Translate

Tuesday, May 17, 2016

ये गाँव नहीं है--

आज एक महीना हो गया था उसे यहाँ आये और वो अजीब सी कश्मकश में थी| इतने दिनों में सिर्फ एक बार पडोसी के साथ चाय पी थी उसने, वो भी जब खुद वो पूछ बैठी थी उसके बारे में| बाकी तो उस बिल्डिंग के १० तल्ले में कितने ही लोग रहते थे, लेकिन लोगों की शक्लें भी मुश्किल से दिखती थी| बस एक कामवाली थी जो रोज आती थी और उससे कुछ बात हो जाती थी, लेकिन एक सीमा के बाद वो भी बात नहीं करती थी|
एक उसका गाँव था जहाँ हर घर सबका था, किसी के भी घर में चली जाती थी| हर किसी से कोई न कोई रिश्ता था और किसी की बात छुपती नहीं थी| लेकिन कभी कभी उसे लगता था कि कोई निजीपन नहीं है गाँव में, हर कोई हर किसी के व्यक्तिगत जीवन में दखल देने को तैयार| और यही नितांत निजता जो यहाँ मिल रही थी, शुरू में उसे काफी भली लगी थी| लेकिन कुछ ही दिनों में उसे ये एकांत खलने लगा|  
विनीत बार बार समझाता "यहाँ इसी तरह जीवन चलता है और जितना जल्दी अपने को इसके हिसाब से ढाल लोगी, उतना बढ़िया रहेगा तुम्हारे लिए"| वो भी कोशिश तो कर ही रही थी, लेकिन जिंदगी को जीने के ढंग को बदलने में समय तो लगता ही है| इन्हीं सोचों में डूबी हुई थी वो कि दरवाजे की घंटी बजी और उसने बिना समय गंवाए दरवाज़ा खोल दिया| सामने एक नौजवान खड़ा था एक बैग लटकाए और उसने बेहद अदब से पूछा "मैडम, बर्तन चमकाने का नया साबुन है, देख लीजिए"|
उसे तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गयी थी "अंदर आ जाओ, देखती हूँ"|
नौजवान भी शायद इस जवाब के लिए तैयार नहीं था, हिचकते हुए अंदर आया| कुछ ही देर में उसके सारे प्रोडक्ट वहाँ फर्श पर पड़े थे और वो उससे उसके घर परिवार के बारे में बात कर रही थी| युवक भी काफी खुल गया था और उसने भी अपने अब दीदी कहना शुरू कर दिया था| दोनों की ही जड़ें गाँव से जुडी थीं इसीलिए एक भावनात्मक सम्बन्ध जुड़ गया|
अपने कई प्रोडक्ट काफी कम कीमत में बेचने के बाद जब युवक चलने को हुआ तो बोला "दीदी, आप अभी नयी आई हैं शहर में, लेकिन जरा ध्यान से रहिये| किसी के भी इस तरह घंटी बजाने पर दरवाज़ा मत खोल दीजिये, ये गाँव नहीं है", और वो हाथ जोड़ता हुआ चला गया|
उसने सब सामान उठा के रखा और उसके मुंह से भी निकल गया " हाँ, ये गाँव नहीं है "|  

No comments:

Post a Comment