Translate

Monday, August 8, 2016

मजबूत रिश्ते--लघुकथा

नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी, दिमाग में घूम फिर कर शाम की बात ही आ रही थी| आखिर गलत क्या कहा था अब्दुल ने, सबके अपने अपने विचार हैं| आख़िरकार चौबे बिस्तर से उठे और कुरता बदन पर डाल कर बाहर निकले| अगली गली में ही अब्दुल का घर था, रात काफी हो गयी थी और स्ट्रीटलाइट की पीली रौशनी में कुछ कुत्ते सड़क के किनारे अधलेटे थे|
"तुम्हारी अपनी भावनाएं है चौबे, मैं उसका पूरा सम्मान भी करता हूँ, लेकिन इसके चलते तुम्हारी गलत बात को भी मैं सही कैसे ठहरा दूँ", अब्दुल ने उनको समझाते हुए कहा था|
"देखो अब्दुल, तुम क्या समझो इसका महत्व| तुम्हारे धर्म में तो इसके खाने पर भी कोई आपत्ति नहीं है, उलटे सारे कसाई तो तुम्हारे कौम के ही हैं", उनका पारा चढ़ गया था| अब्दुल तो उनको सिर्फ समझाने की कोशिश कर रहा था कि इन संवेदनशील मुद्दों पर हमें इन नेताओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए|
"ठीक है, चलो मान ली तुम्हारी बात| लेकिन अगर यही बात होती तो देश के सारे बूचड़खाने एक ही कौम चला रही होती, पता लगा लेना| और अपनी माँ को भी तो उसका सही दर्जा दो"|
तमतमाये हुए चौबे पार्क से निकल गए, पहले भी कई बार हल्की फुल्की बहस हुई थी लेकिन इस तरह की नौबत नहीं आयी थी| अनजाने में ही अब्दुल ने तीखा कटाक्ष कर दिया था, माँ का कितना ध्यान रखते थे ये उनको पता था| घर आकर नेट खंगाला और वास्तविकता उनका मखौल उड़ा रही थी|
अब्दुल ने दरवाज़ा खोला और सामने चौबे को पाकर सीने से भींच लिया| गिले शिकवे बह निकले और अब्दुल ने उन्हें बैठाते हुए कहा "यार चौबे, नींद तो मुझे भी नहीं आ रही थी"| 

No comments:

Post a Comment