आज फिर लंबी चौड़ी बहस हुई थी उसकी घरवालों से, उनके अपने तर्क थे और उसके अपने| उसका पढ़ा लिखा मन इन चीजों को मानने से साफ़ इंकार कर देता था, लेकिन घरवालों का क्या करे| आज भी उसने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन बस एक ही चीज की रट लगाए थे घरवाले "बेटा, ये नियम हमने तो नहीं बनाये हैं, ये सदियों से चले आ रहे हैं| आखिर किसी वजह से ही तो बनाये गए होंगे ये नियम, तो कैसे भूल जाएँ ये सब"|
पिछली बार उसने चाय पिला दी थी तो वो कप अलग रख दिया गया था| उसने कितनी भी कोशिश कर ली, लेकिन वो कप अंदर नहीं रखा गया| ज्यादा कहने पर ये भी कहा गया कि देखो हम लोग उसका घर आना बर्दास्त कर लेते हैं, इतना क्या कम है| जब भी वो उस कप को देखता, उसके दिल में वो चुभ जाता|
इन्हीं सब उलझनों में उलझा हुआ वो निकल गया घर से और कुछ ही देर में वो अपने उसी दोस्त के घर के सामने खड़ा था| खटखटाने पर दरवाजा उसकी माँ ने खोला और उसे अंदर ले गयी| आज एक बार फिर उसने उसके घर को गौर से देखा, बहुत फ़र्क़ था उसके घर से| दोस्त कहीं गया हुआ था और उसकी माँ उसके लिए चाय बना रही थी| कुछ ही देर में उसने देखा, उसकी चाय का कप भी कहीं अलग रखा हुआ था| फ़र्क़ बस इतना था कि उसके घर वो चाय का कप बाहर रखा हुआ था और इस घर में ये कप बहुत संभाल कर अलमारी में रखा हुआ था|
वस्तुएँ भी सदियों से जातियों में बँटी हुई हैं, सोचते हुए वो चाय के घूंट ले रहा था|
पिछली बार उसने चाय पिला दी थी तो वो कप अलग रख दिया गया था| उसने कितनी भी कोशिश कर ली, लेकिन वो कप अंदर नहीं रखा गया| ज्यादा कहने पर ये भी कहा गया कि देखो हम लोग उसका घर आना बर्दास्त कर लेते हैं, इतना क्या कम है| जब भी वो उस कप को देखता, उसके दिल में वो चुभ जाता|
इन्हीं सब उलझनों में उलझा हुआ वो निकल गया घर से और कुछ ही देर में वो अपने उसी दोस्त के घर के सामने खड़ा था| खटखटाने पर दरवाजा उसकी माँ ने खोला और उसे अंदर ले गयी| आज एक बार फिर उसने उसके घर को गौर से देखा, बहुत फ़र्क़ था उसके घर से| दोस्त कहीं गया हुआ था और उसकी माँ उसके लिए चाय बना रही थी| कुछ ही देर में उसने देखा, उसकी चाय का कप भी कहीं अलग रखा हुआ था| फ़र्क़ बस इतना था कि उसके घर वो चाय का कप बाहर रखा हुआ था और इस घर में ये कप बहुत संभाल कर अलमारी में रखा हुआ था|
वस्तुएँ भी सदियों से जातियों में बँटी हुई हैं, सोचते हुए वो चाय के घूंट ले रहा था|
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