Translate

Monday, August 1, 2016

जलसा--लघुकथा

"अरे सुगिया, कहाँ चली गयी रे फिर से", माई लगातार आवाज़ दे रही थी सुगिया को लेकिन वो घर में नहीं थी| आजकल सुगिया जब भी थोड़ा शोरगुल सुनती, भाग कर बाहर निकल जाती| 
"आ जाएगी, देख लेने दे उसको थोड़ा ढोल ढमाका, कभी कभी तो होता है अपने गाँव में", कहते हुए बापू ने बीड़ी जला ली|
"अच्छा सुगिया के बापू, कल मैंने भी सुना था लौडस्पीकर पर बोलते हुए उ नेता को| कहत रहा कि इस बार जीता तो गाँव में बिजली भी आ जाएगी और सड़क भी बनेगी| केतना अच्छा होता ना अगर सड़क पहले से होती तो अपना रग्घू बच जाता", कहते हुए माई ने अपने आँखों में आये आंसू पोंछ लिए| 
"ई सब तो बस कहे वाली बात है, पिछली बार भी तो यही सब बोला था इ नेता लोग| हाँ अगर सड़क होती तो आज रग्घू ही क्यों, और भी कई बचवा सब बच गए होते", बापू भी गंभीर हो गया|
"अब अईसा है सुगिया के बापू, आप जाकर कह दो इनसे कि सड़क और बिजली नहीं आयी तो फिर वोट नहीं मिलेगा"|
"हाँ और स्कूल भी खुलवाना है अपने गाँव में", कहते हुए बापू बाहर निकल गया| उधर सुगिया इन सब बातों से बेखबर दूर चल रहे जलसे को ख़ुशी ख़ुशी देख रही थी|

No comments:

Post a Comment