एक बार फिर उसने रोते हुए बच्चे की ओर देखा और फिर दूध के भगौने को। दूध ख़त्म हो गया था और उसका सीना भी खाली था और यादवजी का भी पता नहीं था। उसने बच्चे को गोद में उठाया और पुचकारते हुए बाहर आ गयी, दूध दुहने की बाल्टी रखी हुई थी और गाय भी रम्भा रही थी। तभी यादवजी अपने साइकिल से उतरे और जल्दी से बाल्टी उठाकर गाय दुहने चल दिए।
" थोड़ी देर हो गयी आज भौजी, अभी लगाते हैं गाय " कहते हुए यादवजी ने जल्दी से बछड़े को खूँटे से खोला और बाल्टी लेकर दूध दुहने बैठ गए। वो भी वहीँ खड़ी देख रही थी। बछड़े ने गाय के थन में मुँह लगाया और दूध पीने लगा। शायद दो चार घूँट ही गया होगा उसके मुँह में तभी यादवजी ने उसे हटाकर खूँटे से बाँध दिया। बछड़ा एकदम अनमना हो गया और वो बार बार थन की तरफ देख रहा था, गाय उसे प्यार से चाट रही थी।
उसकी नज़र एक बार बछड़े पर पड़ी और फिर उसने ममतामयी गाय को देखा। उसके बच्चे का रोना बंद हो गया था, शायद गोद में सो गया था।
" यादवजी, रहने दीजिये अब और बछड़े को खोल दीजिये " उसने यादवजी को कहा। यादवजी ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा और बाल्टी का थोड़ा सा दूध लेकर उठ गए।
बछड़ा अब खूब हुलस हुलस कर दूध पी रहा था और उसे लग रहा था जैसे उसके सीने में भी दूध उतर आया हो।
" थोड़ी देर हो गयी आज भौजी, अभी लगाते हैं गाय " कहते हुए यादवजी ने जल्दी से बछड़े को खूँटे से खोला और बाल्टी लेकर दूध दुहने बैठ गए। वो भी वहीँ खड़ी देख रही थी। बछड़े ने गाय के थन में मुँह लगाया और दूध पीने लगा। शायद दो चार घूँट ही गया होगा उसके मुँह में तभी यादवजी ने उसे हटाकर खूँटे से बाँध दिया। बछड़ा एकदम अनमना हो गया और वो बार बार थन की तरफ देख रहा था, गाय उसे प्यार से चाट रही थी।
उसकी नज़र एक बार बछड़े पर पड़ी और फिर उसने ममतामयी गाय को देखा। उसके बच्चे का रोना बंद हो गया था, शायद गोद में सो गया था।
" यादवजी, रहने दीजिये अब और बछड़े को खोल दीजिये " उसने यादवजी को कहा। यादवजी ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा और बाल्टी का थोड़ा सा दूध लेकर उठ गए।
बछड़ा अब खूब हुलस हुलस कर दूध पी रहा था और उसे लग रहा था जैसे उसके सीने में भी दूध उतर आया हो।
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