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Wednesday, May 25, 2016

चाल --लघुकथा

"मालिक, आज भी रघुवा काम पर नहीं आया, लगता है उ शहरी बाबू के चक्कर में पड़ गया है| अंदेशा तो ठीक नहीं लगता है", कड़क मूछ वाले भूरा ने थोड़े चिंतित स्वर में कहा|
"हूँ, इ सब के सब इसी तरह बिगड़ने लगे तो काम कौन करेगा खेतों पर| अच्छा ये बताओ कि करता क्या है उ शहरी बाबू"| स्टूल पर उनके पास रखी हुई जलती लालटेन खुद का ही अँधेरा दूर करने में असफल थी|
"कुछ काम तो नहीं करता है, लेकिन किताब कॉपी बहुत है उसके पास| सबको इकठ्ठा करके कुछ तो पढ़ाता है और लोग भी बहुत ध्यान से सुनते हैं उसको", भूरा ने सारा ब्यौरा एक सांस में कह दिया|
मालिक के पेशानी पर बल पड़ गए, ये तो सोचा ही नहीं था उन्होंने| एकदम से उन्हें अपना बेटा याद आ गया, उनको क्या पता था कि पढ़ने के बाद लोगों की मति फिर जाती है, नहीं तो भेजते ही नहीं पढ़ने| जब गाँव वापस आया था तो उनको ही समझाने लगा था कि मजदूरों को उनके काम की वाजिब कीमत मिलनी चाहिए, लोगों के लिए चिकित्सा सेवाएं भी उपलब्ध होनी चाहिए, बच्चों के लिए स्कूल भी खोलना चाहिए| उन्होंने बहुत समझाया था कि सरपंच होने का मतलब ये थोड़े ही है कि सब पैसे इन्हीं लोगों पर उड़ा दिए जाये| लेकिन महीनों की असफ़ल बहस के बाद आखिर वो चला ही गया घर छोड़ कर और आज तक नहीं लौटा|
क्या करें, बेटे को तो कुछ कह नहीं सकते थे लेकिन इसका क्या करें| अगर ये ज्यादा दिन रहा तो पूरा माहौल ही खराब कर देगा और एक फैसला उन्होंने मन ही मन कर लिया|
थोड़ी देर बाद वो उस शहरी बाबू की कुटिया पर पहुंचे, वो बाहर ही खाट पर सो रहा था| वो धीरे से कुटिया के अंदर घुसे और वहां रखी सब किताबों को इकठ्ठा किया| झोले से केरोसिन का गैलन निकालकर उन्होंने किताबों पर डाला और माचिस निकालकर उसमें आग लगा दी| भागते हुए जब वो वापस आ रहे थे तो उन्हें अपने षड्यंत्र में सफलता मिलती नज़र आ रही| उनके जेहन में बेटे का कहा हुआ वाक़्य आज भी ताज़ा था "पिताजी, किताबों को पढ़िए तब समझ आता है कि सही क्या है और गलत क्या"| 

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