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Tuesday, August 30, 2016

नए उजाले--लघुकथा

"डॉक्टर साहब, जल्दी आईये, मेरी बिटिया कुछ बोल रही है| मैंने कहा था ना कि एक दिन वो बोलेगी" बदहवास सी वो चिल्ला रही थी| वार्ड में चारो तरफ फैले सन्नाटे को उसकी आवाज़ ने जैसे चीर के रख दिया| एक दूसरे छोर पर पड़े उस मरीज ने उसकी तरफ देखा और उठ कर आने लगा| सरकारी हस्पताल में उस समय न तो कोई डॉक्टर था और न ही कोई कंपाउंडर, बस वो थी अपने बच्ची के साथ और दूसरे कोने का वो बूढ़ा मरीज, जिसकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था| पिछले पंद्रह दिन से वो अपनी बच्ची के साथ पड़ी हुई थी कि एकदिन वो ठीक हो जाएगी और अपने घर जाएगी|
"क्यों चिल्ला रही है, इस समय कहाँ है डॉक्टरहस्पताल में| थोड़ा सा पानी पिला इसे और उठा के बैठा दे, कल सुबह जब डॉक्टर आएंगे तो देखेंगे", कहते हुए बूढ़े ने उसकी बेटी को सहारा देकर बैठाया और पानी पिलाने में मदद करने लगा|
"कल तो इसके बापू भी आएंगे और देख कर खुश हो जायेंगे", बस वो कुछ न कुछ बोलते जा रही थी और उसकी आँख से आंसू लगातार गिर रहे थे|
"पिछले १५ दिन से तू यही रट रही है कि इसके बापू आएंगे, अब मान भी ले कि न तो तुम्हारे लिए कोई आयेगा और न ही मेरे लिए", बूढ़े के चेहरे पर समय भी अपनी स्याह परछाई की तरह मौजूद था|
उसने कुछ भी सुना नहीं और बेटी को सहलाते हुए उससे बात करती रही| समय अपनी रफ़्तार से ढल रहा था, उन बूढी आँखों को शायद भविष्य दिख रहा था| लेकिन उसकी चमकती आँखों में उम्मीद के कुछ नए उजाले तैर रहे थे|

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