Translate

Monday, May 16, 2016

एक नयी सुबह--

सुबह शोर से उसकी आँख खुल गयी, दिन काफी चढ़ आया था। एकदम से बदबू का भभका उसकी नाक में घुसा, हड़बड़ा कर वो उठ गयी, नयी जगह पर पहला ही दिन था लेकिन नींद आ गयी थी उसे। रात में भी उसे बदबू आई थी लेकिन काफी थक गयी थी और कब सो गयी, उसे पता ही नहीं चला। जमीन पर बिछे बिस्तर पर बगल में रग्घू अभी भी सोया हुआ था, एक मुस्कान आ गयी उसके चेहरे पर।
वो धीरे से उठी और उसने दरवाज़ा खोल कर बाहर देखा। बाहर का दृश्य देखकर उसे उबकाई आ गयी, बड़ी मुश्किल से उसने अपनी उल्टी रोकी। ठीक दरवाजे सामने बदबूदार नाला बह रहा था और दूसरी तरफ ढेर सारे सुअर गंदगी में मुँह मार रहे थे। बगल के कमरे से आवाज़ें तेज हो गईं और किसी पुरुष के चिल्लाने और नारी के सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उसने दरवाज़ा बंद कर दिया और सर पकड़ कर बैठ गयी। ऐसी जगह की कल्पना तो वो नहीं करती थी और अब उसे लगा कि रग्घू क्यूँ उसे मना करता था यहाँ आने के लिए।
उसे अपना गाँव याद आने लगा, कितना साफ़ सुथरा घर था उसका। मकान मिटटी का ही था लेकिन कहीं भी ऐसी बदबू नहीं थी। एक देसी गाय थी जो थोड़ा बहुत दूध भी दे देती थी, हाँ खेती बाड़ी नहीं थी। मजदूरी मिलने में दिक्कत के चलते ही रग्घू साल भर पहले यहाँ आ गया था और हर चार छः महीने में गाँव आ जाता था। रग्घू की माँ और अगल बगल की औरतें उसका ध्यान भी रखती थीं और जीवन ठीक ही बीत रहा था। अब उसे अपने पर क्षोभ हो रहा था कि क्यों वो लोगों की बातों में आकर शहर आने की जिद कर बैठी। उसने जितना जल्दी हो सके, वापस जाने का सोच लिया और रग्घू को जगाने लगी।

No comments:

Post a Comment