अगर मनाना ही है
तो मनाओ ईद उनके साथ
जो खांसते रहते हैं
अपने धुंधले से कमरे में
बुनते हुए साड़ियाँ
जिसको पहन कर
बुनती हैं कितने ही सपने
नयी नवेली दुल्हनें
जिन्हें नहीं पता कि
इन्हें बुनने में जले हैं
कितनो के सपने
या मनाओ उनके साथ
जो अभिशप्त हैं
रहने को उन घरों में
अपनी अशिक्षा और
बजबजाती गरीबी के साथ
जिनकी याद आती तो है
हुक्मरानों को हर ५ साल में
लेकिन फिर नहीं पड़ते
उनकी बस्तियों में उनके क़दम
ईद मनाना ही है तो फैलाओ
इनके घर में भी रौशनी
शिक्षा की , बराबरी की
फिर देखो हो जायेगा
कितना खुशगवार ये त्यौहार
तो कुछ ख्वाब संजोएं
इन कमनसीबों के घर
चलो ईद मनाएं इनके साथ !!
तो मनाओ ईद उनके साथ
जो खांसते रहते हैं
अपने धुंधले से कमरे में
बुनते हुए साड़ियाँ
जिसको पहन कर
बुनती हैं कितने ही सपने
नयी नवेली दुल्हनें
जिन्हें नहीं पता कि
इन्हें बुनने में जले हैं
कितनो के सपने
या मनाओ उनके साथ
जो अभिशप्त हैं
रहने को उन घरों में
अपनी अशिक्षा और
बजबजाती गरीबी के साथ
जिनकी याद आती तो है
हुक्मरानों को हर ५ साल में
लेकिन फिर नहीं पड़ते
उनकी बस्तियों में उनके क़दम
ईद मनाना ही है तो फैलाओ
इनके घर में भी रौशनी
शिक्षा की , बराबरी की
फिर देखो हो जायेगा
कितना खुशगवार ये त्यौहार
तो कुछ ख्वाब संजोएं
इन कमनसीबों के घर
चलो ईद मनाएं इनके साथ !!
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