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Monday, May 23, 2016

समय और रिश्ते--

"बहुत हो चुका, अब राजू को बोल ही दूंगी, आखिर कब तक ये मनमानी करेगी", बाहर पेड़ की छाया में बैठ कर अखबार पढ़ते हुए पति के पास आकर वो बोली|
"हूँ" बोलकर वो वापस अखबार में घुस गया| मन तो उसका भी नहीं था पढ़ने में, रोज एक सी ख़बरें आती थीं, लेकिन इसी बहाने कुछ समय बच जाता था खिटपिट सुनने से|
"आप तो बोलना नहीं चाहते तो मैं ही बोल दूंगीं उसको", बोलते हुए वो भी उनके पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी|
एक बार उसने पत्नी की तरफ देखा, बेहद दुखी लग रही थी| वो सोचने लगा, जब भी ये पोते को खिलाने के लिए जाती है, बहू किसी न किसी बात पर टोक देती है| और फिर शुरू हो जाती है ये खिटपिट|
"अच्छा बताओ तो, हुआ क्या है", अब वो उसकी तरफ घूम गया था|
"उसे लगता है जैसे मैंने बच्चे पाले ही नहीं, अपने पति को तो देखे| मैंने सोचा कि बच्चे को थोड़ी देर बाहर घुमा लाऊँ तो कहती है कि इतनी धूप में कहाँ ले जाएँगी", उसने पति की तरफ आशा भरी निगाह से देखा|
"ठीक ही तो कहती है, इतनी धूप में मासूम को कहीं नुक्सान न पहुंचे| तुम अपना समय भूल गयी?", उसने समझाने की कोशिश की|
"मेरे समय में मेरा बच्चा मेरे पास कहाँ रहता था, वो तो हमेशा दूसरे बड़ों के पास ही रहता था"|
"तो क्या तुम्हें चिंता नहीं होती थी? होती तो थी ना, बस तुम कुछ कह नहीं पाती थी क्योंकि वो समय अलग था| अब समय बदल गया है तो हमें भी तो बदलना होगा", समझाते हुए उसने कहा|
पत्नी का भी मन थोड़ा ठंडा हो गया था, उसने फीकी मुस्कराहट उसकी ओर डालते हुए कहा "चलो अब अंदर बैठो, बाहर तापमान कितना बढ़ गया है"| मुस्कुराते हुए उसने पत्नी का हाथ पकड़ा और अंदर चल पड़ा, बाहर सच में गर्मी बढ़ गयी थी|    

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