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Wednesday, August 17, 2016

अपराधबोध--लघुकथा

"मैं जा रही हूँ घर छोड़कर, मुझे रोकना मत", फोन पर रितू को ये कहते सुनकर सलिल चौंक गया|
"क्या हुआ, मैंने तो सब कुछ भुला दिया है, तुम भी क्यूँ नहीं भूल जाती सब कुछ", उसने तुरंत पूछा|
"वही तो नहीं कर पा रही हूँ, मैं इंसान हूँ, तुम्हारी तरह देवता नहीं", बोलते बोलते वो सुबकने लगी|
"मैं आ रहा हूँ, एक बार मिलने के बाद बेशक चली जाना, मैं रोकूंगा नहीं", कहते हुए उसने फोन रख दिया और ऑफिस से निकल कर घर चल पड़ा| घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला हुआ ही था, वो अंदर कमरे में पहुँचा, रितू अपना ब्रीफकेस तैयार करके बैठी थी|
"मैंने कुछ गलत कह दिया क्या तुमसे, आजकल काम के तनाव में परेशान रहता हूँ रितू| मन से निकाल दो सब कुछ और फिर से नए सिरे से शुरू करो जिंदगी" सलिल ने उसका हाथ पकड़ लिया|
एकदम से रितू फूट फूट कर रोने लगी और उसने सलिल का हाथ झटक दिया| "तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं मुझे, आखिर जो गलती मैंने की है, उसके लिए अगर तुमने मुझे मारा होता, एक बार धक्के मार के घर से निकाल दिया होता, तो शायद मेरा अपराधबोध कुछ कम हुआ होता| अब तुम्हारा सामना करने की हिम्मत मुझमे नहीं है, मुझे प्लीज आज़ाद कर दो", कहते हुए रितू उठी और ब्रीफकेस उठाकर चलने लगी|
"अच्छा, सिर्फ इतना बता दो, अगर ये गलती मुझसे हुई होती तो क्या तुम मुझे माफ़ नहीं करती| तुम जरूर करती रितू, तो फिर मैंने किया तो इसमें परेशानी कैसी| असली आज़ादी तो एक दूसरे को पूरा स्पेस देने में है, पूरी तरह से स्वीकार करने में है, मत जाओ प्लीज", सलिल ने उसका ब्रीफकेस लेकर रख दिया| सलिल के आगोश में रितू की हिचकियाँ कम होने लगीं, अपराधबोध आँसुओं के जरिये निकल रहा था|   

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