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Tuesday, May 24, 2016

हार या जीत--लघुकथा

"क्या जरुरत थी अदालत में जान बूझकर गलत बोलने की, आपको पता था ना कि वो झूठ बोल रहा है| एक मकान ही बचा था, वो भी चला गया", पत्नी बेहद दुखी थी|
"ये केस मैंने तो नहीं किया था, और मैं तो लड़ता भी नहीं, तुम्हारे चलते मैं आ गया| फिर मेरे लिए हार जीत कैसी, और तुम भी तो उसे हमेशा बेटे की तरह मानती थी"|
"इसीलिए तो इतना दुःख हो रहा है, अपनी संतान की तरह पाला था उसको मैंने| अपनी गोद में खिलाया है उसे और उसी ने ऐसा किया हमारे साथ", उसकी ऑंखें भर आई थीं|
"देखो, अब समय ही कितना बचा है अपने पास, पेंसन मिल ही रही है तो बीत ही जायेगा| लेकिन अपने मन में कटुता मत रखो उसके लिए, आखिर अपना ही तो है", कहते हुए पत्नी के कंधे पर हाथ रखा उसने और बाहर चल दिया|
"अपना ही तो है, आप अब भी यही कह रहे हो| अपने कहीं इस तरह करते हैं"|
"ठीक है, चलो छोडो इसे, और कौन उस मकान को हम अपने साथ लेकर जाते, उसका परिवार है और उसको ज्यादा जरुरत है", उसके मन में यही चल रहा था कि तुम भी गलत नहीं हो लेकिन अपनों से हारने में दुःख कहाँ होता है|     

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