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Thursday, June 26, 2014

भागीरथी

भागीरथ ने सोचा की क्यों न धरती पर चलकर गंगा को देखा जाये , वो गंगा जिसे वो कई वर्षों की तपस्या के बाद धरती पर लाये थे | वो सोच रहे थे की गंगा ने तो अब तक समस्त मानवों एवम अन्य प्राणियों का उद्धार कर दिया होगा | धरती पर पहुँच कर वो जिस नदी के किनारे पहुंचे , वो नदी तो बिलकुल नहीं थी | एक सूखी हुई नदी , या नाला कह लें तो बेहतर , गन्दगी से भरी हुई और बुरी तरह से प्रदूषित | उन्होंने कई बार अलग अलग लोगों से पूछ कर तस्दीक करने की कोशिश की , लेकिन हर बार उन्हें एक ही जवाब मिला कि यही गंगा है | वो बहुत दुखी और उदास हो गए |
चिंतित भागीरथ फिर से तपस्या करने चल दिए | अनेक वर्षों की अथक तपस्या के बाद एक बार फिर प्रभु प्रकट हुए और पूछा कि क्या चाहते हो | भागीरथ बोले कि हमारी गंगा नदी , जो कभी सबको जीवनदान देती थी , अब उसे ही जीवनदान की जरुरत है | किसी तरह उसे नया जीवन दीजिये प्रभु |
इतना सुनते ही प्रभु अदृश्य हो गए और थोड़ी देर में ही आकाशवाणी हुई कि हे भागीरथ , इस गंगा को जीवनदान देना तो असंभव जान पड़ता है | जब ये मानव खुद का ही विनाश करने पर तुल गया है तो इसे बचाना अत्यंत दुरूह प्रतीत होता है | अब तो तुम्हे एक बार फिर से गंगा को धरती पर ले जाना पड़ेगा , शायद इस बार वो जीवन दान दे सके इस सृष्टि के सभी प्राणियों को |

बदनसीब--

आज फिर शाम को चला गया था वो सुरेश के यहाँ| पता नहीं क्यों बड़ा अपनापन सा महसूस होता था उसे वहां पर| जब भी मन उदास होता, उसके पैर खुद ब खुद सुरेश के घर की तरफ चल पड़ते थे| 
क्या नहीं था उसके अपने घर में, ऐशो आराम के सब साधन मौजूद थे| पिता बहुत बड़े बिजनेसमैन थे लेकिन उनके पास कमी थी तो सिर्फ समय की| माँ बचपन में ही चल बसी थी, ऐसे में जब भी मन बहुत उदास हो जाता था तो वो सुरेश के यहाँ निकल जाता था|
जैसे ही वो सुरेश के घर के अंदर घुसा, उसे सुरेश के चिल्लाने की आवाज आई| वो अपनी माँ को बुरी तरह डाँट रहा था, लेकिन उसकी माँ खामोश थी और उसे देखते ही वो चुप हो गया|
" क्या बात है बेटा, आज बहुत दिन बाद आये, सब ठीक तो है न"|
" हाँ आँटी, सब ठीक है, बस बहुत दिनों से आप के हाथ का खाना नहीं खाया था तो सोचा की आज चल के खा लिया जाए"|
" क्यों नहीं बेटा, जरूर, बैठो तुम"| इतना कह कर वो किचेन में चली गयीं, कुछ देर पहले कुछ हुआ भी था ये उनके चेहरे पर नजर भी नहीं आ रहा था|
खाना खा कर वो वापस अपने घर पहुंचा और सोचने लगा कि वो कितना बड़ा बदनसीब है| लेकिन फिर उसे लगा कि उससे बड़ा बदनसीब तो सुरेश है जिसे माँ की कोई क़द्र ही नहीं है, क्योंकि उसे एहसास ही नहीं है कि माँ के नहीं होने का दर्द क्या होता है| 

बीज--

" मुझे देखो, मेरी मदद करो, मैं आपके ही काम आता हूँ फिर मुझे क्यों इस तरह नष्ट कर रहे हो"| मैं चौंक कर इधर उधर देखने लगा कि ये किसकी आवाज है| सब तरफ तो कंक्रीट का जंगल नज़र आ रहा था, फिर ये आवाज़ कहा से आई| अचानक मुझे लगा कि ये आवाज़ तो मेरे पैर के नीचे से आ रही है| मेरे पैर के नीचे एक बीज पड़ा हुआ था, मैंने उसे उठाया और अपने हाथ में लेकर पूछने लगा
" अब बताओ क्या कह रहे थे तुम"|
बीज की आँखों में आंसू थे, उसने कराहते हुए कहा " आखिर क्यों ये मानव हमें इस तरह से ख़त्म करने पे तुला हुआ है, हम तो उसे हर तरह से जिन्दा रहने में मदद ही करते हैं "|
मैंने बीज को बताया कि आबादी बढ़ रही है, रहने की जगह कम होती जा रही है, सड़के बनानी हैं, कल कारखाने बनाने हैं, विकास करना है तो ये करना ही पड़ेगा| बीज मुस्कुराया और बोला " ठीक है कि आप अपने रहने के लिए जगह बना रहे हो लेकिन हमारे बिना रह कैसे पाओगे, ये भी सोचा है कभी| जिन्दा रहने के लिए ऑक्सीजन भी तो चाहिए न, वो कहा से लाओगे| मैं मानता हूँ कि मज़बूरी में आप हमें काट देते हो, लेकिन आप नए लगा भी तो सकते हो| विकास तो ठीक है लेकिन विनाश पे क्यों तुले हुए हो"|
मेरे हाथ कांपने लगे, बीज मेरे हाथ से गिर पड़ा| फिर मैंने उसे उठाया और बोला " चलो शुरुआत तुम्हीं से करते हैं, तुमको अपने बगीचे में लगाते हैं"|
अब बीज मुस्कुरा रहा था, अपने लिए भी और मानव समाज के लिए भी|

एहसान

सो गयी क्या , वल्लभ ने रूपा को हिलाते हुए पूछा | हाँ , सोने दो ना , बहुत थक गयी हूँ मैं | रूपा फिर करवट बदल कर सो गयी | वल्लभ बहुत देर तक जगा रहा , सोचता रहा अख़बार में निकले सम्पादकीय के बारे में |
आज का सम्पादकीय कोर्ट के उस निर्णय के बारे में था , जिसमे कहा गया था कि पत्नी की सहमति के बिना किया गया सहवास भी बलात्कार की श्रेणी में आता है | क्या सच में ऐसा है , क्या पति की इच्छा की कोई जगह नहीं है दांपत्य जीवन में | महिला अधिकार के समर्थक और बहुत सारी महिलाएं इस फैसले को लेकर बेहद उत्साहित थीं और उनकी नज़र में ये स्त्री सशक्तिकरण की ओर एक बहुत बड़ा कदम था |
वल्लभ सोचने लगा की रूपा पहले तो ऐसी नहीं थी , लेकिन शादी के पांच - छह वर्षों में ही उसका रवैया बहुत बदल गया | अब उसे ये एक निहायत गैरजरूरी और उबाऊ काम लगता था | बेमन से कभी कभी वो इसमें साथ दे तो देती थी , लेकिन अधिकांश मौकों पर वल्लभ को एहसास भी करा देती थी की वो उसकी ख़ुशी के लिए ही ये कर रही है |
अब अगर वल्लभ की इच्छा हो तो वो क्या करे , कब तक एहसान लेता रहे रूपा का | तो हल क्या है इसका ? क्या सिर्फ पति ही सम्मान करे पत्नी की इच्छा का , पत्नी नहीं | नहीं , उसे बात करनी चाहिए रूपा से और वो भी नींद के आगोश में समां गया |

Wednesday, June 25, 2014

गलती

" तू अभी तक गयी नहीं चाय बनाने" , मम्मी चिल्ला रही थी| 
" देख नहीं रही , मैं पढ़ रही हूँ , अभी नहीं उठ सकती मैं ", शिखा ने दो टूक जवाब दिया और पढ़ाई में लगी रही| 
मम्मी का पारा अब सातवें आसमान पर था , उधर भाई भी चाय के लिए चिल्ला रहा था|
" पता नहीं पढ़ के क्या कर लेना है इसने , मैं बीमार क्या पड़ी , लड़के का ख्याल ही नहीं रखती ये लड़की ", मम्मी का बिसूरना जारी था| शिखा ने भी सब सुनते हुए भी अनसुना कर दिया और पढ़ती रही| भाई भी बिस्तर पर लेटे लेटे चुप हो गया| 
थोड़ी देर में घर पहुचने पर पत्नी की शिकायत आई, कि शिखा बात नहीं सुनती और भाई का तो बिलकुल ख्याल नहीं रखती| मैंने पूछा "शिखा , ऐसा क्यों किया तुमने", तो वो फ़ट पड़ी |
" मेरे एग्जाम हैं अगले हफ्ते और मैं पढ़ाई कर रही थी| भाई तो बेड पर लेट कर गाने सुन रहा था, पढ़ाई लिखाई से तो उसका नाता ही नहीं है| मेरे कहने से वो पढ़ता नहीं और मम्मी कभी उसको बोलती नहीं| अगर इसको वो ध्यान देना कहती है तो शायद उन्हें नहीं पता कि वो कितनी बड़ी गलती कर रही है"| 
मैं अवाक् था और उसकी मम्मी खामोश| 

फादर्स डे

अरे मिश्राजी , आज का दिन याद हैं आपको | 
क्या खास हैं आज , मुझे तो याद नहीं आ रहा , आप ही बताईये |
आज तो फादर्स डे है , आप भूल गए | 
लेकिन आपको कैसे याद रहा , इस वृद्धाश्रम में तो कोई आता भी नहीं और आपके बच्चे भी तो आये नहीं थे |
हाँ मेरे बच्चे तो नहीं आये थे लेकिन बाहर चलिए , कुछ बच्चे आये हुए हैं हम लोगों को इस दिवस की शुभकामनाएँ देने के लिए |
मिश्राजी के चेहरे पे मुस्कान आ गयी | तुरंत उठे , कुर्ता डाला शरीर पर और बाहर आ गए | बाहर हाल में कुछ बच्चे आये हुए थे , और टेबल पर फल , मिठाईयां और कुछ फूल भी रखे हुए थे | वहां के लगभग सारे बुजुर्ग हाल में इकठ्ठा थे और सबके चेहरे पर मुस्कराहट खिली हुई थी | लेकिन उस मुस्कान के पीछे छुपा हुआ दर्द भी हर कोई महसूस कर रहा था |

सरनेम

जिंदगी में कई बातें इस तरह की होती हैं , जिनको साझा कर लेने से ही उनकी चुभन कम हो जाती है , लेकिन ये बात तो आत्मा को झिंझोड़ चुकी थी | स्कूल के समय की बात थी , शायद क्लास 5 की , एक नया नया मास्टर आया था स्कूल में | पहले ही दिन जब उसने क्लास में नज़र डाली , तो उसका मन कुछ खट्टा सा हो गया |
किसी शहर से ताल्लुक रखता था वो और क्लास में जब फ़टे पुराने कपड़े पहने गंदे बच्चों को देखा तो उसका मन बहुत ख़राब हो गया | खैर जब उसने हाजिरी लेनी शुरू की और मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वो ठिठक गया | एक बार फिर उसने पूछा और दुबारा जब मैंने अपना सरनेम बताया तो वो बड़े हिकारत से बोला "ये सरनेम तो बड़ी जात वालों का होता है , तुम्हारा कैसे "| मैं कुछ समझ नहीं पाया लेकिन उसने फिर कहा कि अपना सरनेम बदलो नहीं तो क्लास से निकाल देंगे |
खैर रोता , बिसूरता मैं घर पहुंचा और सब बात बताई | लेकिन घर में छायी चुप्पी ने हिम्मत तोड़ दी | अगले कई दिनों तक उस मास्टर के भय से स्कूल नहीं गया | फिर किसी तरह हिम्मत जुटा के स्कूल गया लेकिन अंदर से कुछ टूट चुका था | पता नहीं मास्टर को दया आ गयी थी या वो बाक़ी चीजों में इतना उलझ गया था कि उसने मुझसे पूछा नहीं | लेकिन मैं फिर अगले कई सालों तक किसी को अपना सरनेम बताने कि हिम्मत नहीं जुटा पाया |
आज वो सरनेम तो मेरे नाम के साथ जुड़ा है लेकिन कहीं कुछ चुभा हुआ है आज भी | 

परछाईयाँ

वक़्त कभी नहीं ठहरता , किसी के लिए भी नहीं , चाहे हम जो भी कर लें | अभी कुछ दिनों पहले तक ही कितना खुशनुमा माहौल था , और आज ये सन्नाटा , सचमुच वक़्त नहीं ठहरता |
एक औसत इन्सान की जिंदगी कुछ छोटी छोटी खुशियों और बड़े बड़े मुश्किलात के बीच हिचखोले खाती रहती है | जब ग़म का समय होता है तो समय ही नहीं बीतता , और खुशियों के पल तो सचमुच पल समान ही होते हैं , कब उड़ जाते हैं , पता ही नहीं चलता | वो भी एक आम इन्सान ही था , पढ़ाई पूरी होने के बाद छोटी सी नौकरी मिल गयी थी तो लगा दुनियाँ जहान की खुशियां मिल गयी हैं | फिर शादी हुई और पहले बच्चे के आने की आहट सुनाई देने लगी | बड़े खुश थे वे , तमाम कल्पनायें कर रहे थे बच्चे के बारे में , नाम क्या रखेंगे , कहाँ पढ़ाएंगे , वगैरह , वगैरह |
आखिर वो दिन भी आ गया और हस्पताल पहुंच गए वे दोनों | रात आँखों में ही बीत गयी और सुबह एक प्यारे से बच्चे का आगमन हुआ उनकी दुनियाँ में | खुशियों का पारावार नहीं रहा उस समय , लेकिन कुछ घंटो बाद भी जब बच्चा सुस्त ही पड़ा रहा तो उन्हें चिंता हुई | डॉक्टर के चेहरे की लकीरें बता रहीं थीं कि सब ठीक नहीं है | अगले कुछ दिनों तक उनको होश नहीं था और जब डॉक्टर ने बताया कि बच्चे के दिल में छेद है तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा उनपर |
आज सारी कोशिशों के बाद भी जब वो बच्चे को नहीं बचा पाया तो बुरी तरह टूट गया था | और हस्पताल के बाहर दीवाल से पीठ टिका कर बैठे बैठे देख रहा था कि परछाईयाँ भी ग़मों कि तरह बढ़ रहीं हैं | 

Sunday, June 15, 2014

पिता

हर वो शख्श जो बच्चों के लिए जीता ,
हर वो शख्श जो उनके लिए गरल पीता ,
एक सच्चा गुरु , एक सच्चा मार्गदर्शक ,
धरती पर ख़ुदा का रूप , ऐसा होता है पिता !!
इस धरती के सारे पिताओं , और उन अकेली महिलाओं को भी जो दोनों फ़र्ज़ निभा रही हैं , को पितृ दिवस पर सादर प्रणाम एवम नमन |

Thursday, June 12, 2014

सुकून

"सरकती जाये है रुख से नक़ाब , आहिस्ता आहिस्ता" | जगजीत सिंह की ये ग़ज़ल कमरे में बज रही थी और मैं पुरसुकून अपनी अलग दुनिया में खोया हुआ था | रात के ११ बज रहे थे और कमरे में अँधेरा , बजती हुई ग़ज़ल से सामंजस्य बैठाने में कामयाब हो गया था |
अचानक दरवाजे पर आहट हुई और रूम पार्टनर कमरे में घुसा | क्या यार , जब देखो तब सिर्फ ग़ज़लों को सुनते हो , कहते हुए उसने बल्ब जला दिया | बल्ब की रौशनी ने एकदम से वापस हक़ीक़त की दुनिया में पहुँचा दिया मुझे |
कब तुम अपनी कल्पना की आभासी दुनिया से बाहर निकलोगे भाई , पार्टनर मुझे समझाने की कोशिश कर रहा था | जिंदगी की कठोर सच्चाईयों का सामना करो और जिंदगी को भरपूर जियो | सुनना ही है तो रॉक सुनो , पॉप म्यूजिक सुनो , ये क्या की हर समय अँधेरे में ग़ज़लों को सुनते रहते हो |
अब मैं पूरी तरह से जमीनी दुनिया में था | फिर मैंने उससे पूछा कि तुम ये पॉप और रॉक म्यूजिक क्यों सुनते हो | उसने तुरंत जवाब दिया " यार , जिंदगी में मस्ती बहुत जरुरी है और इन्हे सुनकर मजा आ जाता है | गाने सुनो , झूमो और इस लाइफ को पूरी तरह से एन्जॉय करो "| मैंने फिर पूछा " सुकून भी मिलता है तुमको इस संगीत को सुनकर " , उसके पास कोई जवाब नहीं था |
मुझे सुकून मिलता है ग़ज़लों को सुनकर , और मेरे लिए जिंदगी में सुकून के बहुत मायने हैं | इन्हे सुनने का मतलब ये नहीं है कि मैं जिंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त से भागने की कोशिश कर रहा हूँ , बल्कि ये मुझे जिंदगी को और संजीदगी से जीने को प्रेरित करती हैं | और मैंने बल्ब बुझाकर फिर से ग़ज़ल सुनना शुरू कर दिया |

पछतावा--

बहुत पछतावा हो रहा था उन्हें अपनी सोच और व्यवहार पर| समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे उतरेगा ये बोझ उनके सीने से| जिस बच्चे को उन्होंने नालायक और निकम्मा समझा था और जिसे घर से भी बेरुखी से दूर कर दिया था, आज इतनी बड़ी मुसीबत में वही काम आया| माताजी की आँख से अश्रुधारा अविरल बह रही थी और पिताजी भी खामोश खड़े थे, पश्चात्ताप उनके चेहरे से भी साफ़ झलक रहा था|
ग्लानि से उन्होंने अपने हाथ बेटे की ओर जोड़ दिए|
" माता पिता के हाथ जब भी उठें, आशीर्वाद देने के लिए उठें, हाथ जोड़ने के लिए नहीं, कहते हुए उसने पिता के जोड़े हुए हाथों को अपने सर पे रख लिया|
उनकी सारी ग्लानि आंसुओं में बह गयी और उन्होंने उसे सीने से लगा लिया|

माँ--

" क्या बात है रितु, आज इतना उदास क्यों हो"|
" कुछ नहीं, बस यूँ हीं, कुछ खास नहीं"|
लेकिन उसे पता चल गया था कि वो क्यों उदास है| दरअसल कल मातृ दिवस है और हॉस्टल में सभी बच्चे इसी के बारे में बात कर रहे थे आज| हर कमरे में बस एक ही बात कि कल अपनी माँ के लिए क्या गिफ्ट लेना है या कौन सा कार्ड भेजना है| लेकिन रितु की माँ नहीं है इसीलिए वो उदास दिख रही है|
उसे अपनी माँ याद आ गयी, शायद ही कोई दिन हो जिस दिन उनका फोन नहीं आता हो| और फोन क्या , वो तो पूरा नसीहतों का पिटारा होता है| ये खाना, वो मत खाना, देर रात तक मत जागना, पढ़ाई लिखाई में ध्यान लगाना, और भी न जाने कितनी नसीहतें | आखिर वो कह देती थी कि बस करो माँ, अब मैं बच्ची नहीं हूँ, हास्टल में रह रही हूँ और अपना ख्याल रख सकती हूँ| इसपर उनका जवाब होता कि हाँ अब तो तू बड़ी हो गयी है, अब तो मेरी बातें तुम्हे अजीब लगती होंगी और फिर वो फोन रख देती| लेकिन कुछ ही घंटों में फिर उनका फोन आ जाता और फिर से सारी नसीहतें दी जातीं|
लेकिन आज रितु को देखकर उसे एहसास हो रहा था कि माँ की कमी कितनी महसूस होती है, खासकर तब, जब घर से दूर रहना पड़ता है| कोई नहीं होता जो बिना कहे ही सारी जरूरतों को समझ सके, और उनको पूरा कर सके| जो उनकी ख़ुशी में खुश हो और उनके दुःख में दुखी| और जिसकी माँ ही नहीं हो तो उसकी कमी तो कोई पूरा कर ही नहीं सकता|
फिर उसने माँ को फोन लगाया और बोला " माँ, कल तुम रितु को फोन करना और उसे बताना की उसकी माँ नहीं तो क्या हुआ मैं तो हूँ, माँ नहीं तो माँ जैसी तो हूँ"|

विडम्बना

अरे भाई , क्या बात है , बड़ी भीड़ लगी है कनिया के घर के सामने , मैंने सामने से आ रहे जोखन से पूछा | " आप को नहीं पता , बेचारा आज अल्लाह को प्यारा हो गया " | मैं एकदम से हतप्रभ रह गया | कब हो गया ये और मुझे खबर तक नहीं |
कनिया हमारे गांव का नाई था , पिछले २५ सालों से मैं उसे देखता आ रहा था | उसकी एक आँख गड़बड़ थी जिससे लोग उसे कनिया ही पुकारते थे | किसी को भी , यहाँ तक की उसे खुद अपना सही नाम याद नहीं था | हर जाति और धर्म के लोगों के घर जा कर लोगों के बाल काटना , दाढ़ी बनाना ही उसका पेशा था | उसके पिता भी इसी पेशे में थे और शायद उसकी पिछली कई पुश्तें यही करती आ रही थीं | बड़ा ही खुशमिजाज , सारे गांव की खबर उसके पास होती थी | बाल कटवाते कटवाते पूरे एरिया की खबर मिल जाती थी | इधर उसका काम थोड़ा कम हो गया था क्योंकि नई पीढ़ी के नौजवान अब उसके बदले नए सैलून में जाना पसंद करते थे | लेकिन अभी भी पुरानी पीढ़ी का वही नाई था और कैची और उस्तरा ही उसके औजार थे जिसे वो चमड़े पर घिस घिस कर तेज करता रहता था |
जल्दी से मैं उसके घर के सामने पहुंचा और पूछने लगा कि कैसे हुआ | तभी उसके पड़ोसी ने बताया कि वो टिटनेस से मर गया | दरअसल वो उस्तरे से अपनी दाढ़ी बना रहा था और कट जाने के कारण उसे टिटनेस हो गया | वक़्त की विडम्बना कि वह अपने ही उस्तरे की वजह से ही काल का ग्रास बन गया |

ट्रैक्टर--

अपने पिता का अंतिम संस्कार करके लौटा था संजय और दरवाजे पर बैठा सोच रहा था कि काश उसने जिद नहीं की होती | अगर उसने बापू की बात मान ली होती तो शायद ये दिन देखने को नहीं मिलता | इन्हीं सब ख्यालों में डूबे हुए उसे पिछली बातें याद आने लगीं |
उसी ने जिद की थी कि अपने घर भी ट्रैक्टर होना चाहिए | गांव में बहुत से घरों में ट्रैक्टर आ गया था और अब उसके मन में भी इसकी इच्छा हिलोरें मार रहीं थीं | बापू ने बहुत समझाया कि क्या जरुरत है इसकी , तमाम घरों में तो है ही और उनके पास खेत भी इतना नहीं है लेकिन संजय ने एक नहीं सुनी |
जैसे ही उस एरिया के ट्रैक्टर डीलर को भनक लगी कि संजय भी ट्रैक्टर लेना चाहता है , उसने एक एजैंट को उसके पीछे लगा दिया | अब रोज एजेंट का फोन आता और हर दूसरे दिन वो संजय के घर आ धमकता | उसके बापू ने आशंका जाहिर की थी , कि इतने कम खेत पर ट्रैक्टर ऋण नहीं मिलेगा लेकिन एजैंट ने आश्वस्त किया कि ऋण मिल जायेगा | हार कर उसके बापू ने ज़मीन के कागजात संजय को दे दिए और एजेंट ने आनन फानन में ऋण दिला दिया |
अब ट्रैक्टर आ गया , गांव में मिठाईयां बटीं और संजय भी उत्साह से लग गया जुताई करने में | शुरू में तो बहुत से किसानों ने जुताई के लिए कहा , लेकिन पैसे देने के समय एक ही जवाब "फसल पर दे देंगे , भागे थोड़े ही जा रहे हैं"| धीरे धीरे लोगों ने जुताई करवाना कम कर दिया , पैसे का तगादा चलता रहा लेकिन इतना आसान नहीं था पैसा मिलना | अपनी खेती इतनी थी नहीं कि उससे बैंक की किश्त समय से जमा हो सके |
फिर बैंक से नोटिस आना शुरू हुआ और एक दिन कुर्की का नोटिस भी आ गया | बैंक ने ट्रैक्टर भी जब्त कर लिया और खेतों को भी नीलाम कर के अपना पैसा वसूल लिया | इसी सदमे में बापू चल बसे | इस नासमझी से ट्रैक्टर उसके लिए विकास नहीं बल्कि विनाश का कारण बन गया |

संतुष्टि

आपने तो हमें जिन्दा कर दिया साहब , उस औरत के आंसू रुक ही नहीं रहे थे | उसका पति चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था , शराब और जुए के लत ने बर्बाद कर दिया था | जब साथी कर्मचारियों ने उधार देना बंद कर दिया तो एक ही रास्ता बचा था , सूदखोर के पास जाने का | अब तो महीने में कब तनख्वाह मिली , ये भी उस बेचारी को पता नहीं चलता था | कैसे घर चलाये और बच्चों को स्कूल भेजे , जिंदगी के संघर्षों ने बिलकुल हताश कर दिया था |
एक दिन वो बैंक मैनेजर के केबिन में आकर रोने लगी | पूछने पर बोली " अगर दो बच्चे नहीं होते तो कबका जीवन त्याग चुकी होती और उसने सारा हाल बता डाला " | खैर उसको दिलासा देकर खाता चेक किया तो पता चला कि तनख्वाह जमा तो होती है लेकिन उसी दिन निकल भी जाती है | अगली तनख्वाह पर पता चला कि पासबुक तो सूदखोर के पास है और वो ही निकाल लेता है | उसके ब्याज में ही कमोबेश सारी तनख्वाह चली जाती है और पास में कुछ भी नहीं बचता |
फिर मैनेजर ने उन दोनों को बैंक बुलाया और समझाया कि हम तुम्हे कर्ज देंगे लेकिन तुम्हे साहूकार का सारा पैसा एकसाथ लौटाना होगा | उसकी पत्नी को तो मानो सब कुछ मिल गया |कुछ दिन बाद साहूकार को बुलाकर बैंक ऋण से उसके सारे पैसे चुकता कराये और जैसे ही पासबुक उसकी पत्नी को सौंपा , वो फफक फफक कर रोने लगी और उसका पति हाथ जोड़े खड़ा था | एक परिवार आज उजड़ने से बच गया था और इसकी संतुष्टि सभी के चेहरे पर नजर आ रही थी |

पीड़ा

खा लो बेटा , थोड़ा तो खा लो , रमा अपने छोटे बेटे के पीछे पीछे खाना ले कर घूम रही थी , लेकिन बेटा किसी भी सूरत में खाने को तैयार नहीं था | बड़ी मशक्कत के बाद उसने थोड़ा सा खाया और बाक़ी खाना प्लेट में छोड़ दिया | रमा बहुत दुःखी थी उसके इस आदत से |
अगले दिन जब स्कूल से बेटे को लेकर आते समय रास्ते में सड़क के किनारे एक बच्चे को पेपर के टुकड़े में कुछ खाते देखकर रमा भौचक्क रह गयी | गरीबी और भूख क्या नहीं करा देती , उसका मन पीड़ा से भर गया | फिर कुछ सोचकर उसने बेटे को उस तरफ दिखाया और बोली "बेटा देख , जिन्हे खाना नहीं मिलता है वो कहीं भी , कुछ भी खाने को तैयार हो जाते हैं और तुम खाना बर्बाद कर देते हो "|
पता नहीं क्या लगा बेटे को , लेकिन उसने खाना बर्बाद करना बंद कर दिया | शायद उस भूखे बच्चे की पीड़ा उसके बाल मन को भी छू गयी थी |

फैसले

जिंदगी में कुछ फैसले ऐसे भी लेने पड़ते हैं जो उस वक्त कठिन लगते हैं | नयी नयी नौकरी लगी थी विकास की और ट्रेनिंग में लोगों से उसकी नजदीकी बढ़ रही थी | कहने को तो ये ट्रेनिंग सेंटर के छात्रो का हॉस्टल था जिसमे मानसिक रूप से बुद्धिजीवी लोग रहते थे , और जिनसे ये उम्मीद कि जा सकती थी कि वो लोग समाज के बीच की खाई को कम करने का प्रयास करेंगे | लेकिन कुछ ही दिनों में ये स्पस्ट होने लगा कि जो चीजे लोगों को बचपन से रटाई जाती हैं वो एक तरह से उनके खून में रच बस जाती हैं और उनसे ऊपर उठना इतना आसान नहीं होता | पढ़ाई करके नौकरी पा लेना और ज्ञान पाना दो अलग अलग चीज होती हैं |
उसने कभी ये नहीं सोचा कि साथ वाले का सरनेम क्या है , वो सिर्फ उसका बैचमेट था , लेकिन ये भी महसूस होने लगा था कि कई अलग ग्रुप किसी खास आधार पर बनने लगे थे | कुछ लोग उससे ज्यादा ही नजदीकी बढ़ाने लगे थे और इन सारे लोगो का सरनेम मिलता जुलता था | कही न कही ये गलत लगा विकास को और उसका मन इसके विरोध में खड़ा हो गया | उनमे से कुछ बहुत अच्छे और प्रतिभाशाली भी थे लेकिन उसने एक बड़े लछ्य के लिए इस छोटे ग्रुप का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था | उस फैसले पर आज भी उसे फक्र है |

कश्मकश

रज्जो सुनो तो , सूरज पुकार रहा था लेकिन रज्जो ने अनसुना कर दिया | सूरज परेशान हो गया , पता नहीं क्या हो गया है इसको | पिछले एक हफ्ते से न तो मैसेज का जवाब दे रही है , न ही कॉल का | सब ठीक ठाक तो चल रहा था फिर ऐसा क्यों कर रही है ये ?
रज्जो भी कश्मकश में थी कि कैसे बताये सूरज को कि क्या हुआ है | कुछ दिन पहले ही जब वो नहा रही थी , उसका फोन मम्मी ने देखा और उसके और सूरज के मेसेजेस पढ़ लिए | फिर तो तूफान उठ गया घर में | मम्मी ने चिल्लाना शुरू कर दिया " अब ये भी यही करेगी , सारे गलत काम हमारे बच्चों को ही करने हैं " | उसे काटो तो खून नहीं था , कुछ नहीं बोल पायी वो | अब उसकी क्या गलती थी कि उसकी चचेरी बहन ने घर से भाग कर शादी कर ली थी |
रात में खबर पापा के पास पहुंची और पापा ने उसे बुलाया | वो चुपचाप गर्दन झुकाये खड़ी थी , और पापा के शब्द उसका कलेजा छलनी कर रहे थे | उन्होंने साफ कह दिया कि अगर उसने तुरंत सूरज से सम्बन्ध नहीं तोड़े तो वो अपनी आगे की जिंदगी जेल में भी बिताने के लिए तैयार हैं |
रज्जो पूरी रात सोचती रही कि क्यों औरों की गलतियों की सजा किसी और को भुगतनी पड़ती है और क्या अपने निजी सुख के लिए अपने परिवार को तहस नहस करना उचित है | अंत में उसने परिवार की ख़ुशी के लिए अपने निजी सुख को भुलाना ठीक समझा |

कसम

भागते भागते किसी तरह टिकट की खिड़की पर पहुंचा , घड़ी देखी तो सिर्फ १० मिनट बाकि थे ट्रेन चलने में | उफ़्फ़ , इतने सबेरे भी इतनी भीड़ , कभी तो सुकून हो जिंदगी में , जब देखो तब भीड़ और भागमभाग | टिकट लेता तो ट्रेन छूटना तंय था , इसलिए लपक कर ट्रेन में चढ़ गया | चढ़ते ही ट्रेन चल दी , किसी तरह एक सीट पर टिका और साँस पर काबू पाने लगा |
पहला मौका था बिना टिकट सफर का , दिल बुरी तरह धड़क रहा था | एक बार पुरे डिब्बे में नजर दौड़ाया , सब लोग अब सोने का उपक्रम करने लगे थे | वैसे भी सुबह के पांच ही बजे थे और जाड़े का समय था तो सब लोग सिकुड़े हुए थे |
उसने भी सोचा कि सो जाये लेकिन नींद तो गायब थी | निगाहें बार बार हर आने वाले व्यक्ति को देख रही थी और सोच रही थी कि पता नहीं कब टी टी आ जाये| पता नहीं कितनी बार सफर किया है इसी ट्रेन में और हर बार तुरंत नींद आ जाती थी लेकिन आज गायब थी | अब वो पूरे डिब्बे को गौर से देखने लगा , चारो तरफ तमाम विज्ञापन चिपके हुए थे लेकिन उन्हें पढ़ने में भी दिल नहीं लगा |
कई स्टेशन पार हो गए , हर स्टेशन से चलते ही दिल धड़कने लगता था कि शायद इस बार टी टी चढ़ेगा डिब्बे में | पहली बार पता चला की कितने स्टेशन आते हैं रास्ते में | जब बेचैनी बहुत बढ़ जाती तो स्टेशन पर रुकते ही गाड़ी से उतर जाता और गाड़ी चलने पर ही चढ़ता | आज प्रतीत हो रहा था कि ट्रेन कितनी धीमी चलती है |
लोगों के खर्राटे उसका दिल जला रहे थे और लगता था कि जैसे उसे छोड़ कर पूरी ट्रेन ने नींद की गोली ले रखी हो | मैगज़ीन बैग में रखी थी लेकिन निकालकर पढ़ने का दिल नहीं किया | समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे सभी इतने बेफिक्र सो रहे थे |
खैर , ख़ुदा ख़ुदा करते मंजिल पर पहुंचे , छह घंटे का सफर हफ़्तों के समान लगा| स्टेशन से बाहर निकलने के बाद कसम ली कि फिर कभी बिना टिकट नहीं चढ़ेंगे ट्रेन में |

एहसान

सो गयी क्या , वल्लभ ने रूपा को हिलाते हुए पूछा | हाँ , सोने दो ना , बहुत थक गयी हूँ मैं | रूपा फिर करवट बदल कर सो गयी | वल्लभ बहुत देर तक जगा रहा , सोचता रहा अख़बार में निकले सम्पादकीय के बारे में |
आज का सम्पादकीय कोर्ट के उस निर्णय के बारे में था , जिसमे कहा गया था कि पत्नी की सहमति के बिना किया गया सहवास भी बलात्कार की श्रेणी में आता है | क्या सच में ऐसा है , क्या पति की इच्छा की कोई जगह नहीं है दांपत्य जीवन में | महिला अधिकार के समर्थक और बहुत सारी महिलाएं इस फैसले को लेकर बेहद उत्साहित थीं और उनकी नज़र में ये स्त्री सशक्तिकरण की ओर एक बहुत बड़ा कदम था |
वल्लभ सोचने लगा की रूपा पहले तो ऐसी नहीं थी , लेकिन शादी के पांच - छह वर्षों में ही उसका रवैया बहुत बदल गया | अब उसे ये एक निहायत गैरजरूरी और उबाऊ काम लगता था | बेमन से कभी कभी वो इसमें साथ दे तो देती थी , लेकिन अधिकांश मौकों पर वल्लभ को एहसास भी करा देती थी की वो उसकी ख़ुशी के लिए ही ये कर रही है |
अब अगर वल्लभ की इच्छा हो तो वो क्या करे , कब तक एहसान लेता रहे रूपा का | तो हल क्या है इसका ? क्या सिर्फ पति ही सम्मान करे पत्नी की इच्छा का , पत्नी नहीं | नहीं , उसे बात करनी चाहिए रूपा से और वो भी नींद के आगोश में समां गया |