उनका कुछ और भी नाम था
पर सब बुलाते थे मियाँइन
हफ्ते में कम से कम दो दिन
आती थीं हमारे गाँव
सर पर उठाये हुए एक टोकरी
जिसमे होती थी
तरह तरह की चूड़ियाँ
बिंदी , आल्ता , टिकुली
और भी जाने क्या क्या
आते ही हम घेर लेते थे उनको
अपने होठों के किनारे से
बहते हुए पान की पीक
को पोंछते हुए वो निकालती थीं
एक एक करके सब सामान
और घर की महिलाएँ
छाँट लेती थीं
अपने हिसाब से सामान
और बदले में मिल जाता था
उनको थोड़ा अनाज़
कभी गेंहूँ , कभी चावल
कभी मौसमी सब्ज़ियाँ
हँस कर ले लेती थीं वो सब कुछ
जब बड़े हुए , तब जाना
कि वो किसी और धर्म की थीं
काश , आज भी वही होता
हमें नहीं पता होता लोगों का धर्म
आज भी आतीं वो मियाँइन
और हम घेर लेते उनको उसी तरह !!
पर सब बुलाते थे मियाँइन
हफ्ते में कम से कम दो दिन
आती थीं हमारे गाँव
सर पर उठाये हुए एक टोकरी
जिसमे होती थी
तरह तरह की चूड़ियाँ
बिंदी , आल्ता , टिकुली
और भी जाने क्या क्या
आते ही हम घेर लेते थे उनको
अपने होठों के किनारे से
बहते हुए पान की पीक
को पोंछते हुए वो निकालती थीं
एक एक करके सब सामान
और घर की महिलाएँ
छाँट लेती थीं
अपने हिसाब से सामान
और बदले में मिल जाता था
उनको थोड़ा अनाज़
कभी गेंहूँ , कभी चावल
कभी मौसमी सब्ज़ियाँ
हँस कर ले लेती थीं वो सब कुछ
जब बड़े हुए , तब जाना
कि वो किसी और धर्म की थीं
काश , आज भी वही होता
हमें नहीं पता होता लोगों का धर्म
आज भी आतीं वो मियाँइन
और हम घेर लेते उनको उसी तरह !!
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