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Thursday, May 26, 2016

उपयोगिता--लघुकथा

उस बच्चे ने वहाँ पड़ी अधजली लकड़ियाँ उठाईं और उन्हें अपने हाथों में उठाकर चल पड़ा। पहले उसे लगा कि शायद वो उन लकड़ियों को घाट की लकड़ियों की दुकान में ही रख देगा जिससे वो वापस बिक सकें, लेकिन लड़का लकड़ियाँ सम्भाले घाट की सीढियाँ चढ़ते ऊपर जाने लगा। उत्सुकतावश उसने लड़के को आवाज़ लगायी तो लड़का डरकर भागा, वो भी उसके पीछे चल पड़ा। लड़का गलियों से होता हुआ एक अधगिरे घर के अंदर दाखिल हुआ और वो उस घर के सामने खड़ा हो गया। बाहर से किसी बेहद निर्धन का घर लग रहा था, लेकिन उसे अभी भी बड़ा अजीब लग रहा था कि वो इन लकड़ियों को यहाँ लाया है।
कुछ देर खड़े रहने के बाद उसने जर्जर दरवाजे की साँकल खड़खड़ाई, अंदर से कांपती आवाज़ आई "कौन है, आ जाओ"।
वो अन्दर घुसा, सामने एक बुढ़िया चूल्हे में लकड़ियां डाल कर उन्हें फूँक रही थी। लकड़ियाँ कुछ गीली थीं इसलिए धीरे धीरे सुलग रही थीं| उसे याद आया कि घाट पर चिता जलने के बाद उसपर पानी डाल दिया गया था ताकि अस्थियाँ चुनी जा सकें। वो बच्चा वहीँ चूल्हे के पास बैठा था और इंतज़ार कर रहा था कि चूल्हे पर चढ़ा हुआ भात जल्दी से पके और वो खा सके। बुढ़िया ने उससे पूछा "कौन हो बेटा, किससे मिलना है"। बच्चा भी उसे थोड़े आश्चर्य से देखने लगा।
"कुछ नहीं माई, बस ऐसे ही आ गया था", बोलते हुए वो बाहर निकल गया। उसकी नज़र के सामने वही लकड़ियाँ घूम रही थीं जिनपर कुछ घण्टे पहले एक शरीर जला था और अब उसी पर जीवन जीने के लिए भोजन पक रहा था। कहीं पढ़ा हुआ उसके जेहन में कौंध गया "आग जलाती है तो जिलाती भी है"|
लकड़ियाँ तो वही थीं, बस उपयोगिता बदल गयी थी।

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