Translate

Wednesday, August 10, 2016

जानवर--लघुकथा

"बाबू साहब, इ तो हमार काम है, आप तो जानत हो", जोखू हैरान हाथ जोड़े खड़ा था| हमेशा की तरह उसने उस मरे हुए जानवर की खाल उतारी थी और उसे घर पर सुखा रहा था, कि गाँव के चौकीदार ने आकर उसको बताया "थाने से तुम्हरे नाम का कुछ आया है, जाके बाबू साहब से मिल लो, नहीं तो !", आगे के शब्द वो नहीं सुन पाया| उल्टे पैर भागा और बाबू साहब के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया|
"उ सब तो ठीक है लेकिन थाने में तो किसी ने खबर कर दी है कि तुमने कोई गलत जानवर काट डाला है", बाबू साहब ने पान चबाते हुए कहा|
"चाहे जिसका कसम दिला दो साहब, हम तो बस मरल जानवर का ही खाल उतारत हैं, आप बचा लो हमको", कहते हुए जोखू की निगाह में पिछले महीने का दृश्य घूम गया| बगल के गाँव में चोरी हुई थी और शक़ में उसके टोले के एक लड़के को उसके घर से जानवरों की तरह पीटते हुए पुलिस ले गयी थी| वापस तो आ गया था वो लड़का, लेकिन दिमागी संतुलन खो बैठा था|
"ठीक है, एक काम करो, उ खाल हमारे यहाँ पहुँचा दो और ५०० का इंतज़ाम कर दो| हम पुलिस को संभाल लेंगे, बस आगे से हमको बताकर ही इ काम करना" बाबू साहब ने उसको जाने का इशारा किया|
५०० रुपया सुनते ही जोखू के होश फाख्ता हो गए, कहाँ से लाएगा इतने पैसे| "बाबू साहब, दो बखत की रोटी भारी है, कहाँ से लाएंगे एतने पैसे", जोखू से आगे कुछ कहते नहीं बना, बस हाथ जोड़ के खड़ा रहा|
"अबे, पुलिस को संभालना कोई आसान है क्या, नहीं दे सकते तो झेलना उनको", बाबू साहब ने एक भद्दी सी गाली दी|
"आप ही माई बाप हो, कुछ करो साहब" जोखू के आँखों के सामने अँधेरा छा गया| आगे बढ़कर उसने जैसे ही बाबू साहब के पैर छूने चाहे, बाबू साहब चिल्लाये "अच्छा ठीक है, दूर रहो| एक काम करना, कुछ दिन खेत में काम कर लेना, पैसा का इंतज़ाम हम कर देंगे"|
जोखू हाथ जोड़े दुहाई देता घर की ओर भागा, इधर बाबू साहब बगल में खड़े चमड़े के आसामी को मुस्कुराते हुए समझा रहे थे "देखो चमड़ा अच्छा है, रेट ठीक लगाना तो आगे भी मिलता रहेगा"|
जोखू चमड़े को कंधे पर लादे कांपते हुए बाबू साहब की घर की ओर आ रहा था, व्यापारी हिसाब जोड़ने में लगा हुआ था| बाबू साहब ने आंख मूदे हुए एक और गिलौरी मुंह में दबा ली थी|       

No comments:

Post a Comment