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Tuesday, May 31, 2016

कतार--लघुकथा

अचानक उसकी नज़र पड़ी पिताजी पर, टिफ़िन को लेकर हाल में खड़े थे और शायद चपरासी किसुन को ढूँढ रहे थे जिसे टिफ़िन पकड़ा सकें| आज वो जल्दी निकल आया था ऑफिस, उस समय तक टिफ़िन नहीं बन पाया था| उसने मना भी किया था कि कुछ मत भेजना, मैं यहीं कुछ खा लूंगा, लेकिन माँ ने भेज ही दिया| उसने अपने काउंटर को बंद किया और पिताजी के पास पहुँच कर टिफ़िन ले लिया|
"क्या जरुरत थी आपको लाने की, मैंने कहा तो था कि यहीं कुछ खा लूंगा", उसने पिताजी से कहा|
"लेकिन तुमको क्या जरुरत थी काउंटर बंद करके यहाँ आने की, लोग इंतज़ार कर रहे हैं| मैं तो किसुन को देख रहा था, उसको देकर चला जाता", पिताजी ने लोगों की कतार को देखते हुए कहा|
"ठीक है, १० मिनट में क्या हो जायेगा पिताजी, यहाँ तो रोज ही ऐसी कतार लगी रहती है"|
"बेटा, टिकट की लाइन में खड़े रहने पर अगर काउंटर वाला बाहर निकल कर किसी से बात करने लगे तो कैसा महसूस करते हो", कहते हुए पिताजी चले गए| अब उसे कतार में खड़े हर व्यक्ति में अपना तमतमाया चेहरा नज़र आने लगा|
काउंटर पर बैठकर अब उसकी उँगलियाँ दुगुने तेजी से कार्य निपटा रही थीं|   

Thursday, May 26, 2016

उपयोगिता--लघुकथा

उस बच्चे ने वहाँ पड़ी अधजली लकड़ियाँ उठाईं और उन्हें अपने हाथों में उठाकर चल पड़ा। पहले उसे लगा कि शायद वो उन लकड़ियों को घाट की लकड़ियों की दुकान में ही रख देगा जिससे वो वापस बिक सकें, लेकिन लड़का लकड़ियाँ सम्भाले घाट की सीढियाँ चढ़ते ऊपर जाने लगा। उत्सुकतावश उसने लड़के को आवाज़ लगायी तो लड़का डरकर भागा, वो भी उसके पीछे चल पड़ा। लड़का गलियों से होता हुआ एक अधगिरे घर के अंदर दाखिल हुआ और वो उस घर के सामने खड़ा हो गया। बाहर से किसी बेहद निर्धन का घर लग रहा था, लेकिन उसे अभी भी बड़ा अजीब लग रहा था कि वो इन लकड़ियों को यहाँ लाया है।
कुछ देर खड़े रहने के बाद उसने जर्जर दरवाजे की साँकल खड़खड़ाई, अंदर से कांपती आवाज़ आई "कौन है, आ जाओ"।
वो अन्दर घुसा, सामने एक बुढ़िया चूल्हे में लकड़ियां डाल कर उन्हें फूँक रही थी। लकड़ियाँ कुछ गीली थीं इसलिए धीरे धीरे सुलग रही थीं| उसे याद आया कि घाट पर चिता जलने के बाद उसपर पानी डाल दिया गया था ताकि अस्थियाँ चुनी जा सकें। वो बच्चा वहीँ चूल्हे के पास बैठा था और इंतज़ार कर रहा था कि चूल्हे पर चढ़ा हुआ भात जल्दी से पके और वो खा सके। बुढ़िया ने उससे पूछा "कौन हो बेटा, किससे मिलना है"। बच्चा भी उसे थोड़े आश्चर्य से देखने लगा।
"कुछ नहीं माई, बस ऐसे ही आ गया था", बोलते हुए वो बाहर निकल गया। उसकी नज़र के सामने वही लकड़ियाँ घूम रही थीं जिनपर कुछ घण्टे पहले एक शरीर जला था और अब उसी पर जीवन जीने के लिए भोजन पक रहा था। कहीं पढ़ा हुआ उसके जेहन में कौंध गया "आग जलाती है तो जिलाती भी है"|
लकड़ियाँ तो वही थीं, बस उपयोगिता बदल गयी थी।

Wednesday, May 25, 2016

चाल --लघुकथा

"मालिक, आज भी रघुवा काम पर नहीं आया, लगता है उ शहरी बाबू के चक्कर में पड़ गया है| अंदेशा तो ठीक नहीं लगता है", कड़क मूछ वाले भूरा ने थोड़े चिंतित स्वर में कहा|
"हूँ, इ सब के सब इसी तरह बिगड़ने लगे तो काम कौन करेगा खेतों पर| अच्छा ये बताओ कि करता क्या है उ शहरी बाबू"| स्टूल पर उनके पास रखी हुई जलती लालटेन खुद का ही अँधेरा दूर करने में असफल थी|
"कुछ काम तो नहीं करता है, लेकिन किताब कॉपी बहुत है उसके पास| सबको इकठ्ठा करके कुछ तो पढ़ाता है और लोग भी बहुत ध्यान से सुनते हैं उसको", भूरा ने सारा ब्यौरा एक सांस में कह दिया|
मालिक के पेशानी पर बल पड़ गए, ये तो सोचा ही नहीं था उन्होंने| एकदम से उन्हें अपना बेटा याद आ गया, उनको क्या पता था कि पढ़ने के बाद लोगों की मति फिर जाती है, नहीं तो भेजते ही नहीं पढ़ने| जब गाँव वापस आया था तो उनको ही समझाने लगा था कि मजदूरों को उनके काम की वाजिब कीमत मिलनी चाहिए, लोगों के लिए चिकित्सा सेवाएं भी उपलब्ध होनी चाहिए, बच्चों के लिए स्कूल भी खोलना चाहिए| उन्होंने बहुत समझाया था कि सरपंच होने का मतलब ये थोड़े ही है कि सब पैसे इन्हीं लोगों पर उड़ा दिए जाये| लेकिन महीनों की असफ़ल बहस के बाद आखिर वो चला ही गया घर छोड़ कर और आज तक नहीं लौटा|
क्या करें, बेटे को तो कुछ कह नहीं सकते थे लेकिन इसका क्या करें| अगर ये ज्यादा दिन रहा तो पूरा माहौल ही खराब कर देगा और एक फैसला उन्होंने मन ही मन कर लिया|
थोड़ी देर बाद वो उस शहरी बाबू की कुटिया पर पहुंचे, वो बाहर ही खाट पर सो रहा था| वो धीरे से कुटिया के अंदर घुसे और वहां रखी सब किताबों को इकठ्ठा किया| झोले से केरोसिन का गैलन निकालकर उन्होंने किताबों पर डाला और माचिस निकालकर उसमें आग लगा दी| भागते हुए जब वो वापस आ रहे थे तो उन्हें अपने षड्यंत्र में सफलता मिलती नज़र आ रही| उनके जेहन में बेटे का कहा हुआ वाक़्य आज भी ताज़ा था "पिताजी, किताबों को पढ़िए तब समझ आता है कि सही क्या है और गलत क्या"| 

Tuesday, May 24, 2016

हार या जीत--लघुकथा

"क्या जरुरत थी अदालत में जान बूझकर गलत बोलने की, आपको पता था ना कि वो झूठ बोल रहा है| एक मकान ही बचा था, वो भी चला गया", पत्नी बेहद दुखी थी|
"ये केस मैंने तो नहीं किया था, और मैं तो लड़ता भी नहीं, तुम्हारे चलते मैं आ गया| फिर मेरे लिए हार जीत कैसी, और तुम भी तो उसे हमेशा बेटे की तरह मानती थी"|
"इसीलिए तो इतना दुःख हो रहा है, अपनी संतान की तरह पाला था उसको मैंने| अपनी गोद में खिलाया है उसे और उसी ने ऐसा किया हमारे साथ", उसकी ऑंखें भर आई थीं|
"देखो, अब समय ही कितना बचा है अपने पास, पेंसन मिल ही रही है तो बीत ही जायेगा| लेकिन अपने मन में कटुता मत रखो उसके लिए, आखिर अपना ही तो है", कहते हुए पत्नी के कंधे पर हाथ रखा उसने और बाहर चल दिया|
"अपना ही तो है, आप अब भी यही कह रहे हो| अपने कहीं इस तरह करते हैं"|
"ठीक है, चलो छोडो इसे, और कौन उस मकान को हम अपने साथ लेकर जाते, उसका परिवार है और उसको ज्यादा जरुरत है", उसके मन में यही चल रहा था कि तुम भी गलत नहीं हो लेकिन अपनों से हारने में दुःख कहाँ होता है|     

Monday, May 23, 2016

समय और रिश्ते--

"बहुत हो चुका, अब राजू को बोल ही दूंगी, आखिर कब तक ये मनमानी करेगी", बाहर पेड़ की छाया में बैठ कर अखबार पढ़ते हुए पति के पास आकर वो बोली|
"हूँ" बोलकर वो वापस अखबार में घुस गया| मन तो उसका भी नहीं था पढ़ने में, रोज एक सी ख़बरें आती थीं, लेकिन इसी बहाने कुछ समय बच जाता था खिटपिट सुनने से|
"आप तो बोलना नहीं चाहते तो मैं ही बोल दूंगीं उसको", बोलते हुए वो भी उनके पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी|
एक बार उसने पत्नी की तरफ देखा, बेहद दुखी लग रही थी| वो सोचने लगा, जब भी ये पोते को खिलाने के लिए जाती है, बहू किसी न किसी बात पर टोक देती है| और फिर शुरू हो जाती है ये खिटपिट|
"अच्छा बताओ तो, हुआ क्या है", अब वो उसकी तरफ घूम गया था|
"उसे लगता है जैसे मैंने बच्चे पाले ही नहीं, अपने पति को तो देखे| मैंने सोचा कि बच्चे को थोड़ी देर बाहर घुमा लाऊँ तो कहती है कि इतनी धूप में कहाँ ले जाएँगी", उसने पति की तरफ आशा भरी निगाह से देखा|
"ठीक ही तो कहती है, इतनी धूप में मासूम को कहीं नुक्सान न पहुंचे| तुम अपना समय भूल गयी?", उसने समझाने की कोशिश की|
"मेरे समय में मेरा बच्चा मेरे पास कहाँ रहता था, वो तो हमेशा दूसरे बड़ों के पास ही रहता था"|
"तो क्या तुम्हें चिंता नहीं होती थी? होती तो थी ना, बस तुम कुछ कह नहीं पाती थी क्योंकि वो समय अलग था| अब समय बदल गया है तो हमें भी तो बदलना होगा", समझाते हुए उसने कहा|
पत्नी का भी मन थोड़ा ठंडा हो गया था, उसने फीकी मुस्कराहट उसकी ओर डालते हुए कहा "चलो अब अंदर बैठो, बाहर तापमान कितना बढ़ गया है"| मुस्कुराते हुए उसने पत्नी का हाथ पकड़ा और अंदर चल पड़ा, बाहर सच में गर्मी बढ़ गयी थी|    

Thursday, May 19, 2016

ये गाँव है--

"वॉव, कितना गज़ब लगता है ना यहाँ, सच में यहाँ के लोग कितने लकी हैं", मनीष ऑंखें फाड़ फाड़ के सब देख रहा था| आज पहली बार वो गाँव आया था और रास्ते भर भी वो बहुत एक्साईटेड था| रग्घू ने आज उसको बोला था अपने गाँव चलने के लिए और साइकिल से २५ किमी की दूरी कैसे तय हो गयी, दोनों को पता ही नहीं चला| घर पर साइकिल खड़ा करके जल्दी से मनीष ने पानी पिया और खेत देखने चल पड़ा|
गाँव से बाहर निकलते समय मनीष ने चरनी पर खड़ी गायें देखीं और दूर से ही सहला कर ख़ुशी ख़ुशी आगे बढ़ गया| एक दरवाजे पर गन्ना की पेराई चल रही थी और वो खड़ा हो गया| उसकी निगाहें बता रही थीं कि उसे गन्ने का रस पीना है, लेकिन रग्घू ने उसे वापसी में पिलाने को बोला और खेत की तरफ ले चला| तब तक कुछ छोटे, बड़े बच्चे भी साथ लग गए, उन्हें भी मज़ा आ रहा था किसी लड़के को जीन्स पहन कर गाँव में घूमते देख कर|
एक मटर के खेत में मटर की तुड़ाई चल रही थी और मनीष वहीँ पर खड़ा हो गया| खेत वाले ने देखा कि कोई शहरी लड़का रग्घू के साथ खड़ा है तो उसने उसे बुलाया "आ जाओ बाबू, मटर खाओगे"|  
मनीष को तो जैसे उसके मन की मुराद मिल गयी, घुस गया खेत में| एकदम हरी, ताज़ी मटर, जो उसने कभी देखीं भी नहीं थी, तोड़ कर उसने खाना शुरू कर दिया| उसके चेहरे की ख़ुशी वहां मौजूद सभी लोगों को साफ़ साफ़ दिख रही थी| थोड़ा मटर खाने के बाद रग्घू ने उसे टोका "ज्यादा मत खा, नहीं तो दस्त होने लगेंगे "|
बुझे मन से वो आगे बढ़ा, ठण्ड काफी थी और चारो तरफ सरसो के फूलों का पीला रंग बिखरा पड़ा था| कुछ खेतों में आलू भी खोदा जा रहा था तो कहीं गेहू के खेत भी अपना हरापन दिखा रहे थे| रग्घू उसे अपने गन्ने के खेत पर ले गया, सौभाग्य से बिजली थी अभी और पम्पिंग सेट चल रहा था| उससे निकलते गरम पानी में दोनों ने हाथ मुंह धोया और फिर मनीष को लेकर गन्ने के खेत की ओर चला|
"मैं तोडूंगा गन्ना", कहते हुए मनीष ने एक गन्ना तोड़ने की कोशिश की लेकिन तोड़ नहीं पाया|
"रहने दो, मैं तोड़ देता हूँ", कहते हुए रग्घू ने गन्ना तोडा और मनीष को थमा दिया| एक गन्ना उसने भी तोड़ लिया था और आकर नाली में पैर डालकर बैठ गया| गरम पानी बहुत सुकून दे रहा था उनके पैरों को और मनीष चारो तरफ यूँ देख रहा था जैसे सब कुछ आँखों में भर लेना चाहता हो| जैसे तैसे उसने रग्घू कोदेख कर मुंह से गन्ना चूसने की कोशिश की और थोड़ी देर में ही रुक गया| आदत नहीं थी तो जबड़े दर्द करने लगे थे उसके, लेकिन रग्घू बड़े मजे में गन्ना चूसता रहा|
" यार, गन्ना है तो बहुत मस्त, लेकिन आसान नहीं है चूसना", मनीष ने रग्घू को देखते हुए कहा और दोनों हाथ धोकर उठ खड़े हुए|
"चलो वापस घर चलते हैं, कुछ खाने के लिए बन गया होगा", रग्घू ने मनीष को लगभग धकेलते हुए कहा| दोनों बात करते हुए वापस गाँव पहुंचे, लेकिन मनीष फिर उसी दरवाज़े पर रुक गया जहाँ गन्ने की पेराई हो रही थी|
"अरे चाचा, एक लोटा रस तो दो, ये आज पहली बार पिएगा ऐसा रस"|
चाचा ने एक लोटा रस निकाला और कहा "कचालू बना है, पहले खा लो, फिर पीना रस", और उन्होंने घर में आवाज़ दिया कचालू के लिए|
दोनों वहीँ रखी खटिया पर बैठ गए, कटोरे में गरम गरम कचालू आ गया| मनीष को तो जैसे लगा कि उसे अमृत मिल गया हो| जल्दी जल्दी उसने कचालू ख़त्म किया और लोटे से रस निकाल कर पीने लगा| कचालू के बाद रस ने तो जैसे उसपर जादू कर दिया, इतना बढ़िया तो आजतक उसे कोई भी कोल्ड ड्रिंक नहीं लगा था|
"और पीना है रस", चाचा ने पूछा तो बड़ी मुश्किल से ना कर पाया| पेट में तो अब कोई जगह नहीं बची थी और मन था कि अभी भी भरा नहीं था| दोनों उठ कर घर पहुंचे जहाँ रग्घू की माँ उनका इंतज़ार कर रही थी|
"माँ, अभी कुछ नहीं खा पाएगा मनीष, दोपहर बाद खिलाना"|
मनीष ने भी हामी में सर हिलाया और बोला "यार, इतना प्यार और इतना अपनापन, जिसके यहाँ जाओ, अपना ही समझता है| सच में स्वर्ग ही है तुम्हारा गाँव"|
रग्घू ने हामी में सर हिलाया और सोचने लगा "हाँ, आपस में चाहे जितना भी भेद भाव हो, लेकिन किसी अतिथि के आगे आज भी लोग सारे वैर भूल जाते हैं| कम से कम इतना प्यार तो अभी भी बरकरार है, ये गाँव है"|

Tuesday, May 17, 2016

ये गाँव नहीं है--

आज एक महीना हो गया था उसे यहाँ आये और वो अजीब सी कश्मकश में थी| इतने दिनों में सिर्फ एक बार पडोसी के साथ चाय पी थी उसने, वो भी जब खुद वो पूछ बैठी थी उसके बारे में| बाकी तो उस बिल्डिंग के १० तल्ले में कितने ही लोग रहते थे, लेकिन लोगों की शक्लें भी मुश्किल से दिखती थी| बस एक कामवाली थी जो रोज आती थी और उससे कुछ बात हो जाती थी, लेकिन एक सीमा के बाद वो भी बात नहीं करती थी|
एक उसका गाँव था जहाँ हर घर सबका था, किसी के भी घर में चली जाती थी| हर किसी से कोई न कोई रिश्ता था और किसी की बात छुपती नहीं थी| लेकिन कभी कभी उसे लगता था कि कोई निजीपन नहीं है गाँव में, हर कोई हर किसी के व्यक्तिगत जीवन में दखल देने को तैयार| और यही नितांत निजता जो यहाँ मिल रही थी, शुरू में उसे काफी भली लगी थी| लेकिन कुछ ही दिनों में उसे ये एकांत खलने लगा|  
विनीत बार बार समझाता "यहाँ इसी तरह जीवन चलता है और जितना जल्दी अपने को इसके हिसाब से ढाल लोगी, उतना बढ़िया रहेगा तुम्हारे लिए"| वो भी कोशिश तो कर ही रही थी, लेकिन जिंदगी को जीने के ढंग को बदलने में समय तो लगता ही है| इन्हीं सोचों में डूबी हुई थी वो कि दरवाजे की घंटी बजी और उसने बिना समय गंवाए दरवाज़ा खोल दिया| सामने एक नौजवान खड़ा था एक बैग लटकाए और उसने बेहद अदब से पूछा "मैडम, बर्तन चमकाने का नया साबुन है, देख लीजिए"|
उसे तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गयी थी "अंदर आ जाओ, देखती हूँ"|
नौजवान भी शायद इस जवाब के लिए तैयार नहीं था, हिचकते हुए अंदर आया| कुछ ही देर में उसके सारे प्रोडक्ट वहाँ फर्श पर पड़े थे और वो उससे उसके घर परिवार के बारे में बात कर रही थी| युवक भी काफी खुल गया था और उसने भी अपने अब दीदी कहना शुरू कर दिया था| दोनों की ही जड़ें गाँव से जुडी थीं इसीलिए एक भावनात्मक सम्बन्ध जुड़ गया|
अपने कई प्रोडक्ट काफी कम कीमत में बेचने के बाद जब युवक चलने को हुआ तो बोला "दीदी, आप अभी नयी आई हैं शहर में, लेकिन जरा ध्यान से रहिये| किसी के भी इस तरह घंटी बजाने पर दरवाज़ा मत खोल दीजिये, ये गाँव नहीं है", और वो हाथ जोड़ता हुआ चला गया|
उसने सब सामान उठा के रखा और उसके मुंह से भी निकल गया " हाँ, ये गाँव नहीं है "|  

Monday, May 16, 2016

खून के दाग--लघुकथा

नर्स ने आकर बताया कि सब तैयारी हो गयी है तो वो अस्पताल के कमरे की तरफ चल दी। आज पहली बार वो ये केस करने जा रही थी, नर्स ने बताया था कि उसके पहले वाली डॉक्टर ने बहुत पैसे कमाए थे इस काम में। उसे थोड़ी हिचक तो हुई लेकिन मिलने वाले पैसे ने मन बदल गया।
बिस्तर पर लेटी हुई औरत ठीक घर की ही लग रही थी लेकिन उसके पेट में मादा भ्रूण पल रहा था और उसके घर वाले एबॉर्शन करवाना चाहते थे। जैसे ही वो उसके पास जाकर खड़ी हुई, उस औरत ने उसे बेहद कातर निगाह से देखा। उसने उसकी तरफ से अपना ध्यान हटाना चाहा लेकिन उसकी निगाहों ने उसे जड़ कर दिया। अचानक़ उसे कुछ ही दिन पहले पढ़ा एक उपन्यास याद आ गया जिसमें दंगे में लोगों ने गर्भवती औरतों के पेट को चीर कर माँ और बच्चे दोनों को मार डाला था।
उसे लगा जैसे उसके हाथ में भी तलवार हो और वो भी उस दंगे में शामिल हो। उसके हाथ से औज़ार छूट कर गिर गया और वो बेसिन की तरफ भागी । पानी से मुँह धोने के बाद उसने नर्स से उस औरत को वापस चले जाने को कहा और आकर अपने कमरे में बैठ गयी। अपने चेहरे पर आये पसीने को पोंछते हुए उसे अपने हाथों को देखा, खून के दाग कहीं नज़र नहीं आ रहे थे। 

एक नयी सुबह--

सुबह शोर से उसकी आँख खुल गयी, दिन काफी चढ़ आया था। एकदम से बदबू का भभका उसकी नाक में घुसा, हड़बड़ा कर वो उठ गयी, नयी जगह पर पहला ही दिन था लेकिन नींद आ गयी थी उसे। रात में भी उसे बदबू आई थी लेकिन काफी थक गयी थी और कब सो गयी, उसे पता ही नहीं चला। जमीन पर बिछे बिस्तर पर बगल में रग्घू अभी भी सोया हुआ था, एक मुस्कान आ गयी उसके चेहरे पर।
वो धीरे से उठी और उसने दरवाज़ा खोल कर बाहर देखा। बाहर का दृश्य देखकर उसे उबकाई आ गयी, बड़ी मुश्किल से उसने अपनी उल्टी रोकी। ठीक दरवाजे सामने बदबूदार नाला बह रहा था और दूसरी तरफ ढेर सारे सुअर गंदगी में मुँह मार रहे थे। बगल के कमरे से आवाज़ें तेज हो गईं और किसी पुरुष के चिल्लाने और नारी के सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उसने दरवाज़ा बंद कर दिया और सर पकड़ कर बैठ गयी। ऐसी जगह की कल्पना तो वो नहीं करती थी और अब उसे लगा कि रग्घू क्यूँ उसे मना करता था यहाँ आने के लिए।
उसे अपना गाँव याद आने लगा, कितना साफ़ सुथरा घर था उसका। मकान मिटटी का ही था लेकिन कहीं भी ऐसी बदबू नहीं थी। एक देसी गाय थी जो थोड़ा बहुत दूध भी दे देती थी, हाँ खेती बाड़ी नहीं थी। मजदूरी मिलने में दिक्कत के चलते ही रग्घू साल भर पहले यहाँ आ गया था और हर चार छः महीने में गाँव आ जाता था। रग्घू की माँ और अगल बगल की औरतें उसका ध्यान भी रखती थीं और जीवन ठीक ही बीत रहा था। अब उसे अपने पर क्षोभ हो रहा था कि क्यों वो लोगों की बातों में आकर शहर आने की जिद कर बैठी। उसने जितना जल्दी हो सके, वापस जाने का सोच लिया और रग्घू को जगाने लगी।

Friday, May 13, 2016

अधूरी कहानी

अपने पेशे में कभी भी रश्मि को इतनी परेशानी नहीं आई थी, एकदम से उलझ के रह गयी थी वो| महिला डॉक्टर होने के चलते बहुत से डिलीवरी के केस आते थे और उतने ही एबॉर्शन के, लेकिन ये केस तो कुछ अजीब ही था| जब वो महिला उसके पास आई तो उसे भी पता नहीं था कि इतनी समस्या हो सकती है| स्वास्थ्य खराब था उसका लेकिन अमूमन गरीब घरों की औरतों का यही हाल रहता है, सोचकर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया| बच्चे का विकास ठीक ही लग रहा था लेकिन उसके पीले चेहरे को देखते हुए उसने उसे कुछ आयरन की गोलियां दे दी और खून की जाँच के लिए भी लिख दिया| उसका पहला बच्चा था और वो किसी भी कीमत पर उसे जन्म देना चाहती थी| बातों बातों में ही वो बोली " डॉक्टर साहब, पहला बच्चा है और काफी दिन बाद हो रहा है| जरा ध्यान रखिएगा, बहुत पैसा नहीं है हमारे पास "|
रश्मि ने सोचा कि इसके परिवार के बारे में भी पता लगाया जाए, क्योंकि उसका पति साथ नहीं आया था। पूछने पर उसने बताया कि उसका पति कहीं बाहर काम करता है और साल में दो बार आता है| किसी फैक्ट्री में काम करता है और वहाँ अकेले ही रहता है, कुछ पैसे भेजता रहता है जिससे खर्च चल जाता है। वो भी कुछ घरों में काम कर लेती है और इस तरह जिंदगी कुछ शिकायतों और छोटी छोटी खुशियों के सहारे बीत रही है।
खैर कुछ देर बात करके वो चली गयी और रश्मि भी दूसरे मरीजों को देखने में उलझ गयी। अगले दिन तक ब्लड टेस्ट की जानी थी और उसके बाद कुछ और दवाईयाँ देनी पड़ें शायद,रश्मि ने यही सोचा था।
लेकिन उसकी रिपोर्ट ने एकदम से हिला दिया उसे| रश्मि ने एच आई वी टेस्ट के लिए भी लिख दिया था, जो कि आजकल एक रूटीन सा हो गया था। सामान्यतयाः ये टेस्ट नेगेटिव ही होती थी लेकिन इसकी रिपोर्ट पॉजिटिव थी और बच्चे में भी संक्रमण होने की पूरी उम्मीद थी| लगभग छह महीने बीत चुके थे और ऐसे में बच्चे का एबॉर्शन बहुत मुश्किल था| लेकिन उसे जन्म देना भी उतना ही मुश्किल लग रहा था रश्मि को| उसके नंबर पर फोन करके रश्मि ने बुलाया और बहुत देर तक कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पायी| फिर किसी तरह उसे कुछ विटामिन्स और अन्य दवाएं देकर अगले दिन फिर आने को कह दिया|
उसके जाने के बाद उसने कई सीनियर डॉक्टर्स से राय, मशविरा किया लेकिन हर डॉक्टर उसके बच्चे को लेकर आशंकित था| पूरी रात वो उलझी रही, कैसे बताये कि उसे ये बीमारी है और बच्चे के ऊपर भी खतरा है| लेकिन कोई और रास्ता भी तो नहीं था, रह रह के उसका पीला लेकिन प्रसन्न चेहरा दिखता था|

Thursday, May 12, 2016

ताक़त--

अचानक ट्रैफिक सिग्नल पर उसकी नज़र बगल वाली कार पर पड़ी| रूचि को पहचानते ही उसकी निगाह चमक गयी और चेहरे पर मुस्कराहट छा गयी| पढ़ाई के दिनों में साइकिल भी नहीं चला पाने वाली रूचि आज इस बेहद ट्रैफिक वाले एरिया में खुद कार ड्राइव कर रही है| अपना हाथ उठा कर उसने इशारा किया और फिर उस कार से भी हाथ उठा| अभी वो कुछ कहता कि सिग्नल हरा हो गया और कार आगे बढ़ गयी|
वो पिछली यादों में खो गया, एक साथ पढ़ते थे दोनों| लेकिन सामाजिक स्तर में काफी फ़र्क़ था और इसी वजह से वो कभी भी आगे नहीं बढ़ा| रूचि ने तो लगभग फैसला कर लिया था कि वो उसी से शादी करेगी| एक दिन उसने काफी पीते हुए कह भी दिया था इस बात को, सोचता तो वह भी था लेकिन उसे अपनी स्थिति पता थी|
" मैं तुमसे अलग होकर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती ", रूचि ने जब ये बात कही तो वो भीतर तक काँप गया|
" तुम जानती हो रूचि ये संभव नहीं है, इसलिए ये जिद छोड़ दो| सिर्फ एक बात का जवाब दो मुझे कि प्यार कमजोरी कैसे हो सकती है तुम्हारी, इसे अपनी ताकत बनाओ "|
आज कई सालों बाद उसने देखा था रूचि को और उसका प्यार की ताक़त पर यकीन और पुख्ता हो गया| 

Monday, May 9, 2016

माई--

सुघरी गोबर पाथ कर उठी और उसी हाथ से लटक आये बाल को ठीक करते हुए हाथ धोने चल दी| खूँटा पर बंधी गइया उसको देख कर हुलसी तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी| दूर से ही उसने उसे पुचकारा तो उसने भी अपना सर हिला कर प्यार जतलाया| वो बाल्टी की तरफ बढ़ी और बैठ कर लोटा से पानी निकाल कर हाथ धोने लगी| सब कुछ रोज जैसा ही था, रग्घू ठाकुर के खेत में गोड़ाई करने गया था और बेटी उन्हीं के घर बर्तन मांजने| उसे स्कूल भेजने की न तो हिम्मत थी और न ही इच्छा और वो घर के काम में थोड़ी मदद भी कर देती थी| आखिर उसे भी किसी और के घर ही तो जाना था शादी के बाद|
हाथ धोकर सुधरी उठी तभी बेटी दौड़ते हुए दलान में घुसी| उसके हाथ में एक पैकेट था और उसका चेहरा काफी प्रसन्न दिख रहा था| वो अभी कुछ पूछती तभी बेटी हाँफते हुए बोली " माई, जानत हो आज का मिला है हमका, मिठाई और पकौड़ी भी "|
सुधरी ने सोचा जरूर कोई त्यौहार होगा उनका, क्योंकि उसे तो किसी त्यौहार के बारे में याद नहीं था| उसने थोड़े आश्चर्य से पूछा " कौने बात पर इ मिठाई और पकौड़ी दिया हैं तुमको, हमका तो कउनो त्यौहार याद नहीं है "|
" अरे आज सबेरे ठकुराइन क बिटिया शहर से आई और उसने खूब मिठाई और गिफट अपने माई को दिया| उ का तो कहत रही कि आज मदर डे हौ और आज माई के लिए बहुत ख़ुशी क दिन हौ ", बेटी ने अपने रौ में बोलते हुए अखबार खोल कर उसके सामने रख दिया| सुधरी ने उसमे से एक मिठाई और पकौड़ी निकाल कर रग्घू के लिए रख दिया और बची हुई एक मिठाई से एक छोटा सा टुकड़ा लेकर बाकी सब बेटी को खिला दिया| फिर उठकर एक लोटा पानी निकाल कर बेटी के सामने रख दिया|
बेटी मिठाई और पकौड़ी खाकर पानी पी रही थी, सुघरी उठकर लकड़ी तोड़कर चूल्हा पर रख रही थी| उसे खाना पकाना था बेटी और रग्घू के लिए| उधर ठाकुर के घर ठकुराइन को केक और मिठाईयों के साथ गिफ्ट भी मिल रहा था, आखिर आज मदर डे जो था|

ममत्व--

एक बार फिर उसने रोते हुए बच्चे की ओर देखा और फिर दूध के भगौने को। दूध ख़त्म हो गया था और उसका सीना भी खाली था और यादवजी का भी पता नहीं था। उसने बच्चे को गोद में उठाया और पुचकारते हुए बाहर आ गयी, दूध दुहने की बाल्टी रखी हुई थी और गाय भी रम्भा रही थी। तभी यादवजी अपने साइकिल से उतरे और जल्दी से बाल्टी उठाकर गाय दुहने चल दिए।
" थोड़ी देर हो गयी आज भौजी, अभी लगाते हैं गाय " कहते हुए यादवजी ने जल्दी से बछड़े को खूँटे से खोला और बाल्टी लेकर दूध दुहने बैठ गए। वो भी वहीँ खड़ी देख रही थी। बछड़े ने गाय के थन में मुँह लगाया और दूध पीने लगा। शायद दो चार घूँट ही गया होगा उसके मुँह में तभी यादवजी ने उसे हटाकर खूँटे से बाँध दिया। बछड़ा एकदम अनमना हो गया और वो बार बार थन की तरफ देख रहा था, गाय उसे प्यार से चाट रही थी।
उसकी नज़र एक बार बछड़े पर पड़ी और फिर उसने ममतामयी गाय को देखा। उसके बच्चे का रोना बंद हो गया था, शायद गोद में सो गया था।
" यादवजी, रहने दीजिये अब और बछड़े को खोल दीजिये " उसने यादवजी को कहा। यादवजी ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा और बाल्टी का थोड़ा सा दूध लेकर उठ गए।
बछड़ा अब खूब हुलस हुलस कर दूध पी रहा था और उसे लग रहा था जैसे उसके सीने में भी दूध उतर आया हो।