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Sunday, August 14, 2016

अट्टहास--लघुकथा

"बाबा, देखो तो वो टापू तो डूब जायेगा, अपनी नाव ले जाकर बचा लो ना उनको", बेटी एकदम दौड़ते हुए आयी|
"हाँ बेटा, जरूर जाऊंगा उनको बचाने| इस बार तो वो मना नहीं कर पाएंगे हमारे साथ चलने के लिए", नाव खोलते हुए रग्घू बोला| नाव उस उफनते हुए पानी में हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ी और पुरानी बातें रग्घू के दिमाग में हिचकोले खाने लगीं|
वह गाँव का सबसे संपन्न और एकलौता ऊँची जाति का परिवार था| अब सबको तो गाँव से निकाल नहीं सकता था तो खुद ही अपने आपको एक अलग टापू पर बसा लिया उन लोगों ने| उनके खेतों में रग्घू और उसके बस्ती के तमाम लोग काम करते और जो मिलता उससे अपना गुजर बसर करते|
"सोच भी लिया कैसे तुमने कि हम लोग आएंगे तुम्हारे घर शादी में", रग्घू को याद आया किस तरह दुत्कार के भगा दिया था उसे जब वो उनको बेटी की शादी में अपने यहाँ बुलाने गया था|
"तुम्हारे घर आएंगे हम लोग, सोच कैसे लिया तुमने, और आगे कभी भूलना मत इसे" और उसके बाद उनका गूंजता हुआ अट्टहास आज भी उसके जेहन में ताज़ा था|
नाव टापू के किनारे पहुँच गयी और उसे देखते ही उनका परिवार घबराया हुआ बाहर आया और नाव पर आकर बैठने लगा| नाव पर चढ़ने के लिए जैसे ही उन्होंने रग्घू का हाथ पकड़ा, रग्घू ने अचानक जोर जोर से हँसना शुरू कर दिया और धीरे धीरे उसकी हँसी अट्टहास में बदलने लगी| नाव नदी के उफनते पानी में आगे बढ़ रही थी और रग्घू के अट्टहास के साथ साथ बादल इकट्ठे होकर भयानक रूप से बरसने लगे थे|  

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