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Wednesday, August 10, 2016

अँधेरे-- लघुकथा

स्ट्रीट लाइट की मटमैली रौशनी में उसे दूर से दिख रहीं थी दो औरतें| अँधेरा फ़ैल रहा था और शायद उनके जिंदगी में फैले अंधेरों को कम करने का समय भी हो रहा था| अभी वो उनसे थोड़ी दूर थी लेकिन रास्ता वही था जो उनके पास से ही गुजरता था| उनकी भड़कीली पोशाक उस अँधेरे को चीर रही थी और हाव भाव बता रहे थे कि वो वहाँ अपने धंधे के निमित्त खड़ी थीं| उसे एक वितृष्णा सी हुई उनको देखकर और साथ ही साथ अपने आप पर थोड़ा अभिमान भी हुअा|
नजदीक पहुँचते पहुँचते उसके चेहरे के अभिमान का भाव थोड़ा और गहरा हो गया| उनके सामने पहुँच कर वो थोड़ी ठिठकी, लेकिन उन औरतों ने उसे देखकर अनदेखा कर दिया| उसके कदम रुक गए और वो उनकी तरफ पलटी, एक बार तो वो दोनों भी चौंक गयीं, लेकिन उनको लगा कि कोई पत्रकार होगा तो एक ने उचटती नज़र डालते हुए कहा "अभी अपना धंधे का टाइम है, किसी और समय पूछ लेना जो पूछना हो"|
"धंधे के लिए ये सब करते हुए शर्म नहीं आती तुमको, पूरी नारी जाति को बदनाम कर रखा है", उसके चेहरे पर गुरुर चमक रहा था|
"माथा मत ख़राब कर हमारा, सब पता है कितनी इज़्ज़त से रहती हो तुम लोग", बस इतना ही बोल कर वो दोनों फिर से सड़क पर देखने लगी| दोनों व्यर्थ के बहस में अपना ग्राहक नहीं खोना चाहती थीं|
उसे खटक गया, अरे खुद तो बेगैरत हैं और मुझे इज़्ज़त का पाठ पढ़ा रही है "एक तो गलत काम करती हो और दूसरे समझाने पर उल्टा बोलती हो, तुम सब क्या जानों इज़्ज़त क्या होती है"| इतना बोल कर उसे थोड़ी तसल्ली मिली और उनकी तरफ हिकारत की नज़र डाल कर वो आगे बढ़ने लगी|
"रुको तो, बताते हैं इज़्ज़त क्या होती है| हम अगर लोगों के साथ सोती हैं तो ये हमारा पेशा है और हमारी मर्ज़ी भी होती है, लेकिन तुम तो बिना मर्जी के भी रोज सोती हो| तुम्हारे और हमारे में बस फ़र्क़ इतना ही है कि हम अलग अलग लोगों के साथ सोती हैं, और तुम सिर्फ एक के साथ| हमारे साथ जबरदस्ती होती है पेशे में आने के समय लेकिन जबरदस्ती तो तुम्हारे साथ भी होती है"|
बेहद चुभती बात कह दी थी उसने, अपनी मर्ज़ी न भी हो तो क्या, सोना तो पड़ता ही है, फ़र्क़ कहाँ है|
उसने अपने कदम आगे बढ़ा दिए, चेहरे पर चमक रहा गुरुर अब कम हो गया था| सामने सड़क पर रौशनी बढ़ गयी थी लेकिन उसके मन में अंधियारा कुछ बढ़ गया था| 

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