते हुए शर्म नहीं आती तुमको, पूरी नारी जाति को बदनाम कर रखा है", उसके चेहरे पर गुरुर चमक रहा था|
"माथा मत ख़राब कर हमारा, सब पता है कितनी इज़्ज़त से रहती हो तुम लोग", बस इतना ही बोल कर वो दोनों फिर से सड़क पर देखने लगी| दोनों व्यर्थ के बहस में अपना ग्राहक नहीं खोना चाहती थीं|
उसे खटक गया, अरे खुद तो बेगैरत हैं और मुझे इज़्ज़त का पाठ पढ़ा रही है "एक तो गलत काम करती हो और दूसरे समझाने पर उल्टा बोलती हो, तुम सब क्या जानों इज़्ज़त क्या होती है"| इतना बोल कर उसे थोड़ी तसल्ली मिली और उनकी तरफ हिकारत की नज़र डाल कर वो आगे बढ़ने लगी|
"रुको तो, बताते हैं इज़्ज़त क्या होती है| हम अगर लोगों के साथ सोती हैं तो ये हमारा पेशा है और हमारी मर्ज़ी भी होती है, लेकिन तुम तो बिना मर्जी के भी रोज सोती हो| तुम्हारे और हमारे में बस फ़र्क़ इतना ही है कि हम अलग अलग लोगों के साथ सोती हैं, और तुम सिर्फ एक के साथ| हमारे साथ जबरदस्ती होती है पेशे में आने के समय लेकिन जबरदस्ती तो तुम्हारे साथ भी होती है"|
बेहद चुभती बात कह दी थी उसने, अपनी मर्ज़ी न भी हो तो क्या, सोना तो पड़ता ही है, फ़र्क़ कहाँ है|
उसने अपने कदम आगे बढ़ा दिए, चेहरे पर चमक रहा गुरुर अब कम हो गया था| सामने सड़क पर रौशनी बढ़ गयी थी लेकिन उसके मन में अंधियारा कुछ बढ़ गया था| 

जानवर--लघुकथा

"बाबू साहब, इ तो हमार काम है, आप तो जानत हो", जोखू हैरान हाथ जोड़े खड़ा था| हमेशा की तरह उसने उस मरे हुए जानवर की खाल उतारी थी और उसे घर पर सुखा रहा था, कि गाँव के चौकीदार ने आकर उसको बताया "थाने से तुम्हरे नाम का कुछ आया है, जाके बाबू साहब से मिल लो, नहीं तो !", आगे के शब्द वो नहीं सुन पाया| उल्टे पैर भागा और बाबू साहब के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया|
"उ सब तो ठीक है लेकिन थाने में तो किसी ने खबर कर दी है कि तुमने कोई गलत जानवर काट डाला है", बाबू साहब ने पान चबाते हुए कहा|
"चाहे जिसका कसम दिला दो साहब, हम तो बस मरल जानवर का ही खाल उतारत हैं, आप बचा लो हमको", कहते हुए जोखू की निगाह में पिछले महीने का दृश्य घूम गया| बगल के गाँव में चोरी हुई थी और शक़ में उसके टोले के एक लड़के को उसके घर से जानवरों की तरह पीटते हुए पुलिस ले गयी थी| वापस तो आ गया था वो लड़का, लेकिन दिमागी संतुलन खो बैठा था|
"ठीक है, एक काम करो, उ खाल हमारे यहाँ पहुँचा दो और ५०० का इंतज़ाम कर दो| हम पुलिस को संभाल लेंगे, बस आगे से हमको बताकर ही इ काम करना" बाबू साहब ने उसको जाने का इशारा किया|
५०० रुपया सुनते ही जोखू के होश फाख्ता हो गए, कहाँ से लाएगा इतने पैसे| "बाबू साहब, दो बखत की रोटी भारी है, कहाँ से लाएंगे एतने पैसे", जोखू से आगे कुछ कहते नहीं बना, बस हाथ जोड़ के खड़ा रहा|
"अबे, पुलिस को संभालना कोई आसान है क्या, नहीं दे सकते तो झेलना उनको", बाबू साहब ने एक भद्दी सी गाली दी|
"आप ही माई बाप हो, कुछ करो साहब" जोखू के आँखों के सामने अँधेरा छा गया| आगे बढ़कर उसने जैसे ही बाबू साहब के पैर छूने चाहे, बाबू साहब चिल्लाये "अच्छा ठीक है, दूर रहो| एक काम करना, कुछ दिन खेत में काम कर लेना, पैसा का इंतज़ाम हम कर देंगे"|
जोखू हाथ जोड़े दुहाई देता घर की ओर भागा, इधर बाबू साहब बगल में खड़े चमड़े के आसामी को मुस्कुराते हुए समझा रहे थे "देखो चमड़ा अच्छा है, रेट ठीक लगाना तो आगे भी मिलता रहेगा"|
जोखू चमड़े को कंधे पर लादे कांपते हुए बाबू साहब की घर की ओर आ रहा था, व्यापारी हिसाब जोड़ने में लगा हुआ था| बाबू साहब ने आंख मूदे हुए एक और गिलौरी मुंह में दबा ली थी|       

Monday, August 8, 2016

मजबूत रिश्ते--लघुकथा

नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी, दिमाग में घूम फिर कर शाम की बात ही आ रही थी| आखिर गलत क्या कहा था अब्दुल ने, सबके अपने अपने विचार हैं| आख़िरकार चौबे बिस्तर से उठे और कुरता बदन पर डाल कर बाहर निकले| अगली गली में ही अब्दुल का घर था, रात काफी हो गयी थी और स्ट्रीटलाइट की पीली रौशनी में कुछ कुत्ते सड़क के किनारे अधलेटे थे|
"तुम्हारी अपनी भावनाएं है चौबे, मैं उसका पूरा सम्मान भी करता हूँ, लेकिन इसके चलते तुम्हारी गलत बात को भी मैं सही कैसे ठहरा दूँ", अब्दुल ने उनको समझाते हुए कहा था|
"देखो अब्दुल, तुम क्या समझो इसका महत्व| तुम्हारे धर्म में तो इसके खाने पर भी कोई आपत्ति नहीं है, उलटे सारे कसाई तो तुम्हारे कौम के ही हैं", उनका पारा चढ़ गया था| अब्दुल तो उनको सिर्फ समझाने की कोशिश कर रहा था कि इन संवेदनशील मुद्दों पर हमें इन नेताओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए|
"ठीक है, चलो मान ली तुम्हारी बात| लेकिन अगर यही बात होती तो देश के सारे बूचड़खाने एक ही कौम चला रही होती, पता लगा लेना| और अपनी माँ को भी तो उसका सही दर्जा दो"|
तमतमाये हुए चौबे पार्क से निकल गए, पहले भी कई बार हल्की फुल्की बहस हुई थी लेकिन इस तरह की नौबत नहीं आयी थी| अनजाने में ही अब्दुल ने तीखा कटाक्ष कर दिया था, माँ का कितना ध्यान रखते थे ये उनको पता था| घर आकर नेट खंगाला और वास्तविकता उनका मखौल उड़ा रही थी|
अब्दुल ने दरवाज़ा खोला और सामने चौबे को पाकर सीने से भींच लिया| गिले शिकवे बह निकले और अब्दुल ने उन्हें बैठाते हुए कहा "यार चौबे, नींद तो मुझे भी नहीं आ रही थी"| 

Friday, August 5, 2016

खूंटा--लघुकथा

एकदम से खूंटे से बंधी गइया छटपटाने लगी, लगा खूंटा उखाड़ लेगी| अँधेरा छाने लगा था, रग्घू तुरंत खटिया से उठा और गाय की तरफ बढ़ा| उसने सोचा मच्छर ने काटा होगा, उसको सहला दे| पास बैठी लक्ष्मी भी सोच में पड़ गयी कि क्या हो गया गइया को| वो भी उठने जा रही थी कि उसकी नज़र पड़ी दूर से आते बछड़े पर| उसके लाख मना करने पर भी हफ्ते भर पहले ही हाँक दिया था रग्घू ने उसको, आखिर बछड़ा था, किसी काम का नहीं था|
रग्घू देखे जा रहा था, कितने प्यार से चाट रही थी गइया अपने बछड़े को| उसने लक्ष्मी की ओर देखा, उसकी आँख भर आयी थी| उसे याद आया, आज एक हफ्ता हो गया था बेटे को गए और उसने कोई फोन तक नहीं किया था| बहू को यहाँ आना पसंद नहीं था और इस बार साफ़ कह दिया था उसने कि यहाँ वापस नहीं आएगी|
रग्घू ने गइया के बगल वाला छोटा नाँद साफ़ किया और उसमे थोड़ा हरा चारा डाल दिया| फिर वो लौट कर खटिया पर आया और लक्ष्मी का हाथ पकड़ कर बोला "अब नहीं भगाएंगे बछड़े को, गइया कितनी खुश है आज"| लक्ष्मी ने एक बार उसकी ओर देखा और जाकर बछड़े का चेहरा सहलाने लगी| आँसू के दो बूँद उसकी आँखों से बछड़े के चेहरे पर टपक गए और उसके आँसुओं में मिल गए| 

इंसान--लघुकथा

"अरे तुम रो रहे हो, बस इतनी सी बात पर| पहले वाले मास्टर तो कितना मारते भी थे लेकिन तुम तो कभी नहीं रोये", रग्घू उसको बहुत अचरज से देख रहा था| 
उसने रग्घू की ओर देखा और अपने आंसू पोंछ लिए| आज नए मास्टर ने उसको बहुत तेज डांटा था और कहा था कि अगर पढ़ने लिखने में सुधार नहीं किये तो कोई जरुरत नहीं है स्कूल आने की| और फिर उसे बुलाकर अपने पास बैठाया और समझाया था उन्होंने| बहुत अजीब था यह उसके लिए, उसने तो यही सोचा था कि ये भी छड़ी निकाल कर पीटेंगे और भगा देंगे कक्षा से| 
"पता नहीं क्यों चले आते हैं ये सब पढ़ने, आखिर में तो वही करना है तो बाप दादा करते हैं", पिछले कुछ मास्टरों की कही बात उसके दिमाग में घूम रही थी| बाकी लड़के भी तो उसके साथ कहाँ रहते थे, एक रग्घू को छोड़कर| 
"तुम नहीं समझोगे यार, कम से कम नए मास्टर ने हमको इंसान तो समझा, ये उसी के आंसू हैं", कहना तो चाह रहा था लेकिन दिल में बहते हुए भावनाओं के सैलाब ने कहने नहीं दिया|

Tuesday, August 2, 2016

बँटवारा--लघुकथा

आज फिर लंबी चौड़ी बहस हुई थी उसकी घरवालों से, उनके अपने तर्क थे और उसके अपने| उसका पढ़ा लिखा मन इन चीजों को मानने से साफ़ इंकार कर देता था, लेकिन घरवालों का क्या करे| आज भी उसने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन बस एक ही चीज की रट लगाए थे घरवाले "बेटा, ये नियम हमने तो नहीं बनाये हैं, ये सदियों से चले आ रहे हैं| आखिर किसी वजह से ही तो बनाये गए होंगे ये नियम, तो कैसे भूल जाएँ ये सब"|
पिछली बार उसने चाय पिला दी थी तो वो कप अलग रख दिया गया था| उसने कितनी भी कोशिश कर ली, लेकिन वो कप अंदर नहीं रखा गया| ज्यादा कहने पर ये भी कहा गया कि देखो हम लोग उसका घर आना बर्दास्त कर लेते हैं, इतना क्या कम है| जब भी वो उस कप को देखता, उसके दिल में वो चुभ जाता|
इन्हीं सब उलझनों में उलझा हुआ वो निकल गया घर से और कुछ ही देर में वो अपने उसी दोस्त के घर के सामने खड़ा था| खटखटाने पर दरवाजा उसकी माँ ने खोला और उसे अंदर ले गयी| आज एक बार फिर उसने उसके घर को गौर से देखा, बहुत फ़र्क़ था उसके घर से| दोस्त कहीं गया हुआ था और उसकी माँ उसके लिए चाय बना रही थी| कुछ ही देर में उसने देखा, उसकी चाय का कप भी कहीं अलग रखा हुआ था| फ़र्क़ बस इतना था कि उसके घर वो चाय का कप बाहर रखा हुआ था और इस घर में ये कप बहुत संभाल कर अलमारी में रखा हुआ था|
वस्तुएँ भी सदियों से जातियों में बँटी हुई हैं, सोचते हुए वो चाय के घूंट ले रहा था| 

Monday, August 1, 2016

जलसा--लघुकथा

"अरे सुगिया, कहाँ चली गयी रे फिर से", माई लगातार आवाज़ दे रही थी सुगिया को लेकिन वो घर में नहीं थी| आजकल सुगिया जब भी थोड़ा शोरगुल सुनती, भाग कर बाहर निकल जाती| 
"आ जाएगी, देख लेने दे उसको थोड़ा ढोल ढमाका, कभी कभी तो होता है अपने गाँव में", कहते हुए बापू ने बीड़ी जला ली|
"अच्छा सुगिया के बापू, कल मैंने भी सुना था लौडस्पीकर पर बोलते हुए उ नेता को| कहत रहा कि इस बार जीता तो गाँव में बिजली भी आ जाएगी और सड़क भी बनेगी| केतना अच्छा होता ना अगर सड़क पहले से होती तो अपना रग्घू बच जाता", कहते हुए माई ने अपने आँखों में आये आंसू पोंछ लिए| 
"ई सब तो बस कहे वाली बात है, पिछली बार भी तो यही सब बोला था इ नेता लोग| हाँ अगर सड़क होती तो आज रग्घू ही क्यों, और भी कई बचवा सब बच गए होते", बापू भी गंभीर हो गया|
"अब अईसा है सुगिया के बापू, आप जाकर कह दो इनसे कि सड़क और बिजली नहीं आयी तो फिर वोट नहीं मिलेगा"|
"हाँ और स्कूल भी खुलवाना है अपने गाँव में", कहते हुए बापू बाहर निकल गया| उधर सुगिया इन सब बातों से बेखबर दूर चल रहे जलसे को ख़ुशी ख़ुशी देख रही थी|