"वॉव, कितना गज़ब लगता है ना यहाँ, सच में यहाँ के लोग कितने लकी हैं", मनीष ऑंखें फाड़ फाड़ के सब देख रहा था| आज पहली बार वो गाँव आया था और रास्ते भर भी वो बहुत एक्साईटेड था| रग्घू ने आज उसको बोला था अपने गाँव चलने के लिए और साइकिल से २५ किमी की दूरी कैसे तय हो गयी, दोनों को पता ही नहीं चला| घर पर साइकिल खड़ा करके जल्दी से मनीष ने पानी पिया और खेत देखने चल पड़ा|
गाँव से बाहर निकलते समय मनीष ने चरनी पर खड़ी गायें देखीं और दूर से ही सहला कर ख़ुशी ख़ुशी आगे बढ़ गया| एक दरवाजे पर गन्ना की पेराई चल रही थी और वो खड़ा हो गया| उसकी निगाहें बता रही थीं कि उसे गन्ने का रस पीना है, लेकिन रग्घू ने उसे वापसी में पिलाने को बोला और खेत की तरफ ले चला| तब तक कुछ छोटे, बड़े बच्चे भी साथ लग गए, उन्हें भी मज़ा आ रहा था किसी लड़के को जीन्स पहन कर गाँव में घूमते देख कर|
एक मटर के खेत में मटर की तुड़ाई चल रही थी और मनीष वहीँ पर खड़ा हो गया| खेत वाले ने देखा कि कोई शहरी लड़का रग्घू के साथ खड़ा है तो उसने उसे बुलाया "आ जाओ बाबू, मटर खाओगे"|
मनीष को तो जैसे उसके मन की मुराद मिल गयी, घुस गया खेत में| एकदम हरी, ताज़ी मटर, जो उसने कभी देखीं भी नहीं थी, तोड़ कर उसने खाना शुरू कर दिया| उसके चेहरे की ख़ुशी वहां मौजूद सभी लोगों को साफ़ साफ़ दिख रही थी| थोड़ा मटर खाने के बाद रग्घू ने उसे टोका "ज्यादा मत खा, नहीं तो दस्त होने लगेंगे "|
बुझे मन से वो आगे बढ़ा, ठण्ड काफी थी और चारो तरफ सरसो के फूलों का पीला रंग बिखरा पड़ा था| कुछ खेतों में आलू भी खोदा जा रहा था तो कहीं गेहू के खेत भी अपना हरापन दिखा रहे थे| रग्घू उसे अपने गन्ने के खेत पर ले गया, सौभाग्य से बिजली थी अभी और पम्पिंग सेट चल रहा था| उससे निकलते गरम पानी में दोनों ने हाथ मुंह धोया और फिर मनीष को लेकर गन्ने के खेत की ओर चला|
"मैं तोडूंगा गन्ना", कहते हुए मनीष ने एक गन्ना तोड़ने की कोशिश की लेकिन तोड़ नहीं पाया|
"रहने दो, मैं तोड़ देता हूँ", कहते हुए रग्घू ने गन्ना तोडा और मनीष को थमा दिया| एक गन्ना उसने भी तोड़ लिया था और आकर नाली में पैर डालकर बैठ गया| गरम पानी बहुत सुकून दे रहा था उनके पैरों को और मनीष चारो तरफ यूँ देख रहा था जैसे सब कुछ आँखों में भर लेना चाहता हो| जैसे तैसे उसने रग्घू कोदेख कर मुंह से गन्ना चूसने की कोशिश की और थोड़ी देर में ही रुक गया| आदत नहीं थी तो जबड़े दर्द करने लगे थे उसके, लेकिन रग्घू बड़े मजे में गन्ना चूसता रहा|
" यार, गन्ना है तो बहुत मस्त, लेकिन आसान नहीं है चूसना", मनीष ने रग्घू को देखते हुए कहा और दोनों हाथ धोकर उठ खड़े हुए|
"चलो वापस घर चलते हैं, कुछ खाने के लिए बन गया होगा", रग्घू ने मनीष को लगभग धकेलते हुए कहा| दोनों बात करते हुए वापस गाँव पहुंचे, लेकिन मनीष फिर उसी दरवाज़े पर रुक गया जहाँ गन्ने की पेराई हो रही थी|
"अरे चाचा, एक लोटा रस तो दो, ये आज पहली बार पिएगा ऐसा रस"|
चाचा ने एक लोटा रस निकाला और कहा "कचालू बना है, पहले खा लो, फिर पीना रस", और उन्होंने घर में आवाज़ दिया कचालू के लिए|
दोनों वहीँ रखी खटिया पर बैठ गए, कटोरे में गरम गरम कचालू आ गया| मनीष को तो जैसे लगा कि उसे अमृत मिल गया हो| जल्दी जल्दी उसने कचालू ख़त्म किया और लोटे से रस निकाल कर पीने लगा| कचालू के बाद रस ने तो जैसे उसपर जादू कर दिया, इतना बढ़िया तो आजतक उसे कोई भी कोल्ड ड्रिंक नहीं लगा था|
"और पीना है रस", चाचा ने पूछा तो बड़ी मुश्किल से ना कर पाया| पेट में तो अब कोई जगह नहीं बची थी और मन था कि अभी भी भरा नहीं था| दोनों उठ कर घर पहुंचे जहाँ रग्घू की माँ उनका इंतज़ार कर रही थी|
"माँ, अभी कुछ नहीं खा पाएगा मनीष, दोपहर बाद खिलाना"|
मनीष ने भी हामी में सर हिलाया और बोला "यार, इतना प्यार और इतना अपनापन, जिसके यहाँ जाओ, अपना ही समझता है| सच में स्वर्ग ही है तुम्हारा गाँव"|
रग्घू ने हामी में सर हिलाया और सोचने लगा "हाँ, आपस में चाहे जितना भी भेद भाव हो, लेकिन किसी अतिथि के आगे आज भी लोग सारे वैर भूल जाते हैं| कम से कम इतना प्यार तो अभी भी बरकरार है, ये गाँव है"|
गाँव से बाहर निकलते समय मनीष ने चरनी पर खड़ी गायें देखीं और दूर से ही सहला कर ख़ुशी ख़ुशी आगे बढ़ गया| एक दरवाजे पर गन्ना की पेराई चल रही थी और वो खड़ा हो गया| उसकी निगाहें बता रही थीं कि उसे गन्ने का रस पीना है, लेकिन रग्घू ने उसे वापसी में पिलाने को बोला और खेत की तरफ ले चला| तब तक कुछ छोटे, बड़े बच्चे भी साथ लग गए, उन्हें भी मज़ा आ रहा था किसी लड़के को जीन्स पहन कर गाँव में घूमते देख कर|
एक मटर के खेत में मटर की तुड़ाई चल रही थी और मनीष वहीँ पर खड़ा हो गया| खेत वाले ने देखा कि कोई शहरी लड़का रग्घू के साथ खड़ा है तो उसने उसे बुलाया "आ जाओ बाबू, मटर खाओगे"|
मनीष को तो जैसे उसके मन की मुराद मिल गयी, घुस गया खेत में| एकदम हरी, ताज़ी मटर, जो उसने कभी देखीं भी नहीं थी, तोड़ कर उसने खाना शुरू कर दिया| उसके चेहरे की ख़ुशी वहां मौजूद सभी लोगों को साफ़ साफ़ दिख रही थी| थोड़ा मटर खाने के बाद रग्घू ने उसे टोका "ज्यादा मत खा, नहीं तो दस्त होने लगेंगे "|
बुझे मन से वो आगे बढ़ा, ठण्ड काफी थी और चारो तरफ सरसो के फूलों का पीला रंग बिखरा पड़ा था| कुछ खेतों में आलू भी खोदा जा रहा था तो कहीं गेहू के खेत भी अपना हरापन दिखा रहे थे| रग्घू उसे अपने गन्ने के खेत पर ले गया, सौभाग्य से बिजली थी अभी और पम्पिंग सेट चल रहा था| उससे निकलते गरम पानी में दोनों ने हाथ मुंह धोया और फिर मनीष को लेकर गन्ने के खेत की ओर चला|
"मैं तोडूंगा गन्ना", कहते हुए मनीष ने एक गन्ना तोड़ने की कोशिश की लेकिन तोड़ नहीं पाया|
"रहने दो, मैं तोड़ देता हूँ", कहते हुए रग्घू ने गन्ना तोडा और मनीष को थमा दिया| एक गन्ना उसने भी तोड़ लिया था और आकर नाली में पैर डालकर बैठ गया| गरम पानी बहुत सुकून दे रहा था उनके पैरों को और मनीष चारो तरफ यूँ देख रहा था जैसे सब कुछ आँखों में भर लेना चाहता हो| जैसे तैसे उसने रग्घू कोदेख कर मुंह से गन्ना चूसने की कोशिश की और थोड़ी देर में ही रुक गया| आदत नहीं थी तो जबड़े दर्द करने लगे थे उसके, लेकिन रग्घू बड़े मजे में गन्ना चूसता रहा|
" यार, गन्ना है तो बहुत मस्त, लेकिन आसान नहीं है चूसना", मनीष ने रग्घू को देखते हुए कहा और दोनों हाथ धोकर उठ खड़े हुए|
"चलो वापस घर चलते हैं, कुछ खाने के लिए बन गया होगा", रग्घू ने मनीष को लगभग धकेलते हुए कहा| दोनों बात करते हुए वापस गाँव पहुंचे, लेकिन मनीष फिर उसी दरवाज़े पर रुक गया जहाँ गन्ने की पेराई हो रही थी|
"अरे चाचा, एक लोटा रस तो दो, ये आज पहली बार पिएगा ऐसा रस"|
चाचा ने एक लोटा रस निकाला और कहा "कचालू बना है, पहले खा लो, फिर पीना रस", और उन्होंने घर में आवाज़ दिया कचालू के लिए|
दोनों वहीँ रखी खटिया पर बैठ गए, कटोरे में गरम गरम कचालू आ गया| मनीष को तो जैसे लगा कि उसे अमृत मिल गया हो| जल्दी जल्दी उसने कचालू ख़त्म किया और लोटे से रस निकाल कर पीने लगा| कचालू के बाद रस ने तो जैसे उसपर जादू कर दिया, इतना बढ़िया तो आजतक उसे कोई भी कोल्ड ड्रिंक नहीं लगा था|
"और पीना है रस", चाचा ने पूछा तो बड़ी मुश्किल से ना कर पाया| पेट में तो अब कोई जगह नहीं बची थी और मन था कि अभी भी भरा नहीं था| दोनों उठ कर घर पहुंचे जहाँ रग्घू की माँ उनका इंतज़ार कर रही थी|
"माँ, अभी कुछ नहीं खा पाएगा मनीष, दोपहर बाद खिलाना"|
मनीष ने भी हामी में सर हिलाया और बोला "यार, इतना प्यार और इतना अपनापन, जिसके यहाँ जाओ, अपना ही समझता है| सच में स्वर्ग ही है तुम्हारा गाँव"|
रग्घू ने हामी में सर हिलाया और सोचने लगा "हाँ, आपस में चाहे जितना भी भेद भाव हो, लेकिन किसी अतिथि के आगे आज भी लोग सारे वैर भूल जाते हैं| कम से कम इतना प्यार तो अभी भी बरकरार है, ये गाँव है"|
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