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Wednesday, August 24, 2016

भरोसा--लघुकथा

बेटे को पुलिस की जीप में जाते देख उनकी ऑंखें भर गयीं लेकिन उसके सामने जाहिर नहीं होने दिया| पड़ोसी जमा हो गए थे उनके घर के सामने, आखिर पुलिस की गाड़ी आयी थी| उत्सुकता सबको थी कि बात क्या है लेकिन कोई पूछ नहीं पा रहा था| गाड़ी जाने के बाद वो घर के बाहर रखी कुर्सी पर अधलेटे हो गए और मन को हल्का करने का प्रयास करने लगे|
"बेटे को पुलिस क्यों ले गयी भाईजान", पड़ोसी रज्जन की आवाज़ पर उन्होंने आँख खोली| खड़े होते समय उन्होंने रज्जन का हाथ पकड़ लिया और फीकी हंसी चेहरे पर लाते हुए बोले "दरअसल वो रास्ता भटक गया था और मुझे यही उचित लगा कि वो अपनी गलती की सजा भुगत कर एक नेक इंसान बने"|
रज्जन भौचक्का रह गए, एकदम से उनके मुंह से निकला "ये क्या कर दिया आपने, आपको पता नहीं है कि पुलिस द्वारा क्या सलूक होता है हमारे बच्चों के साथ| आपने खुद बुलाया पुलिस को, अगर उन्होंने कुछ कर दिया तो? वाक़्य पूरा नहीं कर पाए रज्जन|
"मुझे जितना भरोसा अपने बेटे पर है, उतना ही अपने देश की न्याय व्यवस्था पर| कभी कभी कुछ गलत तो सबसे हो जाता है, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हम उम्मीद ही खो बैठें", उन्होंने रज्जन के हाथ को हौले से दबा दिया|
रज्जन ने उनको गले लगा लिया, दोनों ही एक दूसरे को दिलासा दे रहे थे कि उनका भरोसा बरक़रार रहे|

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