बहुत मुश्किल था लेकिन , जुबाँ सह गयी है
बचते बचते भी फिर क्यूँ , नज़र बह गयी है
कशिश थी गज़ब , उस नज़र में तुम्हारी
कह सकी जो जुबाँ ना , ये वो कह गयी है
चल पड़े थे सफर में , नहीं था ठिकाना
कि जाना कहाँ , मंज़िलें रह गयी हैं !!
बचते बचते भी फिर क्यूँ , नज़र बह गयी है
कशिश थी गज़ब , उस नज़र में तुम्हारी
कह सकी जो जुबाँ ना , ये वो कह गयी है
चल पड़े थे सफर में , नहीं था ठिकाना
कि जाना कहाँ , मंज़िलें रह गयी हैं !!
No comments:
Post a Comment