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Wednesday, January 15, 2014

युवा

विश्व युवा दिवस पर --
देश का युवा आज रास्ता भटक गया है | उसे सही मार्ग दिखाना होगा और उसकी ऊर्जा को उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना सिखाना होगा | प्रोफेसर साहब क्लास में बोल रहे थे और सभी स्टूडेंट्स उसे अपने सन्दर्भ में देख रहे थे | लेकिन वहीँ बैठी उनकी एक छात्रा समझ नहीं पा रही थी की आज का युवा मार्ग भटक गया है या ये बुज़ुर्ग | वो तो पूरी मेहनत और ईमानदारी से अपने प्रोजेक्ट को पूरा करने का प्रयास कर रही थी लेकिन प्रोफेसर साहब को उसके द्वारा किया गया कोई भी काम पसंद नहीं आता था | और कल तो उसे बहुत बड़ा सदमा तब लगा जब प्रोफेसर ने कहा की "शाम को घर आ जाना , प्रोजेक्ट की डिटेल्स समझा दूंगा "| प्रोफेसर घर पे अकेले रहते थे , ये उसे पता था और उसने तय कर लिया कि अपनी ऊर्जा को अब सही तरीके से इस्तेमाल करना होगा | अगले दिन अपने एक पत्रकार दोस्त को उसने साथ लिया और जैसे ही प्रोफेसर ने दरवाजा खोला , उसने तुरंत कहा कि इसे भी इस प्रोजेक्ट कि कुछ डिटेल्स समझना है | उस पत्रकार को वो भी जानते थे और अब प्रोजेक्ट पूरा होने लगा |
विनय

नेग

बधाई हो , बेटी हुई है | डॉक्टर ने जैसे ही बाहर आकर बताया , घर के सभी सदस्य खुश हो गए | नर्स बच्चे को लेकर थोड़ी देर बाद बाहर आयी और उसे उसके पिता को देकर जाने लगी |
अरे कहा जा रही हो , नेग तो लेती जाओ | दादी के ये शब्द सुनकर नर्स आश्चर्य से उनका मुह देखने लगी | शायद उसे बेटी के पैदा होने पर नेग नहीं मिलने की आदत पड़ चुकी थी |
विनय

बुलावा

आज क्या बात है , बड़े खुश दिख रहे हो | लगता है बेटे का बुलावा आ ही गया | बटोही ने ये सुनते ही हाँ में सर हिलाया और कहा " अरे अभी अभी सुंदर का फ़ोन आया था बंगलोर से , तुरंत हम दोनों को बुलाया है " और पुरे गाँव में घूम घूम कर बटोही सबको बताता रहा कि उसके लड़के ने कहा था न कि वह उन दोनों को शहर बुला लेगा | जाने की तैयारी होने लगी और दोनों मियां बीबी ढेर सारे सपने बुनने लगे |
उधर बंगलोर में सुंदर अपनी बीबी को समझा रहा था " आज कल घर में काम करने के लिए लोग कहा मिलते हैं , और मिल भी गए तो अनाप सनाप पैसे मांगते हैं | अच्छा है तुम्हे काम से फुर्सत मिलेगी और अपना नाम भी होगा की माँ बाप को अपने पास रखा है "
विनय

हैप्पी न्यू इयर

हैप्पी न्यू इयर , नया साल मुबारक | आतिशबाजियां छुड़ाते और एक दूसरे को मिठाई खिलाते हुए लोग जोर जोर से चिल्ला रहे थे और एक दूसरे को नया साल मंगलमय होने कि शुभकामना भी दे रहे थे |
उसी जगह भयानक ठण्ड में एक झोपडी में फटे हुए कम्बल में गुड़मुड़ पड़ा हुआ मजदुर सोच रहा था कि अपना तो पुराना साल भी ऐसा ही था और इस साल भी शायद कुछ न बदले | अपना अच्छा साल कब आयेगा |
विनय

Saturday, January 11, 2014

मजदूरी

हमें समाज के मजदूर वर्ग को किसी भी हालत में ऊपर उठाना ही होगा | और इस काम के लिए हम सभी को आगे आना पड़ेगा | आईये हम सब मिलकर ये प्रण करे कि समाज के बीच की खाई को जितना जल्दी हो सके ,पाट देंगे | हमें न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाना होगा और मजदुर वर्ग के सभी समस्याओं का हल निकालना होगा | शर्माजी मजदूर दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप भाषण दे रहे थे और उपस्थित लोगों ने सुनकर खूब ताली बजायी | 
घर पहुचने के बाद अभी चाय पी ही रहे थे कि लड़के ने बताया कि आज उसने सभी मजदूरो को मजदूरी दे दी है | लेकिन जब उनको पता चला कि उनके बुद्धजीवी बेटे ने सबको २०० रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी दी है तो उनके चाय का स्वाद कसैला हो गया | वो तो १०० रुपये में ही काम चला लेते थे और उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इसकी शुरुआत उन्ही के घर से हो जायेगी |
विनय

Friday, January 10, 2014

वतन

सब कुछ नया नया सा लग रहा था | नयी जगह , नए लोग और अपनी जमीं से हजारो मील दूर एक नए देश में आना , सपना सच होने जैसा था | फिर कुछ महीने बीते और चीजों में अब वो नयापन नहीं रह गया | कहाँ अपने देश में और अपने लोगों के बीच में छोटी छोटी खुशिया भी बहुत बड़ी लगती थीं और बड़े बड़े ग़म भी छोटे लगते थे | और अब यहाँ सब कुछ बहुत अच्छा होते हुए भी खालीपन सा लगने लगा था | खुशियां तो बड़ी बड़ी थीं लेकिन कोई ऐसा नहीं था जिससे बांटा जा सके | शायद इसी को अपनी मिटटी से जुड़ाव कहते हैं और शायद इसी लिए लोग पूरी जिंदगी बाहर बिताने के बाद भी अपने वतन की मिटटी में आखिरी साँस लेना चाहते हैं | एफ एम पर गाना बज रहा था "चिट्ठी आयी है " और मन बनारस की गलियों में खो गया था ...... 
विनय

Wednesday, January 8, 2014

समय

समय 
सतीश ने एक बार फिर पलट कर देखा . वह राजेश ही था . सतीश के दिमाग में कुछ समय पहले की बात घूमने लगी . शायद सितम्बर का महीना था . सतीश शाम को नास्ता करने के लिए एक होटल में गया था . बिल देने के लिए जैसे ही काउंटर पर पंहुचा , काउंटर क्लर्क ने कहा की आपका बिल पे हो गया है . सतीश आस्चर्य से देखने लगा कि कौन है जिसने उसका बिल पे किया है तो पता चला कि वो आदमी राजेश है . राजेश उसके घर के पास ही रहता था और कभी कभी उसके ऑफिस में कुछ लोगो को लेकर आता था जिनका काम उसके टेबल से हो सकता था . सतीश ने पूछा कि क्यों उसने पेमेंट किया है तो उत्तर मिला कि एक ही बात है सर . बहुत कहने के बाद भी बिल वह नहीं दे पाया था .
आज राजेश सामने होते हुए भी नहीं पहचान पाने का अभिनय कर रहा था . सतीश को लगने लगा कि रिटायरमेंट ने जैसे उसका वजूद ही मिटा दिया हो .

उम्मीद

"आप से तो कम से कम ये उम्मीद नहीं थी"| उस ग्राहक के कहे इन शब्दो ने अंदर ही अंदर झँझोड़ के रख दिया | मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे रिएक्ट करूँ | फिर मैंने उसे समझाते हुए बैठने के लिए कहा और पूछा कि मैंने ऐसा क्या गलत कह दिया | उसने बहुत ही भरे शब्दों में कहा " मुझे ये पता है कि आप भी हमारी तरह हैं , लेकिन सब जगहों से दुत्कारे जाने के बाद जब हम आप के पास आते हैं तो एक सुकून सा मिलता है कि चलो एक जगह तो है जहाँ पर हमें इंसानो जैसा व्यव्हार मिलता है लेकिन आज आप ने भी इतने ख़राब लहजे में बात की तो कही अंदर से तकलीफ हुई"| दरअसल मैं किसी वजह से तनाव में था और मैंने काफी रूखे शब्दो में बात की थी | ये कोई बड़ी बात तो नहीं होनी चाहिए थी , लेकिन मुझे ये समझ में आ गया कि सार्वजनिक जीवन में आपके अपने तनाव आपके व्यवहार में परिलक्छित नहीं होने चाहिए और आम आदमी के द्वारा लगाये गए उम्मीदो को तोड़ने का हक़ हमें नहीं है | और मैंने उससे छमा मांग ली |
विनय


Tuesday, January 7, 2014

नाव

हमारे गांव के कल्लू भइया बसनी सरकारी हास्पिटल में नौकरी करने रोज कोरौत घाट से वरुणा नदी पार करके जाते थे । इमरजेंसी का समय था, नसबंदी का कैम्प अक्सर हास्पिटल में लगा करता था और घर लौटते समय अक्सर रात हो जाती थी । एक बार जाड़े में घाट पर पहुचते पहुचते काफी देर हो गई और नाव वाला नहीं था, काफी आवाज लगाई लेकिन नदी उस पार जिधर नाव बंधी थी वहा से कोई आवाज नही आई । अब विकल्प था कि २० किमी का चक्कर लगा कर कैंट होकर गांव आये या थोड़ी हिम्मत करके नदी पार करके 10 मिनट में घर पहुंचे । दिन भर का थका हारा शरीर मन को दूसरे विकल्प के लिये तैयार किया । बदन के कपड़े उतार कर साईकिल के हैंडिल में बांधा, साईकिल को कंधे पर लटकाया और दोनों जूते हाथ में लेकर नदी के किनारें पानी में दूसरा कदम डाला ही था कि गड़ाप से पोरसा भर नीचे चले गये । साईकिल कही छटक गई और जूते भी हाथों में नहीं थे । अब जान बचाने का संघर्ष था लेकिन सतह पर आने पर थोड़ी दूर पर पानी की लहरों पर कोई चीज तैरती दिखाई दी, लगा जैसे जूता तैर रहा है । मन में लालच आ गया , सोचा जूता ही बचा लें, कुछ ही दिन पहले बड़े शौक से तमाम जरूरतों को दरकिनार कर लहुराबीर से खरीदा था । तैर कर पास पहुचे तो देखा कुत्ते का शव लहरों में ऊपर नीचे हो रहा था, रोंगटे खड़े हो गये सारा मोह ख़त्म हो चुका था । किसी तरह तैर कर उस पार पहुँचे और जाड़े की ठिठुरती रात में भींगे और नंगे बदन कोरौत बाजार के अपने मित्र श्री दिनेश्वर लाल का दरवाजा खटखटाया । अर्धनिद्रा में दिनेश्वर जी लालटेन की रोशनी में उनको देखकर घबड़ा गये तुरंत अपना शाल और साईकिल दिए घर जाने के लिए ।
(True story taken from Facebook- Sabhar - Mr Santosh Kumar )

नाव 

फर्क

ऑफिस से घर पहुचते ही पत्नी लिपट गयी और मुस्कराते हुए कहने लगी "आपको पता है , 
अगले हफ्ते मेरे भैया सपरिवार १५ दिन के लिए यहाँ आ रहे हैं " घर का फर्नीचर कितना पुराना हो गया है और मुझे कुछ नए कपडे भी लेने हैं . भैया , भाभी और बच्चों को कपडे भी देना है और सुनो , कामवाली को भी लगाना पड़ेगा नहीं तो वो लोग क्या सोचेंगे .
अभी पिछले महीने ही माँ के आने कि खबर आते ही पत्नी का मूड हफ़्तों उखड़ा उखड़ा था और उसने कामवाली को भी घर से रुखसत कर दिया था ये कहते हुए कि खर्चे बहुत बढ़ गए हैं .
विनय

बचत

बचत -
ये क्या है राजीव ? तुम फिर अपना 125 रुपये का ट्रेवलिंग का बिल ले आये . अभी पिच्छाले हफ्ते ही तो तुमने 110 रुपये का ट्रेवलिंग बिल लिया था . तुमको मालूम नहीं है कि हेड ऑफिस ने खर्चों में कटौती का आदेश दिया है . बॉस कि आवाज कि तल्खी बहुत कुछ बयां कर रही थी और ऑफिस में मौजूद सभी लोग उसे महसूस कर रहे थे .
यह सुनते ही शरद को सुबह का वाकया याद आ गया . बॉस ने ऑफिस में आते ही उसको बुलाया और होटल ताज में तीन दिन के लिए एक बढ़िया सूट बुक करने के लिए कहा था दरअसल बॉस के पत्नी के घर से कोई आ रहा था और ताज शहर का सबसे अच्छा होटल था . फिर मुस्कराते हुए बॉस ने पूछा था 'बिल को एडजस्ट करना तो तुम्हे आता है '

विकलाँग

World Disability Day 3rd Dec 2013 
मैं चला जाता हूँ स्टेटमेंट जोनल ऑफिस में जमा करने , डी पी कि आवाज सुनते ही मैंने पलट कर देखा | एक थप्पड़ सा लगता हुआ महसूस हुआ मुझे | दरअसल थोड़ी देर पहले ही मैंने सभी ऑफिसर्स से पूछा था कि कौन जायेगा जोनल ऑफिस स्टेटमेंट्स को लेकर और सभी लोग कुछ न कुछ बहाने बना रहे थे | ब्रांच से जोनल ऑफिस कि दूरी करीब २५ किलोमीटर थी और लोकल ट्रैन में धक्के खाते हुए जाना , फिर उसके बाद स्टेशन से लगभग ८०० मी तक जाना , फिर चार मंजिल ऊपर ऑफिस पहुच कर स्टेटमेंट जमा करना और वहाँ पर २-३ घंटा इंतजार करना , यह सोच कर सभी बचने का रास्ता ढूंढ़ रहे थे | मैंने कहा कि तुम और जवाब मिला कि मैं क्यों नहीं जा सकता |
डी पी हमारे ब्रांच में ही एक ऑफिसर था जिसका एक पैर घुटनो के ऊपर तक कटा हुआ था | वह खुद के ऑटो से ब्रांच आता था और बैसाखी से चलता था | फिर वही स्टेटमेंट लेकर जमा करने गया और मैं ये सोचता रह गया कि वास्तव में अपाहिज कौन था ?
डी पी से छमा याचना सहित क्यूंकि शायद उसे ये अच्छा न लगे |
विनय

विकलाँग 

आरक्षण

आरक्षण 
दीपू ने आते ही बहुत निरासा भरे शब्दों में कहा "अब तो इस गांव में प्रधानी भी गयी हम लोगों के पास से " 
क्यों , ऐसा क्या हो गया , कोई नयी समस्या आ गयी क्या , अशोक ने पूछा |
आपको पता नहीं है कि हमारे गांव की सीट अब सामान्य नहीं रही , अब यह सीट आरक्षित हो गयी है | अब तो यहाँ वो लोग प्रधान बनेंगे जो हमारे सामने कभी खटिया पर भी नहीं बैठते थे |
अरे पागल , हमारा हरवाह किसनवा कब काम आएगा | इलेक्शन में अब वही हमारी तरफ से खड़ा होगा और उसके जीतने के बाद प्रधानी तो हमीं करेंगे |
अशोक ने मुस्कुरा कर आरक्षण पर एक और सवाल खड़ा कर दिया |
महापरिनिर्वाण दिवस पर सादर |
विनय

मज़बूरी

मज़बूरी __
तुम अंतिम शख्श होगे जिसे मैं भूल पाऊँगी | हमारी शादी नहीं हो पायी तो क्या , हम जिंदगी भर एक दूसरे का साथ निभाएंगे | आज के बाद तुम मुझे फ़ोन मत करना | लेकिन तुम मेरे ख्वाबों में और मेरी सोच में हमेशा मेरे आस पास रहोगे | वो पल जो तुमने मुझे दिए हैं वो मेरी सबसे कीमती धरोहर रहेंगे | तुम साथ होते हो तो ये दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाती है | फिर भी मेरी मज़बूरी समझने की कोशिश करो , आज मुझे देखने के लिए लड़के वाले आ रहे हैं |
एक दिन पहले कहे गए शालिनी के ये शब्द अब उसका मजाक उड़ाते से लग रहे थे , क्योंकि आज सुबह उसने देखा की उसके फेसबुक प्रोफाइल से भी वो अनफ्रेंड कर दिया गया था | ये सचमुच कोई मज़बूरी थी या उसका सोचा समझा फैसला , समझ पाना मुस्किल था |
विनय

केस

कप्तान साहब गुस्से से तमतमा रहे थे | फुँफकारते हुए उन्होंने कहा " अभी तक कुछ पता नहीं लगा पाये तुम लोग | मालूम है न कि मंत्रीजी के नजदीकी रिस्तेदार के यहाँ मर्डर हुआ है | मुझे किसी भी हालत में इस केस को बंद करना है |
थानेदार ने थूक निगलते और पसीना पोंछते हुए कहा " हो जायेगा सर " | उसी समय दीवान ने आकर उनके कान में फुसफुसाते हुए कुछ कहा और थानेदार ने सर हिलाकर पसीना पोंछा | अभी अभी २ मजदुर जो शराब पीकर झगड़ा कर रहे थे उन्हें थाने लाया गया था |
अगले दिन समाचार पत्रो में एक खबर छपी थी " पुलिस एनकाउंटर में बदमाश हलाक "
विनय

जड़ें--

" दादाजी दादाजी , ये पेड़ सूख कैसे गया | हम लोगो ने कितना ध्यान रखा था इसका "| छोटा मोनू अपने दादाजी से बड़ी हैरानी से पूछ रहा था | दादाजी ने उसे समझाते हुए कहा " बेटा कोई भी पेड़ , पौधा अपनी ज़मीन से उखड़ने के बाद शायद ही फिर से पनप पाता है | अपनी जड़ों से अलग होने के बाद फिर से जीना आसान नहीं होता बेटा "|
उसे पिछले हफ्ते कि बात याद आ गयी जब पिता जी ने उससे कहा था कि काफी दिन हो गए , अब वापस अपने गांव जाना चाहता हूँ | अपनी तरफ से तो वह उनका पूरा ख्याल रखने की कोशिश कर रहा था , पर शायद अपनी जड़ों से अलग होकर जीना आसान नहीं होता |

बालिका शिक्षा

आज ही ये होना था , उसने सोचा और अपना झोला लेकर बस स्टैंड कि तरफ चल पड़ा | आज दूसरा दिन था और वह बमुस्किल ६५ रु ही कमा पाया था | कल रात में उसकी बेटी ने फिर फीस की बात याद दिलायी थी और उसने सोचा था कि आज किसी तरह उसे १५० रु कमाना ही है ताकी वह अपनी बेटी की फीस जमा कर सके | 
अभी उसे अपनी दुकान लगाये कुछ ही घंटे हुए थे की सामने से नगरपालिका वाले आये और सबसे स्कूल के सामने वाला फुटपाथ खाली कराने लगे | पूछने पर बताया की प्रदेश के शिक्षा मंत्री बालिका शिक्षा की किसी योजना का शुभारम्भ करने आ रहे है | अब उसे ये समझ में नहीं आ रहा था की यह कैसी बालिका शिक्षा की योजना है जिसके चलते उसकी बेटी की शिक्षा पूरी नहीं हो पा रही है |
विनय

मेरी पहली रचना

मेरी पहली रचना - मुंशी प्रेमचंद ( मुंशी प्रेमचंद की कहानी का फलकीकरण का प्रयास )
१३ वर्ष कि उम्र और उर्दू के उपन्यास पढने का शौक | तमाम लेखकों की रचनाये मैंने पढ़ डाली थी और फिर बुद्धिलाल बुकसेलर की दुकान पर जाता रहता था ताकि और भी उपन्यास पढ़ सकूँ | इनका स्टॉक ख़तम होने के बाद पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े और "तिलस्मी होशरुबा" के कई भाग भी |
हमारे रिस्ते के एक मामू थे जिनकी शादी किसी वजह से नहीं हुई थी , और वो सभी रिस्तेदारो के यहाँ इस उम्मीद से की कोई तो शादी करा देगा , घूमा करते थे | अंत में एक निचली जाति की लड़की के मोहब्बत में गिरफ्तार हो गए | होली पर उसे काफी महंगी साडी और ढेर सारा नेग दिया और धीरे धीरे उसने मामू को इश्क़ में निकम्मा बना दिया | लेकिन बात फैलने लगी और उसकी जात वालो ने तय किया कि मामू को रंगे हाथ पकड़ा जाये | एक दिन जब मामू ने उसको घर के अंदर बंद किया था तभी लोगों ने घर को घेर कर किवाड़ पीटना शुरू कर दिया | लड़की ने भी कोसना शुरू कर दिया और मामू की तो सिट्टी-पिट्टी ग़ुम | दरवाजा तोड़ कर जिसको जो मिला उसी से उसने मामू की जम के कुटम्मस की | बेहोश मामू को छोड़ कर सब चले गए और पट्टीदार खुश कि मामू तो अब यहाँ मुह नहीं दिखाएंगे और उनको मामू की ज़मीन मिल जायेगी |
इस घटना की खबर मुझे भी मिल गयी थी | मामू ठीक होते ही हमारे यहाँ आ गए और मुझे पढ़ने के लिए डाँटने लगे | लेकिन अब मुझसे ये कहाँ बर्दास्त होता और मैंने वो सारी घटना नाटक के रूप में लिखी और उसे मामू के बिस्तर पर रख के स्कूल चला गया | शाम को घबराते हुए घर आया की पता नहीं क्या हो लेकिन मामू जरुरी काम का बहाना बना कर गायब हो गए थे |
विनय

किसान

इस बार तो छिम्मी (मटर) की फसल बढ़िया है , आदित्य चच्चा अपने मन में सोचते हुए खेत के मेड़ पर खड़े थे | किसी सूदखोर के पास कर्जे के लिया हाथ नहीं पसारना पड़ेगा , यही सोच कर मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे क्योंकि लड़की का गौना करना था इस साल और खेती ही कमाई का एकलौता जरिया था , जो कि आम तौर पर छोटे और मझौले खेतिहरों के पास होता है | बड़का किसी तरह इन्टर पास करके बेरोजगार था और छोटका अभी ८वी में ही पढ़ रहा था | 
रात में घर आकर खाना खाते हुए मेहरारू से बोले " अबकी सब सामान क लिस्ट पहिलही से तैयार रखना | छिम्मी बिचाते ही गौना का साईत निकाल कर बिटिया की बिदाई करनी है "| पाला जम के पड़ने लगा था और दुआर पर जलने वाला कउड़ा भी बुझ गया था | कल रात में खेत में पानी भी बराना (सिचाई) है ,यही सब सोचते हुए न जाने कब रजाई में उनकी आँख लग गयी और आज खेत अगोरने के लिए वो नहीं जा पाये |
अचानक सुबह ४ बजे आँख खुली और चच्चा घबरा कर खेत कि ओर भागे , लेकिन तब तक नीलगाय ने उनके सारे सपनो को दहींज (रौंद) दिया था | अब गौना कैसे करेंगे ये सोच सोच कर चच्चा खेत में ही कपार (सर) पकड़ कर बैठ गए और उनके आँखों से टूटे हुए सपने खून कि तरह बहने लगे |
विनय

शिक्षा

अबे तू यहाँ सोने के लिए आता है कि काम करने के लिए , ढाबे के मालिक ने एक थप्पड़ कस कर पप्पू को लगाया | पप्पू , जो कि सिर्फ ८ साल का था , बड़ी मुस्किल से अपनी आँखों को रात के ११ बजे खोलने कि कोशिश कर रहा था | स्कूल क्या होता है , पप्पू को नहीं पता , क्योंकि जब से वह बड़ा (?) हुआ है , तबसे वह इसी ढाबे पर काम कर रहा है | 
रोते हुए उसने अपने आप को खड़ा किया और लड़खड़ाते हुए प्लेट को टेबल से उठाने लगा | ढाबे के टेलीविज़न पर एक सरकारी कार्यक्रम का प्रचार चल रहा था " पढ़ेगा इंडिया , तभी बढ़ेगा इंडिया "
विनय

छुआछूत

पहली बार ये महसूस हुआ था कि हकीकत की दुनिया कितनी अलग होती है | हॉस्टल में रहते हुए जिंदगी और दुनिया के बारे में जो कुछ भी पढ़ा था , जाना था और महसूस किया था , वो सब कितना अलग और बेहतर था | दोस्त , सिर्फ दोस्त होते थे , और कुछ नहीं | कभी भी किसी के भी साथ खाना , पीना | किसी के भी रूम में जाना , कोई रोक टोक नहीं | कभी सोचा ही नहीं कि इंसानो में भी इतना फर्क हो सकता है |
अपने गांव के एक दोस्त की शादी में जाने का बुलावा था और पूरी तैयारी हो गयी थी जाने की | मगर दादाजी का एक ही वाक्य दुनिया के बारे में जाने क्या क्या समझा गया " घूमना फिरना तो बर्दास्त कर लिया , और अब उसकी शादी में जाओगे , कुछ तो घर की इज्जत का ध्यान रखो | उन लोगो के घर हम पानी भी नहीं पीते " लेकिन इसने भविष्य में इन सब के खिलाफ आवाज उठाने का सबक भी दे दिया |
विनय

'भा कटे '


'भा कटे ' ये आवाज सुनते ही मन पुरानी यादों में खो गया | जाड़े के मौसम में पतंग उड़ाना , कटी हुई पतंगों के पीछे उनको लूटने के लिए दौड़ना और सबकी पतंग काटने की कोशिश करना | वो भी क्या दिन होते थे | लेकिन गांव पर बेटे के पूछे एक सवाल ने कई नए सवाल खड़े कर दिए " डैडी ये बच्चे पतंगों के पीछे क्यों भागते हैं ? इस धूल और मिटटी में नंगे पैर भाग दौड़ करना इन्हे अच्छा कैसे लगता है " 
महानगर में रहने वाला मेरा बेटा क्या जाने की पतंग उड़ाने और लूटने का क्या मजा है | वो तो सारे गेम्स कंप्यूटर पर ही खेल लेता है | उसके लिए तो फंतासी की दुनिया ही असली दुनिया है | शायद हम लोगों ने इनका बचपन इनको महसूस ही नहीं करने दिया | ढेर सारी सुविधाएँ देने के चक्कर में हमने उनसे उनका बचपन ही शायद छीन लिया है |