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Thursday, August 18, 2016

तोहफा--लघुकथा

"एक घंटे में पहुँच जाऊंगा छोटी, थोड़ा और इंज़ार कर ले", भैया का फोन आया तो वो दुगुने उत्साह से तैयारी में जुट गयी| घर तो पहले ही साफ़ कर चुकी थी, एक बार फिर उसने ड्राइंग रूम का सोफा झाड़ दिया| एक थाली में राखी और कुछ मिठाइयाँ भी उसने रख ली थी और तिलक के लिए चावल और हल्दी भी|
"कितनी बार सब ठीक करोगी, सब ठीक है| पांच मिनट भी नहीं रुकेंगे भैया यहाँ, बहुत फ़र्क़ है उनके और हमारे स्तर में", ऋषभ ने चुटकी ली|
"शादी के बाद की पहली राखी है और मैं तो बहुत खुश हूँ| शादी में तो हमने कुछ भी नहीं लिया, लेकिन इस रक्षाबंधन में बहुत बड़ा तोहफा लेने वाली हूँ और तुम भी ऐतराज़ नहीं करोगे", उसके चेहरे पर भेदभरी मुस्कान थी|
"मैं तो सिर्फ ये सोच रहा हूँ कि जो फैसला हमने लिया था, कहीं तुम अफ़सोस तो नहीं करने लगी उसपर", ऋषभ ने प्यार से कहा|
"लगता है आ गए भैया" कहकर वो दरवाजे की ओर लपकी| दरवाज़ा खुलते ही सामने भैया के साथ ननद को देखकर उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा| उसने लपक कर ननद को गले से लगा लिया, ऋषभ भौचक्का ये सब देख रहा था|
"मैंने पहले ही दो राखी ले रखी थी, लेकिन मुझे नहीं भरोसा नहीं था कि दूसरी राखी ये बांधेंगी", उसकी आँखों से बेतहाशा ख़ुशी झलक रही थी|
सालों से नाराज़ ननद ऋषभ को राखी बांध रही थी, खुशियाँ उसके चेहरे पर दिख रही थी| आज पहली बार उसने भैया से कुछ भी लेने से मना कर दिया, आखिर इतना बड़ा तोहफा जो मिल गया था| 

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