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Monday, May 16, 2016

खून के दाग--लघुकथा

नर्स ने आकर बताया कि सब तैयारी हो गयी है तो वो अस्पताल के कमरे की तरफ चल दी। आज पहली बार वो ये केस करने जा रही थी, नर्स ने बताया था कि उसके पहले वाली डॉक्टर ने बहुत पैसे कमाए थे इस काम में। उसे थोड़ी हिचक तो हुई लेकिन मिलने वाले पैसे ने मन बदल गया।
बिस्तर पर लेटी हुई औरत ठीक घर की ही लग रही थी लेकिन उसके पेट में मादा भ्रूण पल रहा था और उसके घर वाले एबॉर्शन करवाना चाहते थे। जैसे ही वो उसके पास जाकर खड़ी हुई, उस औरत ने उसे बेहद कातर निगाह से देखा। उसने उसकी तरफ से अपना ध्यान हटाना चाहा लेकिन उसकी निगाहों ने उसे जड़ कर दिया। अचानक़ उसे कुछ ही दिन पहले पढ़ा एक उपन्यास याद आ गया जिसमें दंगे में लोगों ने गर्भवती औरतों के पेट को चीर कर माँ और बच्चे दोनों को मार डाला था।
उसे लगा जैसे उसके हाथ में भी तलवार हो और वो भी उस दंगे में शामिल हो। उसके हाथ से औज़ार छूट कर गिर गया और वो बेसिन की तरफ भागी । पानी से मुँह धोने के बाद उसने नर्स से उस औरत को वापस चले जाने को कहा और आकर अपने कमरे में बैठ गयी। अपने चेहरे पर आये पसीने को पोंछते हुए उसे अपने हाथों को देखा, खून के दाग कहीं नज़र नहीं आ रहे थे। 

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